Iran US War: ईरान-अमेरिका के बीच हुए शांति समझौते के 60 दिन पूरे हो गए हैं, यह शांति समझौता 60 दिन के लिए ही था। इन 60 दिनों में शायद ही कुछ बदला हो। इन दो देशों के जंग के कारण ही होर्मुज बंद हुआ था, जिसके कारण पूरी दुनिया में न केवल तेल सप्लाई बाधित हुआ बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था हिली हुई है। जब जून में दोनों देशों के बीच शांति समझौता हुआ तो ऐसा लगा कि अब स्थिति सुधरेगी, एक-दो दिन के लिए स्थिति सुधरी भी लेकिन फिर वही 'ढाक के तीन पात'! होर्मुज फिर से बंद हो गया, हमले रूक-रूक कर होते रहे। बस बदला तो इतना कि दोनों ने एक दूसरे पर ज्यादा बड़े हमले नहीं किए, लगातार हमले नहीं किए। लेकिन अब जब शांति समझौते की मियाद खत्म हो गई है, तब क्या होगा? दोनों देशों के बीच फिलहाल बातचीत का कोई स्कोप नहीं दिख रहा है, ट्रंप के अपने दावे हैं, ईरान पहले से ज्यादा आक्रमक है, ऐसे में सवाल यह है कि अब विकल्प क्या है? अमेरिका और ईरान के बीच भविष्य में जंग और बढ़ेगी या फिर शांति की ओर दोनों देश बढ़ेंगे?
ट्रंप के सामने विकल्प क्या?
ईरान के साथ जंग में सबसे खराब स्थिति अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की है। अमेरिका, इजराइल के साथ जंग में उतरा था या यूं कहें कि इजराइल के कहने पर ही ट्रंप ने इस जंग के लिए हामी भरी थी, अब इजराइल अलग रास्ते पर है, ईरान से सीधे उलझने के बजाय वो लेबनान और गाजा में कब्जे कर रहा है। ट्रंप इस जंग में अपने देश में भी समर्थन खो रहे हैं। अमेरिका का इस जंग में अरबों फूंक चुका है, हथियार खत्म होने की कगार पर हैं, ऐसे में अगर ट्रंप इस जंग में आगे बढ़ते हैं तो मुश्किल ही होगी और अगर जंग खत्म करते हैं तो एक तरह से हार, जो ट्रंप के कार्यकाल पर सबसे बड़ा दाग होगा। मतलब ट्रंप की हालात सांप-छछूंदर जैसी हो गई है।
न्यूयॉर्क टाइम्स के साथ बीतचीत में कैटो इंस्टीट्यूट में रक्षा और विदेश नीति अध्ययन के निदेशक जस्टिन लोगन ने समझौता ज्ञापन की अवधि समाप्त होने को लेकर कहा, “यह ज्यादातर प्रतीकात्मक है, लेकिन प्रतीकों का महत्व होता है।” उन्होंने जोर देकर कहा कि इस समझौते का मुख्य उद्देश्य स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से खोलना था। लोगन ने कहा, “इस पूरे मामले की त्रासदी यह है कि अमेरिका अब उस स्थिति में लौटने की कोशिश कर रहा है, जो युद्ध शुरू होने से पहले मध्य पूर्व में थी।”
यूएसएस अब्राहम लिंकन (फोटो- AP)
ईरान के सामने विकल्प क्या?
