Pakistan USA Relations: भारत सहित दुनियाभर में आतंकवाद की सप्लाई करने वाला पाकिस्तान आज अमेरिका की आंखों का तारा बन बैठा है। उसकी धमक इस कदर बढ़ गई है कि ईरान-अमेरिका युद्ध में मध्यस्थता कर वाहवाही लूट रहा है। हाल के घटनाक्रमों ने इस अटकल को बल दिया है कि अमेरिका और पाकिस्तान रणनीतिक रूप से एक बार फिर करीब आ रहे हैं, विशेष रूप से ईरान संघर्ष के बाद। यह नई गर्मजोशी न सिर्फ उच्च स्तरीय राजनयिक संबंधों में दिखी है, बल्कि वरिष्ठ अमेरिकी नेताओं द्वारा पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व के प्रति सार्वजनिक रूप से दिखाई गई तारीफ में भी झलकती है। आखिर कैसे पाकिस्तान डोनाल्ड ट्रंप और अमेरिका को साध लिया।
आसिम मुनीर बने "महान जनरल"
पिछले कुछ महीनों में शीर्ष अमेरिकी अधिकारियों ने पाकिस्तानी सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के साथ कई बैठकें की हैं। ट्रंप ने मुनीर को "महान जनरल", "मेरे पसंदीदा फील्ड मार्शल" और "असाधारण नेता" बताया है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वैंस तो इससे भी आगे बढ़ गए हैं। हाल ही में बोलते हुए, वैंस ने मजाक में कहा कि उनके जीवन में दो महत्वपूर्ण लोग हैं - "एक भारतीय" और "एक पाकिस्तानी"। अपनी पत्नी उषा वैंस और फील्ड मार्शल मुनीर का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि पिछले तीन महीनों में उन्होंने मुनीर से सबसे ज्यादा बात की है।
पाकिस्तान को अमेरिका का आशीर्वाद कैसे मिला?
पाकिस्तान की नई पहल इस्लामाबाद द्वारा वर्षों के तनावपूर्ण संबंधों के बाद वाशिंगटन में अपनी स्थिति को नए सिरे से स्थापित करने के प्रयास का हिस्सा है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान को अपनी चीन-केंद्रित सुरक्षा नीति की सीमाओं का एहसास हो गया था। उसे व्यापक अंतरराष्ट्रीय समर्थन - राजनयिक, आर्थिक और सैन्य के लिए अमेरिका के आशीर्वाद की जरूरत थी। और उसे सही वक्त पर ये मिल भी गया। पाकिस्तान ने ट्रंप प्रशासन के दूसरे दौर के साथ संबंध सुधारने के लिए रणनीतिक कदम उठाए। उन्होंने कहा कि इस्लामाबाद ने ट्रंप से करीबी संबंध रखने वाले लॉबिस्ट को नियुक्त किया, पाकिस्तान में मौजूद महत्वपूर्ण खनिजों तक पहुंच की पेशकश की और बिटकॉइन माइनिंग जैसे उभरते क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ावा दिया। पाकिस्तान की इसी चाल में ट्रंप फंस गए और नतीजा सबके सामने है। आज मुल्ला मुनीर. ट्रंप के सबसे चहेते सैन्य अफसर हैं।
वाशिंगटन के साथ पाकिस्तान का खेल
पाकिस्तान ने दशकों से एक ऐसी कूटनीतिक रणनीति विकसित की है जो अक्सर अमेरिकी प्रशासनों के साथ प्रभावी ढंग से काम करती है। इस रणनीति का एक प्रमुख तत्व मजबूत निजी संबंध बनाना और प्रभावशाली अमेरिकी नेताओं की सार्वजनिक रूप से प्रशंसा करना है। विश्लेषकों का कहना है कि यह रणनीति ट्रंप के साथ विशेष रूप से प्रभावी नजर आती है, जो निजी संबंधों और सीधे जुड़ाव को महत्व देते हैं। हालांकि, कई लोग अमेरिका-पाकिस्तान संबंधों की ऐतिहासिक रूप से अस्थिर प्रकृति की ओर भी इशारा करते हैं, जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि मौजूदा सौहार्द स्थायी नहीं हो सकता है।
अगस्त 2021 में अफगानिस्तान से अमेरिकी वापसी के बाद दोनों देशों के बीच संबंध काफी बिगड़ गए थे, जब अमेरिकी अधिकारियों ने तालिबान की सत्ता में वापसी में पाकिस्तान की भूमिका पर निराशा जताई थी। उस दौर से आगे बढ़ने के लिए दृढ़ संकल्पित पाकिस्तान ने ट्रंप के सत्ता में लौटने के बाद वाशिंगटन के राजनीतिक, सैन्य और खुफिया प्रतिष्ठानों के साथ फिर से जुड़ने के प्रयासों को तेज कर दिया।
भारत के लिए इसका क्या मायने?
अमेरिका-पाकिस्तान के बीच नए सिरे से जुड़ाव के बावजूद भारत शीत युद्ध के दौरान के गठबंधनों की तुलना में कहीं अधिक मजबूत स्थिति में है। भारत आज 1950 और 1970 के दशक की तुलना में कहीं अधिक मजबूत है जिसे पूरी दुनिया भी मानती है। नई दिल्ली अब पहले की तरह बाहरी शक्तियों पर निर्भर नहीं है। ट्रंप के दौर में भारत को बेहद सावधान रहना होगा। भारत के मुकाबले पाकिस्तान को ट्रंप पूरी तरह तरजीह दे रहे हैं। ईरान-यूएस युद्ध में मध्यस्थता कर पाकिस्तान ने ट्रंप की वाहवाही भी खूब लूटी है। ऐसे में भारत के लिए अमेरिका के साथ गर्मजोशी भरा रिश्ता बरकरार रख पाना इतना आसान नहीं रहा। भले ही भारत के साथ ट्रेड डील के नाम पर अमेरिका रिश्तों को आगे बढ़ाने की कोशिश में है, लेकिन भारत के लिए समय चुनौतीपूर्ण हैं। अमेरिका से निराशा के बीच भारत को रूस के साथ ही यूरोप के मजबूत देशों जैसे, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, कनाडा के साथ अपने रिश्तों को नई ऊंचाई पर पहुंचाना होगा।