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बलूचिस्तान की बगावत से क्यों डरा है पाकिस्तान, अलग हुआ तो कैसे बदल जाएगा दक्षिण एशिया का नक्शा?

बीते कुछ दिनों से बलूचों ने पाकिस्तानी सेना के होश उड़ाए हुए हैं। बलूच अब पाकिस्तान से अलग होने के दावे कर रहे हैं। मुनीर की सेना भी बौखलाहट में है और बलूचिस्तान में हवाई हमल कर रही है। जिसमें आम लोगों सहित कई मासूम बच्चे भी मारे गए हैं। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री और असीम मुनीर को समझ में नहीं आ रहा कि बलूचों को काबू में कैसे करे या उनसे कैसे निपटें.. सवाल यही है कि आखिर पाकिस्तान बलूचिस्तान को पूरी तरह काबू क्यों नहीं कर पा रहा?और अगर कभी बलूचिस्तान पाकिस्तान से अलग हो गया तो पाकिस्तान पर उसका कितना बड़ा असर पड़ेगा?

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बलूचिस्तान हुआ अलग तो पाकिस्तान का क्या होगा? (फोटो- ai)
Edited by: Shiv Shukla
Updated Aug 17, 2026, 00:10 IST
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पाकिस्तान इन दिनों अपनी विदेश नीति और रणनीतिक साझेदारियों को लेकर भले ही बड़ी उपलब्धियां गिना रहा हो,लेकिन उसके सामने एक ऐसी आंतरिक चुनौती खड़ी है,जो देश की सुरक्षा,अर्थव्यवस्था और भविष्य तीनों को प्रभावित कर सकती है और उसकी यह चुनौती है बलूचिस्तान। पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत,प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर और रणनीतिक रूप से बेहद अहम यह इलाका दशकों से अलगाववाद, विद्रोह और सैन्य अभियानों का केंद्र रहा है।

बीते कुछ दिनों से बलूचों ने पाकिस्तानी सेना के होश उड़ाए हुए हैं। बलूच अब पाकिस्तान से अलग होने के दावे कर रहे हैं। मुनीर की सेना भी बौखलाहट में है और बलूचिस्तान में हवाई हमल कर रही है। जिसमें आम लोगों सहित कई मासूम बच्चे भी मारे गए हैं। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री और असीम मुनीर को समझ में नहीं आ रहा कि बलूचों को काबू में कैसे करे या उनसे कैसे निपटें.. सवाल यही है कि आखिर पाकिस्तान बलूचिस्तान को पूरी तरह काबू क्यों नहीं कर पा रहा?और अगर कभी बलूचिस्तान पाकिस्तान से अलग हो गया तो पाकिस्तान पर उसका कितना बड़ा असर पड़ेगा? इसका जवाब सिर्फ मौजूदा हिंसा या सैन्य कार्रवाई में नहीं,बल्कि करीब आठ दशक पुराने इतिहास, जटिल भूगोल, प्राकृतिक संसाधनों, स्थानीय असंतोष और चीन तक फैले रणनीतिक हितों में छिपा है।

1947 से शुरू हुई विवाद की कहानी

ये कहानी करीब 80 साल पुरानी है। जिसकी शुरूआत होती है साल 1947 से जब ब्रिटिश भारत का बंटवारा हुआ, तब आज का बलूचिस्तान एक ही राजनीतिक इकाई नहीं था। यहां ब्रिटिश प्रशासित इलाके थे और दूसरी तरफ कलात, मकरान, लसबेला और खरान जैसी रियासतें थीं। कलात के आखिरी सरदार अहमद यार खान ने एक आजाद बलूच राज्य की वकालत करना शुरू कर दिया। अहमद यार खान को इस बात की उम्मीद थी कि क्योंकि वो जिन्ना के अच्छे दोस्त हैं, इससे उन्हें पाकिस्तान में शामिल होने के बजाय अपना अलग राज्य हासिल करने में मदद मिलेगी। 11 अगस्त, 1947 को ऐसा होता भी दिखाई दिया जब पाकिस्तान ने कलात को अपने साथ शामिल होने के लिए मजबूर करने के बजाय उसके साथ दोस्ती के समझौते पर दस्तखत कर दिए लेकिन ब्रिटिश सरकार इसका विरोध करने लगी। अंग्रेजों को इस बात का भय था कि अगर कलात स्वतंत्र हो गया तो सोवियत संघ का इस इलाके में असर बढ़ जाएगा। इसके साथ एक मुश्किल और थी कि क्योंकि कलात के अधीन आने वाली तीनों रियासतों के जागीरदार पाकिस्तान के साथ जाना चाहते थे।

