OMG: दुनिया में आप कहीं भी चले जाएं बाइक, गाड़ी चलाने के लिए लाइसेंस की जरूरत पड़ती है। बिना लाइसेंस गाड़ी चलाते हुए अगर कोई पकड़ा जाता है, तो उस पर फाइन लगाया जाता है। लेकिन, अगर आप से कहा जाए कि एक समय ऐसा भी था जब साइकिल (Bicycle License) चलाने के लिए भी लाइसेंस बनवाना पड़ता था, तो आप जरूर चौंक जाएंगे। हो सकता है कई लोगों को इस पर यकीन करना मुश्किल हो जाए। इन दिनों सोशल मीडिया पर एक पोस्ट वायरल हो रहा है, जिसमें कहा जा रहा है कि एक समय देश में साइकिल चलाने के लिए भी लाइसेंस लेना पड़ता था। इतना ही नहीं उसकी कीमत भी तय थी। तो आइए, जानते हैं क्या है इस वायरल पोस्ट की सच्चाई?
वायरल पोस्ट में दावा किया जा रहा है कि ब्रिटिश काल और आजादी के बाद कुछ समय तक भारत के ज्यादातर शहरों, गांवों और कस्बों में साइकिल चलाने के लिए लाइसेंस लेना अनिवार्य था। नगर पालिका, पंचायत समिति या कैंटोनमेंट बोर्ड इसकी अनुमति देते थे। इतना ही नहीं कहा ये भी जा रहा है कि केवल एक साल के लिए लाइसेंस मिलता था और फिर नए साल उसे दोबारा लेना पड़ता था। सबसे बड़ी बात ये है कि एक साल के लाइसेंस के लिए लोगों को दो रुपए देने पड़ते थे। उस समय दो रुपए की क्या वैल्यू होगी आप अंदाज लगा सकते हैं। सोशल मीडिया पर इन दिनों एक पोस्ट वायरल हो रहा है, जिसमें लाइसेंस को लेकर सारी जानकारी दी गई। हालांकि, टाइम्स नाउ नवभारत की इसकी पुष्टि नहीं करता है। लेकिन, कुछ रिपोर्ट में यह दावा किया जा रहा है कि पहले साइकिल चलाने के लिए लाइसेंस लेना अनिवार्य था। देखें पोस्ट...
ये था नियम
पोस्ट में यह भी दावा किया गया है कि लाइसेंस मिलने पर छोटा सा पीतल या एल्यूमिनियम का टैग दिया जाता था। उस टैग को हेड ट्यूब या फ्रेम पर लगाना अनिवार्य था। बिना लाइसेंस के साइकिल चलाते पकड़े गए तो स्थानीय कर्मचारी जुर्माना वसूला करते थे। इतना ही नहीं रात में साइकिल पर लाइट लगाना भी जरूरी था। वरना लाइसेंस नहीं मिलता था। 1940 के दशक में साइकिल एक लग्जरी वस्तु मानी जाती थी,खासकर गांवों और छोटे कस्बों में साइकिल रखना स्टेटस सिंबल था। बाद में धीरे-धीरे मोटर वाहनों पर इसका फोक्स शिफ्ट हो गया और साइकिल को इससे मुक्त कर दिया गया।
