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इधर ट्रंप गए, उधर पुतिन आए...अमेरिका-रूस के बीच कैसा संतुलन साध रहा चीन?

डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में चीन का दौरा पूरा किया है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या पुतिन को ट्रंप की चीन यात्रा का डर सताने लगा है या चीन रूस-अमेरिका दोनों के बीच संतुलन साधने की कोशिश कर रहा है।

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रूस-अमेरिका को साथ रहा चीन

Putin China Visit: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बीजिंग यात्रा समाप्त होते ही शी जिनपिंग अब रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के स्वागत में व्यस्त हो गए हैं। ट्रंप के दौरे के एक सप्ताह से भी कम समय बाद रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन चीनी नेता शी जिनपिंग से मिलने के लिए चीन जा पहुंचे। पुतिन मंगलवार और बुधवार को चीन में रहेंगे। बीजिंग की यह यात्रा काफी अहम मानी जा रही है क्योंकि वह अमेरिका के साथ स्थिर संबंध बनाए रखने के साथ-साथ रूस के साथ भी मजबूत संबंध कायम रखना चाहता है। डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में चीन का दौरा पूरा किया है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या पुतिन को ट्रंप की चीन यात्रा का डर सताने लगा है या चीन रूस-अमेरिका दोनों के बीच संतुलन साधने की कोशिश कर रहा है।

आखिर क्यों संतुलन साधने का खेल, खेल रहा हा चीन। इसे विस्तार से समझते हैं।

अमेरिका के साथ चीन की व्यावहारिक कूटनीति

चीन अपनी अर्थव्यवस्था के लिए पश्चिमी बाजारों पर बहुत निर्भर है। इसलिए, वह अमेरिका के साथ 'नियंत्रित प्रतिस्पर्धा' की नीति अपना रहा है, ताकि उसके आर्थिक और तकनीकी विकास में कोई बाधा न आए। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हालिया बीजिंग यात्रा के दौरान शी जिनपिंग ने दोनों देशों के बीच तनाव को कम करने और वैश्विक स्थिरता पर जोर दिया।

रूस के साथ रणनीतिक साझेदारी

चीन रूस का सबसे बड़ा कूटनीतिक और आर्थिक समर्थक है। यूक्रेन युद्ध के बाद से लगे पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद चीन रूस से भारी मात्रा में ऊर्जा खरीदता है। ट्रंप की चीन यात्रा के तुरंत बाद रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का बीजिंग पहुंचना, यह संदेश देता है कि चीन मॉस्को के साथ अपने गहरे संबंधों को छोड़ने वाला नहीं है।

चीन का क्या है इरादा ?

चीन का क्या है इरादा ?

बीजिंग का मुख्य लक्ष्य

चीन का प्राथमिक लक्ष्य दोनों महाशक्तियों (अमेरिका और रूस) के बीच उलझने के बजाय अपने हितों की पूर्ति करना है। वह एक ओर वैश्विक मंच पर अमेरिका के दबदबे को कमजोर करने के लिए रूस के साथ खड़ा दिखता है, तो दूसरी ओर खुद को एक ऐसे वैश्विक मध्यस्थ के रूप में पेश कर रहा है जो अंतरराष्ट्रीय संकटों को सुलझा सकता है। कुल मिलाकर, चीन न तो रूस के पूर्ण अधीन होना चाहता है और न ही अमेरिका के सामने घुटने टेकना चाहता है। वह इन दोनों के बीच अपनी स्वतंत्र कूटनीति के जरिए एक 'सक्रिय संतुलन' बना रहा है, जिससे वैश्विक व्यवस्था में चीन का अपना कद और दबदबा लगातार बढ़ता रहे।

रूस-चीन की नजदीकियां

रूस और चीन की यह नजदीकी पिछले एक दशक में तेजी से बढ़ी है। 2013 में शी जिनपिंग के सत्ता में आने के बाद दोनों देशों ने अपने रिश्तों को नई ऊंचाई तक पहुंचाने की बात शुरू की थी। बाद में 2022 में दोनों देशों ने 'No Limits Partnership' का ऐलान किया। यानी ऐसी साझेदारी जिसकी कोई तय सीमा नहीं होगी। असल में इस दोस्ती की सबसे बड़ी वजह है अमेरिका और पश्चिमी देशों के खिलाफ साझा रणनीति। रूस लंबे समय से NATO और अमेरिका को अपनी सुरक्षा के लिए खतरा मानता है, जबकि चीन ताइवान, व्यापार युद्ध और इंडो-पैसिफिक रणनीति को लेकर अमेरिका से टकराव में है। ऐसे में मॉस्को और बीजिंग एक-दूसरे को मजबूत रणनीतिक साझेदार के तौर पर देखते हैं।

जिनपिंग ने पुतिन को पुराना दोस्त कहा था

पुतिन ने पिछली बार सितंबर 2025 में चीन का दौरा किया था, जहां उन्होंने तियानजिन में शंघाई सहयोग संगठन के वार्षिक शिखर सम्मेलन में भाग लिया, द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति की 80वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में आयोजित सैन्य परेड देखी और शी जिनपिंग से बातचीत की। उस समय शी जिनपिंग ने अपने समकक्ष पुतिन को पुराना दोस्त कहा था, जबकि पुतिन ने शी जिनपिंग को "प्रिय मित्र" कहकर संबोधित किया था।

Amit Mandal
अमित कुमार मंडल author

अमित मंडल टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में न्यूज डेस्क पर Assistant Editor के रूप में काम कर रहे हैं। प्रिंट, टीवी और डिजिटल—तीनों माध्यमों में कुल मिलाकर... और देखें

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