फिर अक्टूबर, 1947 में पाकिस्तान ने अपना रुख बदल लिया और कलात पर दबाव बनाने लगा कि उसे भी पाकिस्तान में शामिल होना चाहिए। 17 मार्च, 1948 को पाकिस्तान ने कलात के अधीन आने वाली तीनों रियासतों को अपने साथ मिला लिया। इससे अहमद यार खान पर काफी दबाव पड़ गया। इस बीच इस तरह की खबरें आईं कि अहमद यार खान भारत के साथ विलय करना चाहते हैं। इस वजह से 26 मार्च, 1948 को पाकिस्तानी सेना बलूचिस्तान पहुंच गई। और दबाव में आकर 27 मार्च को कलात के खान ने पाकिस्तान के साथ विलय किए जाने की संधि पर साइन कर दिए। लेकिन इस फैसले के खिलाफ उसी साल जुलाई में अहमद यार खान के भाई,अब्दुल करीम ने विद्रोह कर दिया और तब बलूचिस्तान की आजादी की पहली लड़ाई शुरू हुई थी। तब से यह लड़ाई जारी है। वहीं पाकिस्तान कहता है कि विलय कानूनी प्रक्रिया के तहत हुआ था। लेकिन इसके बाद जो हुआ,उसने विवाद को खत्म करने के बजाय और गहरा कर दिया। अगले दशकों में बलूचिस्तान में कई बार विद्रोह हुए। 1948 के बाद 1950 और 1960 के दशक में, फिर 1970 के दशक में और 2000 के दशक से एक नया दौर शुरू हुआ जो आज तक जारी है।

क्यों खत्म नहीं हुआ बलूचिस्तान का विद्रोह?

पाकिस्तान ने कई दशकों में बड़े सैन्य अभियान चलाए। विद्रोही संगठनों के खिलाफ कार्रवाई की गई, सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ाई गई और कई इलाकों में कड़ी सैन्य निगरानी रखी गई। इसके बावजूद संघर्ष बार-बार लौट आता है। इसकी पहली और सबसे बड़ी वजह हैबलूचिस्तान का विशाल और कठिन भूगोल।

अगर देखें तो बलूचिस्तान क्षेत्रफल के लिहाज से पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है। इसका क्षेत्रफल लगभग 3.47 लाख वर्ग किलोमीटर है,जो पाकिस्तान के कुल क्षेत्रफल का करीब 44 प्रतिशत है। लेकिन इसकी आबादी अपेक्षाकृत कम है और बड़े इलाके दूर-दूर तक फैले हुए हैं। यहां ऊंचे पहाड़ हैं,विशाल रेगिस्तानी क्षेत्र हैं,पथरीली जमीन है और कई दूरदराज इलाके हैं जहां पहुंचना ही मुश्किल होता है।

किसी सेना के लिए किसी शहर या छोटे क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित करना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है। लेकिन इतने विशाल क्षेत्र की हर घाटी,हर पहाड़ी रास्ते और हर दूरदराज बस्ती पर लगातार निगरानी रखना बेहद मुश्किल काम है। यही कारण है कि सुरक्षा बल किसी क्षेत्र में अभियान चलाकर अस्थायी नियंत्रण तो स्थापित कर सकते हैं,लेकिन पूरे इलाके में स्थायी और प्रभावी नियंत्रण बनाए रखना बड़ी चुनौती बन जाता है।

दूसरी बड़ी समस्या- स्थानीय लोगों का भरोसा

इसके साथ ही किसी भी लंबे विद्रोह को खत्म करने के लिए सिर्फ सैनिकों और हथियारों की जरूरत नहीं होती। सुरक्षा एजेंसियों को स्थानीय लोगों का सहयोग और भरोसा भी चाहिए। बलूचिस्तान में लंबे समय से राजनीतिक अधिकारों, विकास, मानवाधिकारों और कथित जबरन गायब किए जाने के मामलों को लेकर गंभीर शिकायतें रही हैं। बलूच मानवाधिकार कार्यकर्ता और राष्ट्रवादी संगठन आरोप लगाते रहे हैं कि सुरक्षा अभियानों के दौरान आम नागरिकों को नुकसान पहुंचा और बड़ी संख्या में लोगों को कथित तौर पर जबरन गायब किया गया। पाकिस्तानी सरकार और सेना ऐसे आरोपों से इनकार करती रही है या उन्हें सुरक्षा परिस्थितियों और आतंकवाद विरोधी अभियानों के संदर्भ में देखती है।

