UP Election 2027: उत्तर प्रदेश में हर बीते वक्त के साथ सियासी पारा बढ़ता जा रहा है। 2027 विधानसभा चुनाव के मद्देनजर सभी राजनीतिक दल अपने-अपने समीकरण साधने में जुटे हैं। सिर्फ बीजेपी या समाजवादी पार्टी ही नहीं, बल्कि मायावती की बहुजन समाज पार्टी और जयंत चौधरी के राष्ट्रीय लोकदल ने भी अपनी कमर कस ली है। इसी बीच सपा मुखिया अखिलेश यादव ने कुछ ऐसा कह दिया, जिस पर जयंत चौधरी बिफर उठे। मामले ने इतनी तूल पकड़ ली कि अखिलेश की 'बुआ' को भी टिप्पणी करनी पड़ी।
पहले समझिए माजरा क्या है। दरअसल, विवाद की शुरुआत तब हुई जब अखिलेश यादव ने हाल ही में एक कार्यक्रम के दौरान बिना किसी का नाम लिए टिप्पणी की। उन्होंने कहा, “हम लोगों ने चवन्नी को रुपया बना दिया, फिर भी छोड़कर चले गए।” उनके इस बयान को राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी) प्रमुख जयंत चौधरी पर तंज के तौर पर देखा जा रहा है।
अखिलेश यादव ने जयंत चौधरी पर कसा तंज। PTI
दरअसल, यह टिप्पणी जनवरी 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान जयंत चौधरी के एक पुराने बयान से जुड़ती है। उस समय सपा और आरएलडी गठबंधन में थे और जयंत के बीजेपी के साथ जाने की अटकलें लगाई जा रही थीं। तब उन्होंने इन अटकलों को खारिज करते हुए कहा था, “मैं कोई चवन्नी हूं जो पलट जाऊंगा?”
जयंत चौधरी ने क्या दिया जवाब
अखिलेश यादव के बयान का जयंत चौधरी ने भी जवाब दिया। जयंत चौधरी ने अखिलेश यादव का नाम लिए बगैर हमला बोला है। उन्होंने लिखा है- अगर सियासत की लड़ाई में कुछ सस्ते शब्द बोलने ही थे तो मेरा नाम लेकर बोल देते। कोई बात नहीं थी। जाट समाज को टारगेट करना और कहना ABCD हमने सिखाई? मैं इस अहंकार को देख चुका हूं करीब से और मानता हूं ऐसा आचरण सिर्फ पतन लाता है।
जयंत चौधरी ने अखिलेश यादव के बयान का दिया जवाब। PTI
साल 2022 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव सपा और आरएलडी ने मिलकर लड़ा था। हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले जयंत चौधरी ने सपा से नाता तोड़ लिया और भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में शामिल हो गए। एनडीए की सरकार बनने के बाद उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल में केंद्रीय मंत्री भी बनाया गया।
मायावती ने भी अखिलेश पर साधा निशाना
जयंत चौधरी के समर्थन में बसपा प्रमुख मायावती भी उतर आई हैं। उन्होंने अखिलेश के बयान की आलोचना करते हुए इसे जाट समाज और पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की विरासत का अपमान बताया और सपा प्रमुख से माफी की मांग की है। पूर्व सीएम ने कहा कि इस प्रकार की अहंकारी व अलोकतांत्रिक बयानबाज़ी के लिये उन्हें उस पार्टी से व उनके नेता से ही नहीं बल्कि स्वर्गीय चौधरी चरण सिंह जी के परिवार का अपमान करने हेतु पूरे जाट समाज से भी अविलम्ब माफी मांगनी चाहिये तो यह उचित होगा।
जयंत चौधरी की समर्थन में उतरीं मायावती। PTI
बची-कुची कसर सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के प्रमुख ओम प्रकाश राजभर ने भी पूरी कर दी। उन्होंने अखिलेश यादव पर जाट समुदाय का अपमान करने का आरोप लगाया। राजभर ने कहा कि जाट समाज ने मुलायम सिंह यादव को मुख्यमंत्री बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, लेकिन आज अखिलेश यादव उसी समुदाय के खिलाफ टिप्पणी कर रहे हैं।
राजभर ने कहा कि अखिलेश यादव को अपने पिता मुलायम सिंह यादव के राजनीतिक इतिहास को समझना चाहिए। उन्होंने दावा किया कि चौधरी चरण सिंह ने मुलायम सिंह यादव को राजनीति में आगे बढ़ने का अवसर दिया था। राजभर ने आरोप लगाया कि इसके बावजूद अखिलेश यादव अब चौधरी चरण सिंह और उनके समर्थक जाट समुदाय पर निशाना साध रहे हैं।
बदल रहा राज्य का सियासी समीकरण
