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संगठन से सत्ता तक: विनोद तावड़े रणनीति का वो चेहरा जिस पर BJP को है भरोसा

विनोद तावड़े की राजनीतिक कार्यशैली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उनकी भूमिका केवल चुनावी गणित तक सीमित नहीं रहती। 2022 के राष्ट्रपति चुनाव में NDA उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू के चुनाव प्रभारी के रूप में उन्होंने विभिन्न राज्यों में बैठकों का समन्वय किया।

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भाजपा ने विनोद तावड़े का राष्ट्रीय महासचिव पद रखा बरकरार। तस्वीर-AI
Written by: Ravikant Rai
Updated Aug 18, 2026, 08:39 IST
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Vinod Tawde News: भारतीय राजनीति में कुछ नेता ऐसे होते हैं, जिनकी पहचान केवल चुनाव जीतने या किसी संवैधानिक पद तक सीमित नहीं रहती। उनकी असली ताकत उस संगठन को समझने में दिखाई देती है, जिसके जरिए राजनीति जमीन पर आकार लेती है। विनोद तावड़े इसी श्रेणी के उन नेताओं में हैं, जिनके लिए राजनीति केवल मंच, भाषण और चुनावी नारों का खेल नहीं, बल्कि संगठन, संवाद, रणनीति और लगातार काम करने की प्रक्रिया है।

विद्यार्थी परिषद की छात्र राजनीति से हुई शुरुआत आज भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव के रूप में उनकी भूमिका को इसी व्यापक संगठनात्मक क्षमता के विस्तार के तौर पर दिखाई देती है। अलग-अलग राज्यों, चुनावों और अभियानों में पार्टी ने उन्हें जो जिम्मेदारियां दीं, उनका दायरा बताता है कि नेतृत्व उनके भीतर केवल राजनीतिक समझ ही नहीं, बल्कि जटिल परिस्थितियों में संगठन को एक दिशा देने की क्षमता भी देखता है।

संगठन को साथ लेकर चलने की कला

विनोद तावड़े की राजनीतिक कार्यशैली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उनकी भूमिका केवल चुनावी गणित तक सीमित नहीं रहती। 2022 के राष्ट्रपति चुनाव में NDA उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू के चुनाव प्रभारी के रूप में उन्होंने विभिन्न राज्यों में बैठकों का समन्वय किया और सहयोगी दलों तथा समर्थक दलों को एकजुट करने में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद 2025 के उपराष्ट्रपति चुनाव में NDA उम्मीदवार सी.पी. राधाकृष्णन के लिए भी उन्हें चुनाव प्रभारी की जिम्मेदारी दी गई। यह जिम्मेदारी अपने आप में महत्वपूर्ण है, क्योंकि ऐसे चुनावों में केवल पार्टी संगठन पर्याप्त नहीं होता। अलग-अलग राज्यों के राजनीतिक समीकरणों, सहयोगी दलों और समर्थन जुटाने की क्षमता का एक साथ प्रबंधन करना पड़ता है। तावड़े की भूमिका इसी समन्वयकारी राजनीतिक व्यक्तित्व को सामने लाती है।

हरियाणा से बिहार तक, जहां चुनौती मिली, वहां संगठन को साधा

2020 में हरियाणा का प्रभार मिलने के बाद उन्होंने पार्टी संगठन को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई लेकिन उनकी रणनीतिक क्षमता की सबसे ज्यादा चर्चा बिहार की जिम्मेदारी मिलने के बाद हुई। 2022 में बिहार की जिम्मेदारी संभालने के बाद तावड़े राज्य के बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच भाजपा और NDA की रणनीति के प्रमुख चेहरों में शामिल हुए। 2023 में राज्य में RJD-JDU सरकार के स्थान पर NDA सरकार बनने के घटनाक्रम में उनकी रणनीतिक भूमिका रही। इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में NDA के प्रदर्शन और फिर 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में ऐतिहासिक जीत तक उनकी संगठनात्मक रणनीति की निरंतरता दिखाई देती है।

vinod tawde

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यूपी जैसे बड़े राज्य का कमान सौंपा जा सकता है

सूत्र बताते हैं की यूपी में विधान सभा के चुनाव प्रस्तावित है अगले साल और विनोद तावड़े एक बार यूपी जैसे बड़े राज्य का कमान सौंपा जा सकता है , जहां चुनौती जीत की हैट्रिक लगाने की है। भाजपा जैसे विशाल संगठन में सदस्यता अभियान केवल आंकड़ों का खेल नहीं होता। इसके लिए देशभर में संगठनात्मक नेटवर्क, राज्यों के नेतृत्व, कार्यकर्ताओं और स्थानीय स्तर तक लगातार समन्वय की आवश्यकता होती है। ‘संगठन पर्व 2024’ के दौरान राष्ट्रीय सदस्यता अभियान के प्रभारी के रूप में तावड़े ने इस अभियान का नेतृत्व किया और दस्तावेज़ के अनुसार भाजपा ने महज 15 दिनों में देशभर में 5 करोड़ सदस्यों को जोड़ने का लक्ष्य हासिल किया।

