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क्या बांग्लादेश बनेगा ‘इस्लामिक NATO’ का हिस्सा? जानें पड़ोसी मुल्क के इस फैसले से भारत पर क्या होगा असर

बांग्लादेश कथित तौर पर सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये से जुड़े एक संभावित सुरक्षा ढांचे में शामिल होने पर विचार कर रहा है, जिसे मीडिया में ‘इस्लामिक नाटो’ कहा जा रहा है। हालांकि, यह कोई आधिकारिक संगठन नहीं है। प्रस्तावित समझौते का सिद्धांत सामूहिक सुरक्षा पर आधारित बताया जा रहा है। सऊदी अरब की आर्थिक ताकत, तुर्किये की सैन्य और रक्षा तकनीक तथा पाकिस्तान की सैन्य और परमाणु क्षमता इस गठजोड़ को रणनीतिक रूप से अहम बनाती है।

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‘इस्लामिक NATO’ में शामिल हो सकता है बांग्लादेश। AI IMAGE
Authored by: Piyush Kumar
Updated Aug 23, 2026, 12:08 IST
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तारिक रहमान की सरकार बांग्लादेश को नई पहचान देने की दिशा में जुटी है। यह देश अब कथित तौर पर ‘इस्लामिक NATO’ जैसे सुरक्षा गठबंधन का हिस्सा बनने की संभावनाओं पर विचार कर रहा है। बांग्लादेश के हाल ही में हुए ‘मक्का समझौते’ से जुड़े सुरक्षा ढांचे में शामिल होने की संभावना पर चर्चा तेज हो गई है।

पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये के बीच हुए सैन्य समझौते में शामिल होने की संभावना पर बांग्लादेश विचार कर रहा है, जिसे ‘इस्लामिक NATO’ भी कहा जा रहा है। हाल ही में बांग्लादेश के दो मंत्रियों ने संकेत दिया है कि ढाका, सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच बने इस रक्षा गठबंधन में शामिल होने पर विचार कर सकता है। प्रधानमंत्री के करीबी सहयोगी तारिक रहमान ने ‘बांग्लादेश संगबाद संस्था’ (BSS) को बताया है कि बांग्लादेश ‘मक्का पैक्ट’ जैसे किसी संगठन में शामिल होने का इच्छुक है।

बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान की फोटो। AP

बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान की फोटो। AP

‘इस्लामिक नाटो’ क्या है?

‘इस्लामिक नाटो’ इसका आधिकारिक नाम नहीं है। इसका संदर्भ सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच हुए ‘मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट’ से है। समझौते का मूल सिद्धांत है कि एक सदस्य पर सशस्त्र हमला सभी सदस्यों पर हमला माना जाएगा। तुर्किये के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने इसे NATO के अनुच्छेद 5 के समान बताया है। हालांकि, नाटो के पास दशकों से विकसित संयुक्त सैन्य योजना, स्थायी कमांड संरचना और व्यापक सैन्य एकीकरण है, जबकि मक्का समझौता अभी उस स्तर तक नहीं पहुंचा है।

सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच हुए ‘मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट’ हुआ है। AI IMAGE

सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच हुए ‘मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट’ हुआ है। AI IMAGE

गठबंधन में तीन देशों की ताकत क्या है?

सऊदी अरब के पास भारी आर्थिक ताकत, ऊर्जा संसाधन और मुस्लिम दुनिया में महत्वपूर्ण धार्मिक प्रभाव है। तुर्किये के पास मजबूत सैन्य क्षमता, विकसित रक्षा उद्योग और NATO के साथ लंबे समय का अनुभव है। वहीं, पाकिस्तान के पास बड़ी सैन्य ताकत और परमाणु हथियार हैं। यानी, तीनों देशों की ताकत अलग-अलग क्षेत्रों में है और यही इस समझौते को रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाती है।

बांग्लादेश के लिए क्यों अहम है यह गठबंधन?

बांग्लादेश लंबे समय से भारत और चीन के बीच अपने रणनीतिक हितों को संतुलित करने की कोशिश करता रहा है। हालांकि, हाल के भू-राजनीतिक बदलावों और भारत के साथ सीमा तथा जल बंटवारे समेत कई मुद्दों पर बढ़ते मतभेदों के बीच ढाका अब अपनी सुरक्षा और रणनीतिक साझेदारियों का दायरा बढ़ाने पर ध्यान दे रहा है।

अगस्त में बांग्लादेश के विदेश मामलों के सलाहकार हुमायूं कबीर ने संकेत दिया था कि ‘बांग्लादेश फर्स्ट’ नीति के तहत ढाका सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान के साथ आर्थिक या रक्षा सहयोग के किसी ढांचे में शामिल होने को लेकर सकारात्मक रुख रखता है। प्रधानमंत्री तारिक रहमान के करीबी माने जाने वाले एक सहयोगी की ओर से भी बांग्लादेश की संभावित सदस्यता को लेकर रुचि के संकेत दिए गए हैं।