इन सभी सियासी प्रपंच के बीच सवाल ये है कि क्या आगामी विधानसभा चुनाव से पहले मायावती और जयंत चौधरी हाथ मिलाएंगे? इसके बारे में कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी, क्योंकि आरएलडी और बीजेपी के गठबंधन में दोनों दलों को फायदा ही हुआ है। लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय लोकदल ने बीजेपी का दामन थाम लिया था। बीजेपी ने आरएलडी को लोकसभा की दो सीटें दी थीं, इनमें बागपत और बिजनौर लोकसभा सीटें शामिल थीं। इसके अलावा खुद जयंत चौधरी को केंद्र में मंत्री बनाया गया। यूपी सरकार की कैबिनेट में भी आरएलडी को जगह दी गई और अनिल कुमार योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे।
मायावती के साथ जयंत चौधरी की फाइल फोटो।
वहीं, राज्य में फिर से बहुजन समाज पार्टी को पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रहीं मायावती अपने दलित वोट बैंक को मजबूत करने की कोशिश में जुटी हैं। मुमकिन है कि 'बुआ' और 'बबुआ' के बीच सियासी बयानबाजी और बढ़ती ही जा सकती है। दरअसल, अखिलेश यादव की टिप्पणी को लेकर मायावती ने लंबा-चौड़ा पोस्ट लिखा।
उन्होंने पोस्ट में कहा कि सपा गठबंधन के मामले में केवल अपना काम निकालना जानती है और अपना काम निकालते ही गिरगिट की तरह अपना रंग बदल लेती है। साथ ही, दूसरी पार्टियों के बारे में अनाप-शनाप भाषा का भी खूब इस्तेमाल करती रहती है। सपा का यह पुराना रवैया रहा है। ऐसे में सर्वसमाज के लोग सपा की संकीर्ण और जातिवादी राजनीति से जरूर सावधान रहें।
मायावती ने कहा कि अखिलेश यादव अपने राजनीतिक फायदे के लिए अपने पीडीए में से पी को कभी पिछड़ा तो कभी पंडितों का हितैषी बता देते हैं, जबकि इनके बारे में सच्चाई तो यह है कि वे पिछड़े वर्गों में अपनी खुद की जाति के अलावा बाकी पिछड़े वर्गों, अल्पसंख्यकों और अपरकास्ट समाज में से खासकर ब्राह्मण समाज के भी हितैषी नहीं रहे हैं। मोटे तौर पर समझें तो मायावती किसी भी हाल में अपना वोट बैंक, खासकर दलित वर्ग को समाजवादी पार्टी की ओर जाने से रोकना चाहती हैं।
अब बात की जाए राष्ट्रीय लोकदल की। दरअसल, पार्टी अब सिर्फ जाटों तक सीमित न रहकर एक बड़े सोशल इंजीनियरिंग पर काम कर रही है। इसे आरएलडी का जेजीडीएम (जाट, गुर्जर, दलित, मुस्लिम) फॉर्मूला कहा जा रहा है। इसी के तहत राष्ट्रीय लोकदल गुर्जर सम्मेलन कराने जा रही है। माना जा रहा है कि अगर जयंत चौधरी का यह दांव चल गया तो आगामी विधानसभा चुनाव में सबसे ज्यादा नुकसान अखिलेश यादव की अगुवाई वाली समाजवादी पार्टी को होना तय माना जा रहा है।
आरएलडी की सोशल इंजीनियरिंग और चुनावी तैयारियां
JGDM फॉर्मूला पर फोकस
राष्ट्रीय लोकदल पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपना सामाजिक और राजनीतिक आधार मजबूत करने के लिए जाट, गुर्जर, दलित और मुस्लिम (JGDM) समीकरण पर काम कर रही है। पार्टी का लक्ष्य इन चार प्रमुख सामाजिक समूहों को एक मंच पर लाकर अपना जनाधार विस्तार करना है।
403 विधानसभा सीटों पर तैयारी
आरएलडी नेताओं और कार्यकर्ताओं के मुताबिक, जयंत चौधरी के निर्देश पर पार्टी संगठन उत्तर प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों पर जमीनी स्तर पर सक्रिय रहेगा। कार्यकर्ताओं को एनडीए गठबंधन के पक्ष में माहौल तैयार करने और उसे चुनाव में जीत दिलाने के लिए काम करने के निर्देश दिए गए हैं।
हर गांव में 10 सदस्यीय टीम
पार्टी ने गांव-गांव में 10 सदस्यों वाली विशेष टीमें गठित की हैं। ये टीमें स्थानीय स्तर पर लोगों से संपर्क करेंगी, राजनीतिक माहौल और जनता की प्रतिक्रिया का आकलन करेंगी और अपनी रिपोर्ट सीधे पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को सौंपेंगी।