यह उपलब्धि उनके संगठनात्मक प्रबंधन की तस्वीर को और स्पष्ट करती है। एक ओर जहां चुनावी रणनीति तत्काल राजनीतिक परिणामों से जुड़ी होती है, वहीं सदस्यता अभियान संगठन की दीर्घकालिक ताकत तैयार करता है। दोनों क्षेत्रों में जिम्मेदारी मिलना इस बात का संकेत है कि पार्टी उन्हें संगठन के व्यापक ढांचे को समझने वाले नेता के रूप में देखती है।

चुनावी मशीनरी का प्रबंधन, एक साथ कई मोर्चे

तावड़े की जिम्मेदारियों की सूची पर नजर डालें तो उसमें राज्यों की विविधता और राजनीतिक परिस्थितियों की जटिलता साफ दिखाई देती है। उत्तर प्रदेश में संगठनात्मक चुनावों की जिम्मेदारी से लेकर 2024 के लोकसभा चुनाव में स्टार कैंपेनर टूर की रणनीति तैयार करने तक उन्हें अलग-अलग स्तर पर काम सौंपा गया। त्रिपुरा और राजस्थान में मुख्यमंत्री पद के चुनाव के पर्यवेक्षक की भूमिका भी उन्होंने निभाई। उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ में मंत्रिपरिषद के विस्तार से जुड़ी जिम्मेदारी भी उनके हिस्से आई।

केरल चुनाव में छोड़ी अपनी छाप

गुजरात, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, उत्तराखंड और दिल्ली समेत कई राज्यों के विधानसभा चुनावों में पार्टी की रणनीति और चुनावी संचालन में उनकी भूमिका रही। 2026 के केरल विधानसभा चुनाव में भी वे चुनाव प्रभारी रहे, जहां भाजपा ने अपना अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। इन जिम्मेदारियों को जोड़कर देखें तो तावड़े की राजनीतिक छवि का एक महत्वपूर्ण पहलू उभरता है, वे ऐसे नेता हैं जिन्हें पार्टी अलग-अलग राज्यों की अलग-अलग राजनीतिक परिस्थितियों में संगठन और चुनावी रणनीति को लागू करने के लिए इस्तेमाल करती है।

राजनीति के साथ सामाजिक सरोकार

लेकिन तावड़े की तस्वीर केवल चुनावी रणनीतिकार की नहीं है। राष्ट्रीय स्तर के अभियानों से लेकर संकट के समय नागरिकों तक पहुंचने वाली जिम्मेदारियों में भी उनकी भूमिका दिखाई देती है। ‘मन की बात’, ‘हर घर तिरंगा यात्रा’, ‘चंद्रयान मिशन’ और ‘मेरी माटी मेरा देश’ जैसे राष्ट्रव्यापी अभियानों के राष्ट्रीय समन्वयक के रूप में उन्होंने इन अभियानों को देश के घर-घर तक पहुंचाने के प्रयासों का नेतृत्व किया। यूक्रेन युद्ध के दौरान ‘ऑपरेशन गंगा’ के तहत युद्ध क्षेत्र में फंसे भारतीय छात्रों की सुरक्षित वापसी के प्रयासों और उनके परिवारों के साथ संवाद स्थापित करने में भी उनकी भूमिका रही। यही भूमिका उनके व्यक्तित्व के उस पक्ष को सामने लाती है जिसमें संगठनात्मक राजनीति केवल पार्टी कार्यालय तक सीमित नहीं रहती, बल्कि संकट में लोगों तक पहुंचने और संवाद कायम करने का माध्यम भी बनती है।

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योजनाओं के क्रियान्वयन पर भी नजर

तावड़े की जिम्मेदारियों में सरकारी योजनाओं के राष्ट्रीय स्तर पर क्रियान्वयन की निगरानी भी शामिल रही। प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना, प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना और प्रधानमंत्री स्वामित्व योजना जैसी योजनाओं की राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी निगरानी का दायित्व उन्होंने संभाला। यह पहलू उनके राजनीतिक व्यक्तित्व को चुनावी रणनीति से आगे ले जाता है। संगठन और सत्ता के बीच सरकार की योजनाओं को जनता तक पहुंचाने की प्रक्रिया भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितना चुनाव जीतना।

महाराष्ट्र से दिल्ली तक, एक लंबी संगठनात्मक यात्रा

महाराष्ट्र से राज्यसभा के लिए निर्वाचित होकर तावड़े अब राष्ट्रीय राजनीति के उस स्तर पर हैं जहां उनकी भूमिका केवल एक राज्य तक सीमित नहीं है। वर्तमान में वे वित्त संबंधी स्थायी समिति और विदेश मंत्रालय की परामर्शदात्री समिति के सदस्य भी हैं।

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