बांग्लादेश के इस गठबंधन में शामिल होने से सबसे बड़ा बदलाव यह होगा कि इसकी पहुंच पश्चिम एशिया से आगे बढ़कर दक्षिण एशिया तक हो जाएगी। अब तक मक्का समझौते को मुख्य रूप से पश्चिम एशिया की बदलती सुरक्षा व्यवस्था के संदर्भ में देखा जा रहा था। लेकिन अगर बांग्लादेश इसमें शामिल होता है तो इसकी भौगोलिक पहुंच बंगाल की खाड़ी तक बढ़ सकती है। यहीं से भारत के लिए रणनीतिक चिंताएं शुरू होती हैं।

'इस्लामिक नाटो' में शामिल होने की कोशिश कर रहा बांग्लादेश। AP

'इस्लामिक नाटो' में शामिल होने की कोशिश कर रहा बांग्लादेश। AP

आर्थिक हित भी बड़ी वजह

बांग्लादेश के लिए इस संभावित साझेदारी के पीछे सिर्फ रणनीतिक या रक्षा हित ही नहीं, बल्कि आर्थिक कारण भी अहम हैं। सऊदी अरब बांग्लादेशी कामगारों के लिए प्रमुख रोजगार केंद्र है और देश को मिलने वाले रेमिटेंस में उसका महत्वपूर्ण योगदान है। 2025-26 के शुरुआती 11 महीनों में सऊदी अरब से बांग्लादेश को करीब 5.28 अरब डॉलर का रेमिटेंस मिला। यह बांग्लादेश को मिलने वाले कुल रेमिटेंस का लगभग 16 प्रतिशत है। ऐसे में रियाद के साथ मजबूत आर्थिक और रणनीतिक संबंध ढाका के लिए काफी महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

रक्षा, ऊर्जा और निवेश में बढ़ सकते हैं अवसर

तुर्किये और पाकिस्तान पहले से ही बांग्लादेश के रक्षा क्षेत्र में सहयोग करते रहे हैं। तुर्किये की ओर से ड्रोन, युद्धपोत और बख्तरबंद वाहनों जैसी सैन्य तकनीक की आपूर्ति की गई है, जबकि पाकिस्तान के साथ लड़ाकू विमानों और नौसैनिक उपकरणों को लेकर सहयोग की संभावनाएं बनी हुई हैं।

अगर बांग्लादेश इस प्रस्तावित सुरक्षा ढांचे का हिस्सा बनता है तो उसे इन देशों के साथ उन्नत रक्षा तकनीक, सैन्य प्रशिक्षण, संयुक्त उत्पादन और रक्षा उद्योग में सहयोग के नए अवसर मिल सकते हैं। इससे बांग्लादेश अपनी सैन्य क्षमताओं को आधुनिक बनाने की कोशिशों को भी गति दे सकता है।

ऊर्जा सुरक्षा भी महत्वपूर्ण

बांग्लादेश अपनी ऊर्जा जरूरतों के एक बड़े हिस्से के लिए आयात पर निर्भर है। मध्य पूर्व से तेल और एलएनजी की आपूर्ति उसके लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इन संसाधनों की आवाजाही लाल सागर और बाब-अल-मंदेब जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों से होती है।

ऐसे में किसी व्यापक क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग का हिस्सा बनने से बांग्लादेश के लिए महत्वपूर्ण समुद्री आपूर्ति मार्गों की सुरक्षा का मुद्दा भी अहम हो सकता है। इसका फायदा उसके निर्यात कारोबार को भी मिल सकता है, खासकर यूरोपीय बाजारों में जाने वाले बांग्लादेशी परिधानों की आपूर्ति श्रृंखला को।

सऊदी निवेश पर भी नजर

बांग्लादेश के लिए सऊदी अरब सिर्फ रेमिटेंस का स्रोत नहीं है। रियाद की दिलचस्पी बांग्लादेश के बंदरगाह, बुनियादी ढांचे और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में निवेश को लेकर भी रही है। अगर दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी और मजबूत होती है तो बांग्लादेश को इन क्षेत्रों में सऊदी निवेश आकर्षित करने का अवसर मिल सकता है। यानी, संभावित गठबंधन ढाका के लिए केवल रक्षा और सुरक्षा का माध्यम नहीं, बल्कि ऊर्जा, निवेश, रोजगार और व्यापार के नए अवसरों का रास्ता भी बन सकता है।

बांग्लादेश के  बांग्लादेश के बंदरगाह, बुनियादी ढांचे में निवेश करना चाहता सऊदी। AP

बांग्लादेश के बांग्लादेश के बंदरगाह, बुनियादी ढांचे में निवेश करना चाहता सऊदी। AP

भारत के लिए क्या मायने रखता है यह संभावित गठबंधन?