ईरान इस जंग में धीरे-धीरे आक्रमक ही होते जा रहा है। ईरान न तो ट्रंप की धमकियों से डर रहा है और न ही अमेरिकी हथियारों से। वो अमेरिका और उसके खाड़ी देश के साथियों को लगातार निशाना बना रहा है। होर्मुज से लेकर परमाणु हथियारों तक पर अब अड़ा है। ईरान साफ-साफ उस रास्ते पर है, जहां शांति उसे अपनी शर्तो पर चाहिए, न कि अमेरिका की शर्तों पर। जंग से फिलहाल वो परेशान नहीं दिख रहा है। हालांकि इस जंग में ईरान को भारी नुकसान हुआ है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा है कि ईरान ने अभी यह तय नहीं किया है कि अमेरिका के साथ बातचीत दोबारा शुरू की जाए या नहीं। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि 60 दिनों की समयसीमा अब प्रासंगिक नहीं रह गई है, क्योंकि जून में हुआ समझौता प्रभावी रूप से खत्म हो चुका है। अराघची ने कहा, “हमारे बीच ऐसा कोई युद्धविराम नहीं था, जिसे अब आगे बढ़ाने की जरूरत हो। हमारे बीच युद्ध की समाप्ति हुई थी, जिसने अब एक नई स्थिति ले ली है।”
ईरान-अमेरिका बातचीत पर भी अलग-अलग दावे
ईरानी अधिकारियों का कहना है कि उन्होंने जून में अमेरिका के साथ बातचीत बंद कर दी थी। हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया है कि मध्यस्थों के जरिए संदेशों का आदान-प्रदान जारी है। वहीं, ट्रंप का कहना है कि बातचीत चल रही है। वह कई बार बड़ी सैन्य कार्रवाई की धमकी से पीछे हटने के बाद बातचीत में प्रगति का दावा भी कर चुके हैं। जून समझौता कराने में अहम भूमिका निभाने वाले पाकिस्तान ने पिछले सप्ताह याद दिलाया था कि इसकी समयसीमा सोमवार को खत्म हो रही है। साथ ही उसने उम्मीद जताई कि इसे आगे बढ़ाया जाएगा। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने कहा कि बातचीत का अध्याय बंद नहीं हुआ है और पाकिस्तान दोनों पक्षों को बातचीत की मेज पर लाने के लिए पूरी कोशिश कर रहा है।
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान और पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहसिन नकवी (फोटो- AP)
आगे शांति या युद्ध?
अब जब ईरान ये साफ कर चुका है कि जब तक अमेरिका युद्धविराम के दौरान किए गए अपने वादों को पूरा नहीं करता, तब तक वह स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को दोबारा नहीं खोलेगा। इनमें विदेशों में फ्रीज की गई ईरान की संपत्तियों को जारी करना जैसे कदम शामिल हैं। NYT से बात करते हुे इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप के ईरान मामलों के विशेषज्ञ अली वाएज कहते हैं, ट्रंप प्रशासन की मांग है कि ईरान पहले होर्मुज की नाकाबंदी खत्म करे, उसके बाद ही अमेरिका अपनी प्रतिबद्धताओं पर आगे बढ़े। वाएज ने कहा, “वास्तव में दोनों में से कोई भी पक्ष अभी समझौते को अंतिम रूप देने के लिए तैयार नहीं है। दोनों को लगता है कि कुछ दिनों या हफ्तों में दूसरा पक्ष समझौते के लिए ज्यादा मजबूर हो जाएगा और तब वे उससे ज्यादा हासिल कर सकेंगे।” उन्होंने आगे कहा, “यही वजह है कि हम एक बार फिर धैर्य और दबाव की इस लंबी लड़ाई में फंस गए हैं।”
60 दिन की मियाद खत्म होने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि ईरान और अमेरिका अब टकराव से बाहर निकलने का रास्ता खोजेंगे या फिर वही पुरानी तनातनी एक नई जंग का रूप लेगी? फिलहाल दोनों पक्ष अपनी-अपनी शर्तों पर अड़े हैं और एक-दूसरे के पहले झुकने का इंतजार कर रहे हैं। ईरान के लिए होर्मुज और अपनी संप्रभुता का सवाल अहम है, तो ट्रंप के सामने युद्ध को आगे बढ़ाने और उससे पीछे हटने-दोनों की अपनी-अपनी राजनीतिक और रणनीतिक कीमत है।
ऐसे में आने वाले दिन बेहद अहम होंगे। अगर बातचीत का रास्ता खुलता है तो होर्मुज के साथ-साथ वैश्विक तेल सप्लाई और अर्थव्यवस्था को भी राहत मिल सकती है। लेकिन अगर दोनों पक्षों की जिद कायम रहती है, तो 60 दिन का यह अस्थायी ठहराव एक और बड़े टकराव की शुरुआत बन सकता है।