लेकिन असली समस्या यह है कि जब किसी क्षेत्र की बड़ी आबादी और राज्य के बीच भरोसे की कमी पैदा हो जाती है, तो खुफिया जानकारी जुटाना और विद्रोही संगठनों को स्थानीय स्तर पर अलग-थलग करना मुश्किल हो जाता है। सेना किसी गांव या पहाड़ी पर नियंत्रण कर सकती है, लेकिन लोगों के मन में भरोसा सिर्फ सैन्य कार्रवाई से पैदा नहीं किया जा सकता। यही पाकिस्तान की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है।

जमीन के नीचे अरबों डॉलर का खजाना, ऊपर विकास का सवाल

बलूचिस्तान की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक उसके प्राकृतिक संसाधन हैं। यह इलाका प्राकृतिक गैस, कोयला, तांबा, सोना और दूसरे खनिज संसाधनों से समृद्ध है। पाकिस्तान की कई महत्वपूर्ण खनिज परियोजनाएं इसी प्रांत में हैं। रेको दिक दुनिया की बड़ी तांबा और सोना खनन परियोजनाओं में गिनी जाती है।

बलूच राष्ट्रवादी संगठनों की प्रमुख शिकायत है कि उनके क्षेत्र के संसाधनों का लाभ स्थानीय आबादी तक पर्याप्त रूप से नहीं पहुंचता। उनका आरोप है कि संसाधनों से होने वाला फायदा पाकिस्तान के दूसरे हिस्सों को ज्यादा मिलता है, जबकि बलूचिस्तान के कई इलाके बुनियादी सुविधाओं और विकास के मामले में पीछे रह जाते हैं। यही असंतोष राजनीतिक संघर्ष को और गहरा करता है।

किसी भी इलाके में अगर लोगों को यह महसूस हो कि उनकी जमीन से गैस,सोना और तांबा निकाला जा रहा है,लेकिन उन्हें बदले में रोजगार,शिक्षा,स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचा नहीं मिल रहा,तो संसाधन विकास का माध्यम बनने के बजाय राजनीतिक संघर्ष का कारण बन सकते हैं।

ग्वादर और चीन की एंट्री ने बढ़ाई अहमियत

बलूचिस्तान सिर्फ संसाधनों की वजह से महत्वपूर्ण नहीं है। यहां स्थित ग्वादर बंदरगाह ने इसकी रणनीतिक अहमियत कई गुना बढ़ा दी है। ग्वादर अरब सागर के किनारे स्थित है और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे यानी CPEC का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। चीन ने पाकिस्तान में बुनियादी ढांचे,ऊर्जा और संपर्क परियोजनाओं में भारी निवेश किया है। चीन के लिए ग्वादर का महत्व इसलिए भी बड़ा है क्योंकि यह उसके व्यापक क्षेत्रीय आर्थिक और समुद्री रणनीतिक हितों से जुड़ा है।

लेकिन बलूच विद्रोही संगठनों का एक हिस्सा CPEC और इससे जुड़ी परियोजनाओं को बाहरी नियंत्रण का प्रतीक मानता है। उनका आरोप है कि इन परियोजनाओं का फायदा स्थानीय बलूच आबादी के बजाय पाकिस्तान के सत्ता केंद्र और विदेशी निवेशकों को ज्यादा मिलता है। यही वजह है कि अतीत में चीन से जुड़े नागरिकों और परियोजनाओं को निशाना बनाकर कई हमले किए गए हैं। इसलिए बलूचिस्तान का संकट अब केवल पाकिस्तान और बलूच विद्रोहियों के बीच का मामला नहीं रह गया। इसमें चीन के बड़े आर्थिक और रणनीतिक हित भी जुड़े हुए हैं।

तीन देशों की सीमाएं और अरब सागर का रणनीतिक महत्व

बलूचिस्तान की भौगोलिक स्थिति पाकिस्तान के लिए इसे और संवेदनशील बनाती है। इसकी सीमा ईरान और अफगानिस्तान से लगती है और दक्षिण में इसे अरब सागर तक पहुंच हासिल है। यानी यह पाकिस्तान के पश्चिमी सीमा क्षेत्र, समुद्री सुरक्षा और क्षेत्रीय संपर्क तीनों के लिए महत्वपूर्ण है।

यदि यहां लंबे समय तक अस्थिरता बनी रहती है तो पाकिस्तान को सिर्फ आंतरिक विद्रोह से नहीं बल्कि सीमा पार आवाजाही, हथियारों की तस्करी और उग्रवादी समूहों की गतिविधियों जैसी सुरक्षा चुनौतियों का भी सामना करना पड़ सकता है। इसी वजह से पाकिस्तान बलूचिस्तान को किसी सामान्य प्रांतीय समस्या की तरह नहीं देखता। उसके लिए यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा है।

अगर बलूचिस्तान अलग हो गया तो क्या होगा?

