एक्सप्लेनर्स

बिना किसी सरकारी पद के सुपर पावर: क्या होती है 'एक्स्ट्रा-कॉन्स्टीट्यूशनल अथॉरिटी', जिसे संजय गांधी ने सच कर दिखाया?

Times Now Navbharat Explainer: 1975 से 1977 के आपातकाल के दौरान संजय गांधी बिना किसी संवैधानिक पद के भी देश की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरे थे। उन्हें 'एक्स्ट्रा-कॉन्स्टीट्यूशनल अथॉरिटी' माना जाता था, जिनका नौकरशाही और मुख्यमंत्रियों पर सीधा नियंत्रण था। उनके नेतृत्व में चलाए गए जबरन नसबंदी अभियान और दिल्ली के तुर्कमान गेट पर हुई बुलडोजर कार्रवाई आदि ने जनता में भारी गुस्सा पैदा कर दिया।

Image

संजय गांधी का 5-सूत्रीय कार्यक्रम (फोटो: एआई इमेज)

Times Now Navbharat Explainer: भारतीय राजनीति के इतिहास में 25 जून 1975 से मार्च 1977 तक का दौर 'आपातकाल' (Emergency) के रूप में जाना जाता है। इस पूरे दौर की जब भी चर्चा होती है, तो तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) के साथ-साथ एक और नाम सबसे ज्यादा सुर्खियों में बना रहता है, वह नाम कोई और नहीं बल्कि उनके छोटे बेटे संजय गांधी का है। ताज्जुब की बात यह थी कि उस समय संजय गांधी (Sanjay Gandhi Emergency Role) के पास कोई भी संवैधानिक पद, मंत्री पद या सरकारी ओहदा नहीं था।

इसके बावजूद, वे सरकार के भीतर 'अघोषित प्रधानमंत्री' की तरह काम कर रहे थे। भारतीय लोकतंत्र में उन्हें 'एक्स्ट्रा-कॉन्स्टीट्यूशनल अथॉरिटी' (संवैधानिक दायरे से बाहर की ताकत) कहा गया, जिनका सरकारी मशीनरी, मुख्यमंत्रियों और नौकरशाही पर सीधा कंट्रोल था। आइए इस पूरे लेख में समझते हैं कि आपातकाल के उस दौर में संजय गांधी की भूमिका इतनी विवादास्पद क्यों रही और उनके फैसलों ने देश की राजनीति को कैसे हमेशा के लिए बदल दिया।

जब जनसंख्या नियंत्रण के नाम पर बरपा कहर

संजय गांधी के एजेंडे में सबसे ऊपर था-तेजी से बढ़ती जनसंख्या पर काबू पाना। इसके लिए उन्होंने अपना 'पांच सूत्री कार्यक्रम' (Five Point Programme) लॉन्च किया, जिसमें परिवार नियोजन को सबसे प्रमुखता दी गई। इरादा भले ही देश के विकास से जुड़ा था, लेकिन इसे लागू करने का तरीका बेहद अमानवीय और क्रूर था। सरकारी अधिकारियों, शिक्षकों और पुलिस को नसबंदी के बड़े-बड़े टारगेट दिए गए। इस टारगेट को पूरा करने के दबाव में सरकारी मशीनरी ने मर्यादाओं की सारी हदें पार कर दीं।

गांवों के गांवों को पुलिस बल द्वारा घेर लिया जाता था और पुरुषों को पकड़कर जबरन नसबंदी शिविरों में ले जाया जाता था। हालत यह हो गई थी कि पुलिस की गाड़ियों की आवाज सुनते ही लोग खेतों और जंगलों में छिपने लगे थे। मुजफ्फरनगर जैसे इलाकों में जब जनता ने इसका विरोध किया, तो पुलिस ने गोलियां तक चला दीं।

आंकड़े बताते हैं कि 1976 से 1977 के बीच करीब 80 लाख से ज्यादा पुरुषों की जबरन नसबंदी की गई। इस अभियान की सबसे बड़ी गाज गरीब, दलित और मुस्लिम समुदायों पर गिरी। हालांकि, इस कार्यक्रम को वर्ल्ड बैंक जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से आर्थिक मदद मिल रही थी, लेकिन इस जबरदस्ती ने पूरे देश में कांग्रेस सरकार के खिलाफ एक गहरा आक्रोश पैदा कर दिया।

