चंद्रमा पर इंसान के कदम पड़े हुए आधी सदी से ज्यादा समय हो चुका है। 1969 में अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के अपोलो-11 मिशन ने पहली बार इंसानों को चंद्रमा की सतह पर उतारा था। इसके बाद कई देशों ने चंद्रमा की परिक्रमा करने, उसकी सतह का अध्ययन करने और वहां रोवर उतारने की कोशिश की। लेकिन अब चंद्र अन्वेषण का लक्ष्य सिर्फ चंद्रमा तक पहुंचना नहीं रह गया है। वैज्ञानिक यह जानना चाहते हैं कि क्या चंद्रमा के संसाधनों का इस्तेमाल भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों और वहां लंबे समय तक इंसानों की मौजूदगी के लिए किया जा सकता है। इसी सवाल के बीच चीन ने चंद्रमा पर पानी की तलाश शुरू कर दी है।
चीन अपने महत्वाकांक्षी चांग’ई कार्यक्रम के तहत चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव का अध्ययन करने की तैयारी कर रहा है। इस मिशन का सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य उन इलाकों की जांच करना है, जहां सूर्य की रोशनी कभी नहीं पहुंचती। वैज्ञानिकों का मानना है कि ऐसे स्थायी रूप से छाया वाले क्षेत्रों में अरबों वर्षों से पानी बर्फ के रूप में सुरक्षित हो सकता है। चांग’ई-7 यह पता लगाने की कोशिश करेगा कि वहां बर्फ वास्तव में कितनी मात्रा में है, वह कहां और कितनी गहराई पर मौजूद है और भविष्य में उसे इस्तेमाल करना कितना व्यावहारिक होगा।
चंद्रमा पर पानी की तलाश क्यों हो रही है?
करीब दो दशक से वैज्ञानिकों को पता है कि चंद्रमा पर पानी किसी न किसी रूप में मौजूद है। चंद्रमा की सतह और उसके ध्रुवीय क्षेत्रों से मिले आंकड़ों ने इस संभावना को मजबूत किया है। लेकिन पानी की मौजूदगी और वहां से पानी निकाल पाने में बहुत बड़ा अंतर है। वैज्ञानिकों के सामने अब सवाल यह नहीं है कि चंद्रमा पर पानी है या नहीं। सवाल यह है कि पानी किस रूप में मौजूद है और उसकी मात्रा कितनी है। क्या वह सतह पर बर्फ की परत के रूप में है या चंद्र मिट्टी के कणों के बीच फंसा हुआ है? क्या वहां पर्याप्त मात्रा में बर्फ मौजूद है जिसे भविष्य में रोबोट या इंसान निकाल सकें? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या इस पानी का इस्तेमाल पीने, वैज्ञानिक प्रयोगों या रॉकेट ईंधन के लिए किया जा सकता है?चंद्रमा के अंधेरे क्रेटर में ही क्यों है बर्फ?
चंद्रमा के ध्रुवीय इलाकों में कुछ बेहद गहरे क्रेटर यानी विशाल गड्ढे हैं। इनकी भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि सूर्य की किरणें इनकी तलहटी तक नहीं पहुंच पातीं। इन्हें ‘पर्मानेंटली शैडोड रीजन’ यानी स्थायी रूप से छाया वाले क्षेत्र कहा जाता है। इन जगहों का तापमान बेहद कम होता है और कुछ क्षेत्रों में यह माइनस 200 डिग्री सेल्सियस से भी नीचे पहुंच सकता है। अरबों वर्षों से सूर्य की सीधी रोशनी से दूर रहने के कारण यहां पानी के अणु बर्फ के रूप में संरक्षित रहने की संभावना है। लेकिन जिस वजह से ये क्षेत्र वैज्ञानिकों के लिए मूल्यवान हैं, वही इन्हें बेहद मुश्किल भी बनाती है। यहां लगातार अंधेरा रहता है, क्रेटर की दीवारें खड़ी होती हैं और जमीन ऊबड़-खाबड़ है। ऐसे इलाकों में सामान्य पहियों वाला रोवर आसानी से नहीं पहुंच सकता।
क्या है चांग’ई-7 मिशन?
चांग’ई-7 चीन के चंद्र अन्वेषण कार्यक्रम का अगला बड़ा चरण है। इस मिशन में एक ऑर्बिटर, लैंडर, रोवर और हॉपर शामिल होंगे। मिशन को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय इलाके में भेजने की योजना है। संभावित लैंडिंग क्षेत्र दक्षिणी ध्रुव के आसपास शैकलटन क्रेटर के निकट बताया जा रहा है। यहां ऐसा स्थान चुने जाने की संभावना है जहां सूर्य की रोशनी कुछ हद तक उपलब्ध हो, ताकि मिशन के उपकरणों को ऊर्जा मिल सके और वे आसपास के स्थायी अंधेरे वाले इलाकों का अध्ययन कर सकें। मिशन का ऑर्बिटर चंद्रमा के आसपास से वैज्ञानिक आंकड़े जुटाएगा। लैंडर सतह पर उतरकर प्रयोग करेगा और रोवर आसपास के क्षेत्र में घूमकर चंद्र मिट्टी तथा भूगर्भीय संरचना का अध्ययन करेगा।
हॉपर क्यों है इस मिशन का सबसे खास हिस्सा?
