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उद्योग नगरी से कोचिंग सिटी और अब सुसाइड सिटी, जानें कोटा कैसे हो गया 'फेल'

  • Authored by: प्रशांत श्रीवास्तव
  • Updated Aug 29, 2023, 01:37 PM IST

Kota Suicide Cases And City History: भले ही आज कोटा की पहचान एक कोचिंग सेंटर के रूप में है। लेकिन एक समय उद्योग नगरी के रूप में जाना जाता था। और उसे भारत का दूसरा कानपुर कहा जाता था। लेकिन अब वह पहचान मिट गई है, और अब वह कोचिंग के गढ़ के रूप में पूरे देश में जाना जाता है।

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कोटा में 6000 करोड़ का कोचिंग बाजार

Kota Suicide Cases And Its History: कोटा शहर की पहचान एक ऐसे 14 साल के बच्चे से शुरू हुई, जो आज से करीब 500 साल पहले महान योद्धा था। और उसके युद्ध कौशल की वजह से बूंदी के राजा ने अपने छोटे राजकुमार राव माधो सिंह को कोटा शहर गिफ्ट के रूप में दिया था। लेकिन विडंबना यह है कि आज वहीं कोटा शहर बच्चों की मौतों के लिए चर्चा में है। और यह मौतें कोई हादसा या बीमारी की वजह से नहीं हो रही हैं, बल्कि देश के कोने-कोने से अपने मां-बाप के सपने पूरा करने आए बच्चों के आत्महत्या करने से हो रही हैं।

ये वो बच्चे हैं जिन्हें IIT, मेडिकल और दूसरी प्रतिष्ठित परीक्षाओं में सफल होने के प्रेशर को मैनेज करने से ज्यादा आसान, मौत को गले लगाना लगा। सबसे अहम बात यह है कि भले ही कोटा में मां-बाप के चिराग बुझ रहे हैं, लेकिन कभी उद्योग नगरी के रूप में प्रसिद्ध कोटा अब 6000 करोड़ रुपये की कोचिंग सिटी के रूप में एक नया बाजार बन गया है। और हर साल करीब 2 लाख बच्चों इस बाजार में कस्टमर बनकर पहुंच रहे हैं।

जनवरी से 24 आत्महत्या के मामले

विभिन्न रिपोर्टों की मानें तो कोरोना के बाद कोटा में छात्रों के सुसाइड के मामले 60 फीसदी तक बढ़ गए है। अकेले 2023 में आत्महत्या करने वाले छात्रों की संख्या 24 पहुंच गई है। इसके पहले साल 2022 में सुसाइड के 15, 2021 में 9, 2018 में 12 और 2017 में 10 केस सामने आए थे। आंकड़ों से साफ है कि कोटा में मौत के आंकड़े बढ़ते जा रहे हैं। ऐसा क्यों हो रहा है, इस पर मानसिक और सामाजिक दबाव तो साफ तौर दिखता है। लेकिन इसके पीछे इकोनॉमी का भी प्रेशर हैं। जिसका कुछ हद तक इशारा राजस्थान सरकार में मंत्री महेश जोशी ने छात्रों के बीच एजुकेशन लोन को तनाव का प्रमुख कारण बताया है। उन्होंने इसके लिए केंद्र से एक नीति बनाने का भी आग्रह किया ताकि माता-पिता को शिक्षा के लिए पैसे उधार न लेना पड़े।

सालाना 3-4 लाख का खर्च

अगर एक बच्चा कोटा की कोचिंग एडमिशन लेकर वहां रहकर तैयारी करता है, तो उसके ऊपर सालाना 3-4 लाख रुपये का खर्ज आम बात है। क्योंकि वहां पर कोचिंग संस्थानों में क्रैश कोर्स से लेकर 2 साल तक के फुल टाइम की फीस 1.70 रुपये तक जाती है। इसके अलावा 15000-20000 रुपये मंथली का न्यूनतम खर्च रहने खाने-पीने का होता है। ऐसे में अगर बच्चा आईआईटी, मेडिकल प्रवेश परीक्षा में सफल नहीं होता है तो यह सारा पैसा बर्बाद होने का मानसिक दबाव तो एक मिडिल और लोअर मिडिल क्लास फैमिली पर रहता ही है।