सुंदरता के नाम पर उजड़े आशियाने

संजय गांधी पर दिल्ली को 'सुंदर' और 'स्लम-मुक्त' बनाने का एक जुनून सवार था। इसी शहरी सुधार और सौंदर्यीकरण के नाम पर दिल्ली की झुग्गी-झोपड़ियों और पुरानी बस्तियों पर बुलडोजर चलाने के आदेश दिए गए।

इसका सबसे खौफनाक असर अप्रैल 1976 में पुरानी दिल्ली के तुर्कमान गेट पर देखने को मिला। जामा मस्जिद के आस-पास के इलाके को साफ करने के नाम पर वहां बड़े पैमाने पर तोड़फोड़) चलाई गई। जब स्थानीय लोगों ने अपने पुश्तैनी घरों को टूटते देख विरोध प्रदर्शन किया, तो उन पर बेरहमी से लाठियां और गोलियां बरसाई गईं।

सरकारी आंकड़ों में महज 6 मौतें दिखाई गईं, लेकिन प्रत्यक्षदर्शियों और इतिहासकारों के मुताबिक यह संख्या कहीं ज्यादा थी। हजारों परिवारों को उनके घरों से बेदखल कर दिल्ली के सुदूर इलाकों में फेंक दिया गया, जहां बुनियादी सुविधाएं तक नहीं थीं।

सत्ता का नया और आक्रामक हथियार

संजय गांधी ने अपनी नीतियों को जमीन पर उतारने के लिए 'युवा कांग्रेस' (Youth Congress) को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया। उन्होंने आधिकारिक '20 सूत्री कार्यक्रम' के समानांतर अपना '5 सूत्री कार्यक्रम' पेश किया, जो निम्न प्रकार से थीं:

  • परिवार नियोजन
  • वृक्षारोपण (पेड़ लगाना)
  • वयस्क साक्षरता (हर एक, एक को पढ़ाए)
  • जातिवाद का खात्मा
  • दहेज प्रथा का उन्मूलन

ये पांचों बिंदु समाज सुधार से जुड़े थे, लेकिन यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने इन्हें लागू करने के लिए डराने-धमकाने और बाहुबल (Muscle Power) का सहारा लिया। इसके चलते संगठन की छवि एक गुंडा ब्रिगेड जैसी बनने लगी, जिससे आम जनता के मन में खौफ और बढ़ गया।

सेंसरशिप और अधिकारियों पर सीधा हुक्म

आपातकाल के दौरान देश की मीडिया और प्रशासनिक व्यवस्था पूरी तरह संजय गांधी के इशारों पर नाच रही थी। अखबारों पर सख्त सेंसरशिप लागू कर दी गई और स्वतंत्र समाचार एजेंसियों का जबरन विलय करके 'समाचार' नाम की एक सरकारी एजेंसी बना दी गई, ताकि सरकार के खिलाफ एक शब्द भी बाहर न आ सके। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और मुख्यमंत्रियों की हैसियत संजय गांधी के सामने बौनी हो चुकी थी। कई राज्यों के मुख्यमंत्री सीधे इंदिरा गांधी के बजाय संजय गांधी के दरबार में हाजिरी लगाते थे।

संजय गांधी का यह प्रभाव जितना आक्रामक था, उसका अंजाम उतना ही भारी रहा। आपातकाल के दौरान जनता पर ढाए गए इन अत्याचारों, जबरन नसबंदी और बुलडोजर नीति का नतीजा यह हुआ कि जब 1977 में चुनाव हुए, तो उत्तर भारत से कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया। खुद इंदिरा गांधी और संजय गांधी चुनाव हार गए।

monu jha
मोनू झाauthor

मोनू कुमार टाइम्स नाउ नवभारत की डिजिटल टीम में वायरल और ट्रेंडिंग डेस्क पर काम कर रहे हैं। न्यूजरूम में 4 साल से अधिक का अनुभव रखने वाले मोनू वायरल कंटेंट, ऑफबीट खबरों और सोशल मीडिया ट्रेंड्स को पहचानने में बेहद दक्ष हैं। यूनीक एंगल तलाशने और कहानियों को आकर्षक अंदाज में प्रस्तुत करने की उनकी क्षमता उन्हें डिजिटल कंटेंट स्पेस में अलग पहचान देती है। मोनू कुमार 4,000 से अधिक स्टोरीज लिख चुके हैं, जिनमें कई वायरल रिपोर्ट्स, ट्रेंड-बेस्ड अपडेट्स और सोशल मीडिया-फोकस्ड कंटेंट शामिल हैं।

और पढ़ें
End of Article