पहियों वाला रोवर समतल या अपेक्षाकृत कम ढलान वाले क्षेत्र में अच्छा काम कर सकता है, लेकिन चंद्रमा के गहरे क्रेटरों में उसके सामने बड़ी मुश्किलें होंगी। यदि रास्ते में खड़ी दीवार या बहुत गहरी ढलान आ जाए तो रोवर वहां फंस सकता है। हॉपर इसी समस्या का समाधान खोजने की कोशिश है। इसे इस तरह तैयार किया गया है कि वह छोटे-छोटे उछाल के जरिए कठिन भूभाग पार कर सके और उन क्षेत्रों तक पहुंच सके जहां पारंपरिक रोवर नहीं जा सकता।
च्वेछियाओ-2 भी देगा मिशन का साथ
चांग’ई-7 को संचार के लिहाज से भी एक खास सुविधा मिलेगी। चीन ने मार्च 2024 में च्वेछियाओ-2 (Queqiao) रिले उपग्रह को लॉन्च किया था। यह उपग्रह चंद्रमा और पृथ्वी के बीच संचार व्यवस्था में मदद करता है। चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के गहरे क्रेटरों में सीधा संचार हमेशा संभव नहीं होगा। ऐसे में रिले उपग्रह मिशन से मिले आंकड़ों और निर्देशों को पृथ्वी तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। चीन पहले ही चांग’ई-6 मिशन के दौरान इस तरह के बुनियादी ढांचे का इस्तेमाल कर चुका है। अब चांग’ई-7 के साथ इस व्यवस्था को और आगे बढ़ाया जाएगा।
चीन को चंद्रमा की बर्फ से क्या फायदा हो सकता है?
चंद्रमा पर पानी मिलना वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, लेकिन इसका असली महत्व भविष्य के मानव मिशनों के लिए है। अगर चंद्रमा पर मौजूद बर्फ से पानी निकाला जा सके तो इसका इस्तेमाल अंतरिक्ष यात्रियों के लिए किया जा सकता है। इससे पृथ्वी से चंद्रमा तक बड़ी मात्रा में पानी ले जाने की जरूरत कम हो सकती है।पानी को इलेक्ट्रोलिसिस की प्रक्रिया से हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में भी बदला जा सकता है। ये दोनों तत्व रॉकेट प्रणोदन में इस्तेमाल हो सकते हैं। इसका अर्थ है कि भविष्य में चंद्रमा सिर्फ वैज्ञानिक प्रयोगों की जगह नहीं, बल्कि अंतरिक्ष अभियानों के लिए एक संभावित ‘ईंधन स्टेशन’ भी बन सकता है। हालांकि यह अभी भविष्य की संभावना है। पहले यह साबित करना जरूरी है कि चंद्रमा की बर्फ पर्याप्त मात्रा में मौजूद है और उसे निकालना आर्थिक तथा तकनीकी रूप से संभव है।
चांग’ई-7 के बाद क्या?
चांग’ई-7 को चीन की लंबी अवधि की चंद्र रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। इसके बाद प्रस्तावित चांग’ई-8 मिशन का लक्ष्य चंद्रमा पर उपलब्ध संसाधनों के उपयोग की तकनीक का प्रदर्शन करना होगा। यानी चांग’ई-7 का फोकस मुख्य रूप से यह समझने पर होगा कि चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव में क्या मौजूद है। इसके बाद के मिशन यह दिखाने की कोशिश कर सकते हैं कि वहां मौजूद संसाधनों का इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है।
नासा का रास्ता चीन से अलग क्यों है?
चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव में दिलचस्पी सिर्फ चीन की नहीं है। अमेरिका भी आर्टेमिस कार्यक्रम के जरिए चंद्रमा पर लंबे समय तक मानव गतिविधियों की नींव तैयार करने की कोशिश कर रहा है। हालांकि दोनों देशों का तरीका अलग है। चीन जहां चांग’ई-7 जैसे एकीकृत सरकारी मिशन के जरिए कई तकनीकों को एक साथ चंद्रमा तक भेज रहा है। वहीं, नासा ने कमर्शियल लूनर पेलोड सर्विसेज यानी CLPS कार्यक्रम के जरिए निजी कंपनियों को चंद्रमा तक वैज्ञानिक उपकरण पहुंचाने की जिम्मेदारी दी है। इस मॉडल में अलग-अलग कंपनियां अपने लैंडर और अन्य अंतरिक्ष यान विकसित करती हैं और नासा उनके जरिए वैज्ञानिक उपकरण चंद्रमा तक भेजता है।