2022 के विधानसभा चुनाव में आरएलडी ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन करके 33 सीटों पर चुनाव लड़ा था। अब पार्टी के कार्यकर्ताओं को उम्मीद है कि आगामी विधानसभा चुनाव में आरएलडी को 35 से 40 सीटें मिलनी चाहिए। उनका तर्क है कि इससे जाट, गुर्जर, ब्राह्मण, बनिया और दलित समेत अलग-अलग सामाजिक समूहों को उचित राजनीतिक प्रतिनिधित्व दिया जा सकेगा।
गुर्जर समाज पर भी खास जोर
आरएलडी पश्चिमी यूपी में गुर्जर समुदाय को भी संगठन और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में पर्याप्त हिस्सेदारी देने पर जोर दे रही है। पार्टी नेताओं के अनुसार, बिजनौर के सांसद चंदन चौहान समेत संगठन के कई प्रमुख पदाधिकारी गुर्जर समाज से आते हैं। इससे पार्टी अपने जाट आधार के साथ गुर्जर समुदाय को भी मजबूती से जोड़ने की कोशिश कर रही है।
पश्चिमी यूपी की राजनीति
आरएलडी, सपा और मायावती के इतर अगर बात पश्चिमी यूपी क्षेत्र की करें तो उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह क्षेत्र किसी गेमचेंजर से कम नहीं है। इस इलाके में सियासत जाट, मुस्लिम, दलित, गुर्जर, यादव और गैर-यादव ओबीसी जैसे सामाजिक समीकरणों के इर्द-गिर्द ही घूमती है।
साल 2022 के चुनावी विश्लेषणों में इस क्षेत्र को करीब 136 विधानसभा सीटों वाला क्षेत्र माना गया था। यही वजह है कि पश्चिमी यूपी का प्रदर्शन पूरे 403 सीटों वाले उत्तर प्रदेश के चुनावी नतीजे पर बड़ा असर डाल सकता है।
पश्चिम यूपी से ताल्लक रखने वाले लोगों की फोटो।
जाट वोट का फैक्टर
पश्चिमी यूपी में जाट समुदाय लंबे समय से निर्णायक राजनीतिक ताकत रहा है। 2022 के उपलब्ध चुनावी विश्लेषणों में जाट आबादी का अनुमान करीब 17% बताया गया था और कई दर्जन सीटों पर इसे प्रभावशाली माना गया।
यहीं से जयंत चौधरी और आरएलडी की अहमियत बढ़ती है। आरएलडी परंपरागत रूप से जाट राजनीति से जुड़ी रही है। 2022 में आरएलडी सपा के साथ थी, लेकिन 2024 लोकसभा चुनाव से पहले एनडीए में चली गई। अब 2027 में बीजेपी और आरएलडी साथ हैं, इसलिए पश्चिमी यूपी में जाट वोटों को लेकर दोनों का गठबंधन महत्वपूर्ण है।
सपा की सबसे बड़ी ताकत
पश्चिमी यूपी में मुस्लिम आबादी कई इलाकों में काफी प्रभावशाली है। खासकर सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, शामली, बिजनौर, मेरठ, मुरादाबाद और आसपास के क्षेत्रों में मुस्लिम वोट कई सीटों पर चुनावी नतीजे प्रभावित कर सकता है। सपा की कोशिश अब इस वोट के साथ गुर्जर और दूसरे सामाजिक समूहों को जोड़ने की है। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक, अखिलेश यादव पश्चिमी यूपी की 70 से अधिक विधानसभा सीटों पर मुस्लिम-गुर्जर समीकरण को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।
वहीं, पश्चिमी यूपी में बसपा का पारंपरिक आधार भी महत्वपूर्ण है। खासकर जाटव और दूसरे दलित समुदायों का वोट कई सीटों पर चुनावी गणित बदल सकता है। मायावती की राजनीति के लिए पश्चिमी यूपी इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि पार्टी का पुराना सामाजिक आधार यहां मजबूत रहा है। 2027 से पहले मायावती ने पश्चिमी यूपी के लिए अलग राज्य की मांग भी फिर उठाई है। जाटों के अलावा गुर्जर समुदाय भी पश्चिमी यूपी की राजनीति में अहम है। यही कारण है कि सपा और आरएलडी दोनों गुर्जर समाज तक पहुंच बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।
बीजेपी का समीकरण क्या है?
अंत में बीजेपी का भी जिक्र होना लाजिम है। बीजेपी के लिए पश्चिमी यूपी में सबसे बड़ा फायदा एनडीए का व्यापक सामाजिक गठजोड़ है। बीजेपी का अपना कोर वोट, गैर-यादव ओबीसी और अन्य सामाजिक समूहों का समर्थन और आरएलडी का जाट प्रभाव—इन सभी को एक साथ रखने की कोशिश होगी। हालांकि, 2027 के लिए बीजेपी भी सिर्फ पुराने समीकरण पर निर्भर नहीं रहना चाहती। पार्टी संगठन लगातार जमीनी फीडबैक ले रहा है और जातीय समीकरणों को लेकर रणनीति बना रहा है।