‘इस्लामिक नाटो’ जैसे किसी सुरक्षा समूह में बांग्लादेश की एंट्री से भारत की रणनीतिक और कूटनीतिक चिंताएं बढ़ सकती हैं। दरअसल, भारत के सऊदी अरब के साथ लंबे समय से मजबूत रिश्ते हैं, लेकिन पाकिस्तान के साथ उसके बेहद तनावपूर्ण संबंध और बांग्लादेश के साथ हाल के वर्षों में बढ़ते मतभेद इस पूरे समीकरण को संवेदनशील बना देते हैं। ऐसे में अगर बांग्लादेश इस सुरक्षा ढांचे का हिस्सा बनता है तो भारत के सामने एक नई कूटनीतिक चुनौती खड़ी हो सकती है।

भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में तनाव का एक अहम मुद्दा पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना से जुड़ा मामला भी है। हसीना के भारत में रहने और उनकी वापसी को लेकर दोनों देशों के बीच मतभेद बने हुए हैं। इसी बीच भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा है कि नई दिल्ली पश्चिम एशिया में हो रहे घटनाक्रमों पर लगातार नजर रख रही है। भारत और बांग्लादेश के बीच करीब 4,096 किलोमीटर लंबी सीमा है। दोनों देशों के बीच व्यापार, नदी जल बंटवारा, सीमा सुरक्षा और कनेक्टिविटी जैसे कई मुद्दे पहले से ही महत्वपूर्ण हैं।

अगर बांग्लादेश किसी ऐसे बहुपक्षीय रक्षा ढांचे का हिस्सा बनता है, जिसमें पाकिस्तान और तुर्किये जैसे देश प्रमुख भूमिका में हों, तो भारत को अपनी पूर्वी सुरक्षा रणनीति पर नए सिरे से विचार करना पड़ सकता है।

पीएम नरेंद्र मोदी और सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की फोटो। AP

पीएम नरेंद्र मोदी और सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की फोटो। AP

बंगाल की खाड़ी क्यों महत्वपूर्ण है?

बंगाल की खाड़ी भारत के पूर्वी तट, बांग्लादेश और म्यांमार के बीच स्थित है और हिंद महासागर के व्यापक समुद्री नेटवर्क का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। भारत के लिए अंडमान-निकोबार द्वीप समूह की स्थिति भी रणनीतिक रूप से बेहद अहम है। यहां से भारत हिंद महासागर और मलक्का जलडमरूमध्य की ओर जाने वाले समुद्री मार्गों पर नजर रख सकता है। अगर बांग्लादेश अपनी नौसैनिक क्षमता बढ़ाने के लिए तुर्किये और पाकिस्तान से बड़े पैमाने पर रक्षा सहयोग लेता है तो बंगाल की खाड़ी में सैन्य संतुलन धीरे-धीरे बदल सकता है।

तुर्किये की भूमिका भारत के लिए क्यों अहम है?

तुर्किये इस पूरे समीकरण में एक बेहद महत्वपूर्ण खिलाड़ी है। उसके पास मजबूत रक्षा उद्योग है और वह ड्रोन, नौसैनिक प्लेटफॉर्म तथा अन्य सैन्य तकनीक विकसित करने के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ा है। साथ ही, वह नाटो का सदस्य भी है। पाकिस्तान और तुर्किये के बीच पहले से ही मजबूत रक्षा संबंध हैं। ऐसे में अगर बांग्लादेश भी इस नेटवर्क से जुड़ता है तो तुर्किये की रक्षा तकनीक और सैन्य सहयोग की पहुंच दक्षिण एशिया के एक और महत्वपूर्ण देश तक बढ़ सकती है।

बांग्लादेश के सामने भी कई चुनौतियां

हालांकि, बांग्लादेश के लिए ‘इस्लामिक NATO’ जैसे किसी सुरक्षा ढांचे का हिस्सा बनना आसान नहीं होगा। अगर ढाका पाकिस्तान और सऊदी अरब के नेतृत्व वाले किसी व्यापक सुरक्षा ढांचे के साथ अपनी नजदीकी बढ़ाता है तो उसे घरेलू स्तर पर भी राजनीतिक और सामाजिक विरोध का सामना करना पड़ सकता है।

बांग्लादेश में ऐसे वर्ग मौजूद हैं जो धर्मनिरपेक्ष राजनीति और भारत के साथ पारंपरिक संबंधों को महत्व देते हैं। ऐसे में किसी ऐसे सुरक्षा समूह के साथ करीबी बढ़ाना, जिसमें पाकिस्तान की महत्वपूर्ण भूमिका हो, देश के भीतर राजनीतिक बहस को तेज कर सकता है।

इसके अलावा, ढाका के सामने भारत और चीन के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती भी रहेगी। बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था, व्यापार, बुनियादी ढांचे और सुरक्षा जरूरतों के लिए दोनों देश महत्वपूर्ण हैं। इसलिए किसी एक रणनीतिक खेमे के बहुत करीब जाना उसके लिए आर्थिक और कूटनीतिक जोखिम भी पैदा कर सकता है।

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