Times Now Navbharat Explainer: अमेरिका और ईरान के बीच हुए हालिया 14-बिंदुओं वाले फ्रेमवर्क समझौते ने दुनिया भर के भू-राजनीतिक समीकरणों को हिलाकर रख दिया है। एक तरफ जहां वाशिंगटन और तेहरान के बीच युद्ध का खतरा कम होने के संकेत मिल रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ खाड़ी (Gulf Country) देशों की नींद उड़ी हुई है।
इस समझौते में आर्थिक लाभ और प्रतिबंधों में ढील की बात तो है, लेकिन असली चर्चा उस '300 अरब डॉलर' के पुनर्निर्माण और निवेश पैकेज को लेकर है, जो इस डील का सबसे पेचीदा हिस्सा बना हुआ है। अब सबसे बड़ा सवाल ये है कि ईरान को 300 अरब डॉलर (300 Billion Dollar Iran Fund) कौन देगा?
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300 अरब डॉलर का सच
सबसे पहले इस बड़ी रकम के स्रोत को समझना जरूरी है। सोशल मीडिया और राजनीतिक बहसों में यह दावा किया जा रहा है कि अमेरिका, ईरान (US Iran Framework Agreement) को भारी-भरकम राशि दे रहा है, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इसे पूरी तरह खारिज किया है। उनका स्पष्ट कहना है कि यह 'डेमोक्रेटिक प्रोपेगैंडा' है और अमेरिकी टैक्सपेयर्स का एक भी पैसा ईरान की तिजोरी में नहीं जाएगा।
असल में यह कोई सरकारी ग्रांट या मुआवजा नहीं है। यह एक 'प्राइवेट सेक्टर इन्वेस्टमेंट फंड' है। योजना यह है कि जैसे ही ईरान पर लगे प्रतिबंध पूरी तरह हटेंगे और स्थिरता आएगी, वैसे ही दुनिया भर की कंपनियां वहां व्यावसायिक अवसरों की तलाश में पैसा लगाएंगी।
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक 150 अरब डॉलर से अधिक की प्रतिबद्धता पहले ही हो चुकी है, जिसमें अमेरिका, खाड़ी देश, एशिया (कोरिया, जापान) और अफ्रीका की निजी कंपनियां शामिल हैं। यह पैसा 'युद्ध के मुआवजे' के रूप में नहीं, बल्कि भविष्य के मुनाफे की उम्मीद में बिजनेस करने के लिए दिया जा रहा है।
खाड़ी देशों की क्या है चिंता ?
भले ही अमेरिका-ईरान के बीच का तनाव कम हो रहा हो, लेकिन सऊदी अरब और यूएई जैसे देशों के लिए शांति का अर्थ सिर्फ गोलाबारी रुकना नहीं है। खाड़ी देशों की सबसे बड़ी चिंता होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) है। यह दुनिया का सबसे व्यस्त समुद्री मार्ग है।
जहां से तेल के टैंकर गुजरते हैं। खाड़ी देशों का स्पष्ट कहना है कि अगर समझौता हुआ है, तो इस मार्ग पर बिना किसी रोक-टोक और धमकी के जहाजों की आवाजाही अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत सुनिश्चित होनी चाहिए।
इसके अलावा, उनकी चिंता ईरान के मिसाइल और ड्रोन कार्यक्रमों को लेकर है। खाड़ी देश चाहते हैं कि किसी भी अंतिम समझौते में केवल परमाणु कार्यक्रम ही नहीं, बल्कि ईरान द्वारा समर्थित प्रॉक्सी सशस्त्र समूहों की गतिविधियों और उनके पास मौजूद मिसाइल-ड्रोन तकनीक को भी शामिल किया जाए। उन्हें डर है कि अगर इन मुद्दों को नहीं सुलझाया गया, तो ईरान के आर्थिक रूप से मजबूत होने पर यह क्षेत्र और भी अस्थिर हो सकता है।
क्या खाड़ी देश भरेंगे ईरान की युद्ध की कीमत?
इस डील का सबसे विवादित पहलू यह है कि क्या खाड़ी देश इस निवेश में पैसा लगाएंगे? बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक राजनीतिक विश्लेषक अली अल-हैल की टिप्पणी इस पूरे मुद्दे को आईना दिखाती है। वे कहते हैं, "मैं नहीं चाहता कि हमारे देश ईरान को एक भी पैसा दें। उल्टा, ईरान को हमें उन मिसाइल और ड्रोन हमलों का मुआवजा देना चाहिए जो हमने झेले हैं।"
खाड़ी देशों में यह भावना घर कर गई है कि उन्हें एक ऐसे युद्ध की आर्थिक कीमत चुकाने के लिए मजबूर किया जा रहा है, जिसे उन्होंने शुरू ही नहीं किया था। अभी तक किसी भी खाड़ी देश ने आधिकारिक तौर पर ईरान के पुनर्निर्माण कोष में योगदान देने की बात स्वीकार नहीं की है।
अमेरिका के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि क्या वह अपने खाड़ी सहयोगियों को इस योजना के लिए आर्थिक रूप से राजी कर पाएगा, या फिर यह निवेश केवल पश्चिमी और एशियाई कंपनियों तक सीमित रह जाएगा।
