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Explained: ट्रंप के सिर पर संकट के दोहरे बादल, एपस्टीन फाइल और बढ़ती महंगाई से कैसे बैकफुट पर आए अमेरिकी राष्ट्रपति

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इन दिनों दो बड़े संकटों से जूझ रहे हैं। एक ओर रिपब्लिकन पार्टी के भीतर जेफरी एपस्टीन केस की फाइलें सार्वजनिक करने को लेकर दबाव बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर महंगाई और आर्थिक नीतियों से जनता असंतुष्ट है। एपस्टीन केस में ट्रंप का बदलता रुख उनकी राजनीतिक पकड़ कमजोर करता दिख रहा है। दूसरी तरफ आयात पर भारी टैरिफ और बढ़ती कीमतों ने आम नागरिकों की नाराजगी बढ़ा दी है। आइए समझते हैं ट्रंप पर मंडरा रहे संकट के दोहरे बादल को।

trump on epstein files

बढ़ती महंगाई और एपस्टीन फाइल मामले में बैकफुट पर आए ट्रंप

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, जिन्होंने अब तक अपने दूसरे कार्यकाल में काफी मजबूत पकड़ बनाए रखी थी, इन दिनों दो बड़े मोर्चों पर घिर चुके हैं। एक तरफ उनकी ही पार्टी के कुछ सदस्य जेफरी एपस्टीन केस की फाइलें जारी कराने के लिए दबाव बना रहे हैं, तो दूसरी तरफ देश की आर्थिक स्थिति और महंगाई को लेकर जनता की असंतुष्टि बढ़ रही है। ये दोनों संकट मिलकर ट्रंप की राजनीतिक स्थिति को कमजोर कर रहे हैं और आगामी मध्यावधि चुनावों से पहले यह उनके लिए एक गंभीर चुनौती बन रहा है।

एपस्टीन फाइलों के मामले में पार्टी के भीतर दरार

ट्रंप लंबे समय से एपस्टीन केस की फाइलों को सार्वजनिक करने वाले बिल के खिलाफ थे। वे इसे पुराने विवादों को फिर कुरेदने की कोशिश बताते थे। लेकिन हाल ही में उन्होंने अचानक अपना रुख बदलते हुए कहा कि यदि कांग्रेस (संसद) यह बिल पास कर देती है, तो वे इसे साइन कर देंगे। यह बदलाव सिर्फ राजनीतिक रणनीति नहीं, बल्कि उस दबाव का नतीजा है जो रिपब्लिकन पार्टी के भीतर ही बढ़ता जा रहा था।

बता दें कि बीते दिनों रिपब्लिकन सांसद थॉमस मैसी ने खुले तौर पर यह चेतावनी दी कि अगर पार्टी एपस्टीन फाइलों को सार्वजनिक करने के खिलाफ वोट करती है, तो भविष्य में इस फैसले के गंभीर राजनीतिक परिणाम होंगे। उन्होंने यह भी कहा कि ट्रंप अभी तो अपने प्रभाव के कारण सांसदों की रक्षा कर सकते हैं, लेकिन 2030 तक वे राष्ट्रपति नहीं रहेंगे और तब कोई भी उन्हें बचा नहीं पाएगा। एक रिपब्लिकन की तरफ से आया यह बयान ट्रंप की राजनीतिक स्थिति के कमजोर पड़ने का संकेत है, क्योंकि उनकी अपनी पार्टी में ही यह सवाल उठ रहा है कि क्या वे किसी विवादित केस की फाइलें दबाकर जनता से कुछ छिपाने की कोशिश कर रहे हैं।

एपस्टीन केस से कमजोर हुए ट्रंप?