कभी उद्योग नगरी के रुप में था फेमस

भले ही आज कोटा की पहचान एक कोचिंग सेंटर के रूप में है। लेकिन एक समय उद्योग नगरी के रूप में जाना जाता था। और उसे भारत का दूसरा कानपुर कहा जाता था। लेकिन अब वह पहचान मिट गई है, और अब वह कोचिंग के गढ़ के रूप में पूरे देश में जाना जाता है। आईआईएम बंगलौर की एक रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार 70-80 के दशक में कोटा एक उभरता हुई औद्योगिक नगरी थी।

उस वक्त वहां पर जे.के.सिथेंटिक्स, ओरिएंटल पॉवर केबल्स, SAMCOE ग्लासेज, Instrumentations Limited (IL) जैसी सरकारी कंपनी भी मौजूद थी। लेकिन 1980 और 2010 के बीच में करीब 300 बढ़ी और छोटी कंपनियां बंद हो गई। और उभरता हुआ औद्योगिक शहर तबाह हो गया। और उसकी जगह सपने बेचने वाले कोचिंग संस्थानों ने ले ली है।

प्रशांत श्रीवास्तव
प्रशांत श्रीवास्तवauthor

करीब 17 साल से पत्रकारिता जगत से जुड़ा हुआ हूं। और इस दौरान मीडिया की सभी विधाओं यानी टेलीविजन, प्रिंट, मैगजीन, डिजिटल और बिजनेस पत्रकारिता में काम करने का मौका मिला। इस समय Timesnowhindi.com में टीम लीड के रुप में बिजनेस, ऑटो, यूटीलिटी, टेक सेक्शन में अपना योगदान दे रहा हूं। करियर का पहला ब्रेक हैदराबाद स्थित मीडिया संस्थान ईटीवी से टेलीविजन के जरिए हुआ। यहां पर टेलीविजन पत्रकारिता की बारीकियों को समझने का मौका मिला। और उसके बाद अगला पड़ाव दिल्ली स्थित दैनिक भास्कर समूह का बिजनेस भास्कर रहा। यहां से बिजनेस पत्रकारिता में कदम रखा। और यह सफर वित्त मंत्रालय की रिपोर्टिंग से लेकर बैंकिंग, इंश्योरेंस, ऑटो, एफएमसीजी, एमएमएमई, टेलीकॉम सेक्टर की ग्राउंड रिपोर्ट से लेकर कॉरपोरेट जगत की खबरें और इकोनॉमी से जुड़ी खबरों से गुजरते हुए अमर उजाला, मनी भास्कर वेबसाइट से होकर आउटलुक मैगजीन पहुंचा। यहां पर पॉलिटिकल खबरों को करने का मौका मिला। आउटलुक में रहते हुए भाजपा और कांग्रेस पार्टी को भी कवर किया। इस दौरान दिल्ली दंगों पर ग्राउंड रिपोर्ट से लेकर सीएए आंदोलन, किसान आंदोलन और कृषि जगत, वाइल्ड लाइफ से जुड़ी ग्राउंड रिपोर्ट भी करने का मौका मिला। करियर के इस सफर में 2014 लोक सभा चुनाव, 2019 लोक सभा चुनाव, इसके अलावा उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव, राजस्थान विधान सभा, मध्य प्रदेश विधान सभा चुनाव की ग्राउंड रिपोर्ट भी की। पिछले 16 साल से केंद्रीय बजट की बारीकियों को समझकर उसे आम भाषा में लोगों तक पहुंचाने का भी प्रयास किया है। 17 साल के करियर में करीब 10 साल डिजिटल मीडिया का अनुभव रहा है। पिछले 3 साल से टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहा हूं। पत्रकारिता का ककहरा माखन लाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल से सीखा है।

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