अगर भविष्य में बलूचिस्तान पाकिस्तान से अलग होकर स्वतंत्र राज्य बन जाता है,तो पाकिस्तान को कई स्तरों पर भारी झटका लग सकता है।

1. पाकिस्तान अपना सबसे बड़ा प्रांत खो देगा

बलूचिस्तान पाकिस्तान के कुल क्षेत्रफल का करीब 44 प्रतिशत हिस्सा है। इसके अलग होने का मतलब पाकिस्तान के नक्शे में बहुत बड़ा बदलाव होगा। यह केवल जमीन का नुकसान नहीं होगा,बल्कि पश्चिमी पाकिस्तान की रणनीतिक गहराई और महत्वपूर्ण सीमा क्षेत्रों पर नियंत्रण में भी बड़ा परिवर्तन आएगा। पाकिस्तान क्षेत्रफल के लिहाज से काफी छोटा हो जाएगा और उसकी भौगोलिक संरचना पूरी तरह बदल जाएगी।

2. ग्वादर बंदरगाह पर सबसे बड़ा झटका

बलूचिस्तान के अलग होने की स्थिति में सबसे संवेदनशील सवाल ग्वादर का होगा। यदि ग्वादर किसी स्वतंत्र बलूचिस्तान के नियंत्रण में चला जाता है, तो पाकिस्तान की समुद्री और आर्थिक रणनीति को गंभीर नुकसान हो सकता है। इसका सीधा असर चीन पर भी पड़ सकता है,क्योंकि CPEC की कई रणनीतिक योजनाएं ग्वादर और बलूचिस्तान से होकर गुजरती हैं। पाकिस्तान के लिए ग्वादर सिर्फ एक बंदरगाह नहीं है। यह भविष्य की व्यापारिक और रणनीतिक योजनाओं का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

3. गैस, सोना और तांबे के संसाधनों का नुकसान

बलूचिस्तान के पास पाकिस्तान के महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन हैं। प्राकृतिक गैस के भंडारों से लेकर तांबा और सोने की विशाल परियोजनाओं तक, इस क्षेत्र की आर्थिक क्षमता बहुत बड़ी है। अगर यह इलाका पाकिस्तान के नियंत्रण से बाहर हो जाता है तो पाकिस्तान को संसाधनों और भविष्य की खनिज आय के एक बड़े हिस्से से हाथ धोना पड़ सकता है।

रेको दिक जैसी परियोजनाएं लंबे समय में पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। इसलिए बलूचिस्तान का अलग होना पाकिस्तान के खनिज और निवेश क्षेत्र के लिए बड़ा झटका होगा।

4. चीन-पाकिस्तान रिश्तों की रणनीति बदल जाएगी

बलूचिस्तान में चीन का निवेश सिर्फ आर्थिक नहीं बल्कि रणनीतिक महत्व भी रखता है। यदि यहां पाकिस्तान का नियंत्रण खत्म होता है, तो CPEC परियोजनाओं के भविष्य पर सवाल खड़े होंगे। चीन को किसी नए स्वतंत्र बलूचिस्तान के साथ अलग राजनीतिक और आर्थिक समझौते करने पड़ सकते हैं। पाकिस्तान के लिए यह बड़ा कूटनीतिक झटका होगा क्योंकि चीन के साथ उसकी साझेदारी उसकी विदेश और सुरक्षा नीति का अहम हिस्सा है।

5. पाकिस्तान की पश्चिमी सीमा पूरी तरह बदल जाएगी

बलूचिस्तान के अलग होने के बाद पाकिस्तान की ईरान और अफगानिस्तान से जुड़ी सीमा व्यवस्था बदल जाएगी। आज बलूचिस्तान पाकिस्तान और इन दोनों देशों के बीच विशाल सीमा क्षेत्र उपलब्ध कराता है। इसके अलग होने के बाद पाकिस्तान की पश्चिमी सुरक्षा संरचना अलग रूप ले लेगी।

क्या दूसरे क्षेत्रों पर भी असर पड़ेगा?

बलूचिस्तान के अलग होने का सबसे बड़ा राजनीतिक असर पाकिस्तान की क्षेत्रीय एकता पर पड़ सकता है। पाकिस्तान एक बहु-जातीय और बहुभाषी देश है। पंजाब,सिंध,खैबर पख्तूनख्वा और दूसरे क्षेत्रों की अपनी अलग ऐतिहासिक और राजनीतिक पहचान रही है। अगर बलूचिस्तान अलग होने में सफल होता है, तो दूसरे क्षेत्रों में भी अधिक स्वायत्तता और राजनीतिक अधिकारों की मांग तेज होने की आशंका पैदा हो सकती है। खास तौर पर खैबर पख्तूनख्वा और पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को लेकर राजनीतिक बहस और तेज हो सकती है।

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