यह भी ध्यान देने लायक बात है कि जेफरी एपस्टीन केस एक धनी अमेरिकी फाइनेंसर से जुड़ा मामला था, जो एक यौन अपराधी था और उस पर अपने और अपने शक्तिशाली और अभिजात्य सहयोगियों के नेटवर्क के लिए दर्जनों नाबालिग लड़कियों की यौन तस्करी का आरोप था। यह मामला विवादास्पद याचिका समझौतों, जेल में उसकी रहस्यमय परिस्थितियों में हुई मौत और उसके साथ जुड़े हाई-प्रोफाइल व्यक्तियों के कारण चर्चा में रहा है। बीच में, एलन मस्क ने भी एपस्टीन फाइल्स का जिक्र किया था और कहा था कि इन फाइल्स में ट्रंप का नाम भी है। इसके बाद विपक्ष ने फाइल्स सार्वजनिक करने की मांग और तेज कर दी। बता दें कि एपस्टीन केस अमेरिकी राजनीति का सबसे विवादित मामलों में से एक है, जिसमें सत्ता और उद्योग जगत के कई प्रभावशाली नाम जुड़े रहे हैं। यही कारण है कि इस मामले में किसी भी तरह की रहस्यमय चुप्पी जनता के बीच अविश्वास को जन्म देती है। ट्रंप का पहले विरोध करना और फिर अचानक समर्थन कर देना यह दिखाता है कि वे पार्टी के भीतर बढ़ती असहमति को लेकर असहज थे। यह उनके लंबे समय से चले आ रहे राजनीतिक प्रभुत्व में आई एक बड़ी दरार के रूप में देखा जा रहा है।

बढ़ती महंगाई से जनता में नाराजगी

ट्रंप प्रशासन ने बार-बार दावा किया है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था मजबूत है और महंगाई सामान्य स्तर पर आ गई है। लेकिन आम अमेरिकी नागरिकों का अनुभव कुछ और ही कहता है। रोजमर्रा की जरूरतों की कीमतें अभी भी ऊंची हैं, खासकर ग्रॉसरी, घर का किराया और कई अन्य आवश्यक वस्तुओं की लागत बढ़ी हुई महसूस होती है। राष्ट्रपति ट्रंप ने खुद भी स्वीकार किया कि कुछ चीजें थोड़ी महंगी हैं।

महंगाई के मुद्दे पर बढ़ती नाराजगी का सीधा असर हाल ही में हुए चुनावों में दिखा, जहां न्यू जर्सी, वर्जीनिया और कई अन्य जगहों पर डेमोक्रेट्स ने जीत दर्ज की। यह साफ संकेत है कि जनता आर्थिक स्थिति में सुधार महसूस नहीं कर रही और ट्रंप प्रशासन की नीतियों पर सवाल खड़े हो रहे हैं। ट्रंप की आर्थिक नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा आयात पर भारी टैरिफ लगाना था, ताकि घरेलू उद्योगों को मजबूती मिले। लेकिन इन टैरिफ के कारण कई उत्पादों के दाम बढ़ गए और महंगाई और तेज महसूस होने लगी। अब ट्रंप को कॉफी, बीफ और कुछ अन्य बाहर देशों से मंगाई जाने वाली चीजों पर शुल्क घटाना पड़ा है। यह यू-टर्न दिखाता है कि उनकी आर्थिक नीतियां जनता को राहत देने के बजाय बोझ बढ़ाने वाली साबित हुईं। इस बीच, ट्रंप ने कम आर्थिक क्षमता वाले अमेरिकी नागरिकों को 2,000 डॉलर का टैरिफ-फंडेड डिविडेंड देने का प्रस्ताव रखा है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार इससे महंगाई और बढ़ सकती है और कांग्रेस शायद इसे मंजूरी न दे। बढ़ते सरकारी कर्ज और आर्थिक असंतुलन को देखते हुए यह योजना व्यावहारिक भी नहीं लगती।

दोनों खतरे मिलकर कठिन बना रहे ट्रंप की राह

ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे पार्टी के भीतर भी विरोध का सामना कर रहे हैं और जनता के बीच भी उनकी लोकप्रियता पर असर पड़ रहा है। एपस्टीन फाइलों जैसी संवेदनशील राजनीतिक लड़ाई और महंगाई जैसी रोजमर्रा की आर्थिक समस्या, ये दोनों संकट उनकी छवि और उनकी ताकत दोनों को कमजोर कर रहे हैं। एक तरफ पार्टी के नेता खुलकर उनके फैसलों पर सवाल उठा रहे हैं, दूसरी तरफ आम लोग यह महसूस कर रहे हैं कि उनके जीवन में कोई ठोस आर्थिक राहत नहीं आई। यही दो मोर्चे मिलकर ट्रंप की राजनीतिक यात्रा को कठिन बना रहे हैं और अगले साल के मध्यावधि चुनावों से पहले उन्हें एक ऐसी स्थिति में ला खड़ा किया है, जैसा शायद वह पहले कभी न थे।

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 Nishant Tiwari
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निशांत तिवारी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल की सिटी टीम में कॉपी एडिटर हैं। शहरों से जुड़ी खबरों, स्थानीय मुद्दों और नागरिक सरोकार को समझने की उनकी गहरी दृ... और देखें

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