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कागज पर समझौता, जमीन पर बमबारी...गाजा में हर बार क्यों टूट जाती है पीस डील? समझें पूरी इनसाइड स्टोरी

यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबर्ग के शोधकर्ता आदम फार्कहर के विश्लेषण के अनुसार, गाजा में बार-बार शांति समझौते टूटने की मुख्य वजह अनुपालन कराने वाले मजबूत ढांचे का अभाव है। समझौतों में यह साफ नहीं होता कि नियमों के उल्लंघन को कौन प्रमाणित करेगा और विवाद होने पर फैसला कौन लेगा।

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गाजा में बार-बार क्यों नाकाम हो रहे हैं शांति समझौते? (फोटो: एआई इमेज)

गाजा पट्टी में महीनों से जारी हिंसा और तबाही के बीच कई बार संघर्ष विराम और शांति समझौतों की घोषणाएं की गईं, लेकिन हर बार नतीजा सिफर ही रहा। आखिरकार ऐसा क्यों होता है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बड़े-बड़े दावों के साथ तैयार किए गए शांति समझौते जमीन पर उतरते ही बिखर जाते हैं?

यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबर्ग के शोधकर्ता आदम फार्कहर ने 'पीस एग्रीमेंट डेटाबेस' के आंकड़ों के आधार पर इस बात का गहन विश्लेषण किया है कि आखिर इन समझौतों के बार-बार टूटने के पीछे कौन सी बड़ी वजहें मौजूद हैं।

अनुपालन और निगरानी की व्यवस्था का न होना

गाजा शांति वार्ताओं में सबसे बड़ी कमी यह रही है कि समझौतों का पालन कौन कराएगा, इसकी कोई ठोस व्यवस्था तय नहीं की जाती। उदाहरण के लिए, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के 'बोर्ड ऑफ पीस' ने गाजा के लिए 15 सूत्रीय रूपरेखा जारी की थी। इसके तहत हमास को अंतरराष्ट्रीय संस्था द्वारा प्रमाणित फिलस्तीन विशेषज्ञों की समिति को हथियार सौंपने थे और बदले में इजराइल को चरणबद्ध तरीके से अपनी सेना हटानी थी।

डोनाल्ड ट्रंप की शांति योजना (Photo: AP)

डोनाल्ड ट्रंप की शांति योजना (Photo: AP)

लेकिन इजराइल ने इस योजना को खारिज कर दिया। इसके बाद अमेरिका ने निगरानी का जिम्मा एक अमेरिकी सैन्य जनरल को देने की बात कही। इस प्रकार निरस्त्रीकरण की शर्तों में बार-बार बदलाव यह दर्शाता है कि किसी भी समझौते में पहले से यह तय ही नहीं होता कि शर्तों के पालन की जांच या सत्यापन कौन करेगा।

विवाद सुलझाने और सजा तय करने के अधिकार की कमी

वर्ष 2025 में गाजा को लेकर चार प्रमुख समझौते दर्ज किए गए, जिनमें जनवरी का संघर्ष विराम, अक्टूबर के समझौते और नवंबर का संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव शामिल हैं। इन दस्तावेजों में बंधकों की अदला-बदली और विस्थापितों की वापसी जैसे आंकड़ों का ब्योरा तो बहुत बारीकी से दिया गया, लेकिन सबसे जरूरी बातें गायब रहीं।

इनमें यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि:

  • किस कदम को समझौते का उल्लंघन माना जाएगा?
  • अगर कोई पक्ष मुकर जाए तो फैसला सुनाने का अधिकार किसके पास होगा?
  • प्रक्रिया रुकने पर उसे दोबारा कैसे शुरू किया जाएगा?

अमेरिका, मिस्र और कतर जैसे देशों को गारंटर तो बनाया गया, लेकिन उनके पास सिर्फ बातचीत जारी रखने की जिम्मेदारी थी। उन्हें गड़बड़ी दर्ज करने का हक तो था, पर फैसला लागू करवाने की शक्ति नहीं दी गई। इसी वजह से जब मार्च में पहले चरण की समयसीमा खत्म हुई, तो दूसरा चरण शुरू ही नहीं हो पाया और इजराइल ने दोबारा बमबारी शुरू कर दी।

इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू (Photo: AP)

इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू (Photo: AP)

गुटों का सीधे तौर पर दस्तखत न करना

अक्टूबर में अमेरिका, मिस्र, कतर और तुर्किये ने व्यापक शांति के सिद्धांतों वाले एक घोषणापत्र पर दस्तखत किए। हालांकि, इस पर असली संघर्षरत पक्षों यानी इजराइल और हमास ने हस्ताक्षर ही नहीं किए। हालांकि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में गारंटरों का हस्ताक्षर करना असामान्य नहीं है, लेकिन जो दो पक्ष आपस में लड़ रहे हैं, वे दूसरों के दस्तखत से शांति की गारंटी नहीं मान सकते। जब तक लड़ाई लड़ने वाले समूह खुद जवाबदेह नहीं बनते, तब तक कागजी वादे निष्प्रभावी रहते हैं।

इजराइली सेना की वापसी की शर्तों में लगातार बदलाव

शांति प्रक्रिया का एक बड़ा रोड़ा यह है कि अंतिम लक्ष्य को लेकर दोनों पक्ष सहमत नहीं हैं। 15 सूत्रीय योजना में इजराइली सेना की चरणबद्ध वापसी का वादा था, लेकिन बाद में 'बोर्ड ऑफ पीस' ने इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को भरोसा दिया कि जब तक हमास का पूरी तरह निरस्त्रीकरण नहीं हो जाता, इजराइली सेना गाजा से बाहर नहीं निकलेगी। सत्यापन की जिम्मेदारी भी बहुपक्षीय समिति के बजाय एक अमेरिकी जनरल को सौंप दी गई। शर्तों में इस तरह के एकतरफा बदलाव से दूसरा पक्ष कभी भरोसा नहीं कर पाता।

शांति के लिए आगे का रास्ता क्या है?

विशेषज्ञों के अनुसार, गाजा में शांति तभी संभव है जब:

  • एक ऐसा स्वतंत्र मध्यस्थ चुना जाए जिसे इजराइल और हमास दोनों स्वीकार करें।
  • प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही उल्लंघन की स्थिति में उठाए जाने वाले कड़े कदमों का स्पष्ट खाका तैयार हो।
  • गाजा के आम फलस्तीनियों को भविष्य की शासन व्यवस्था में भागीदार बनाया जाए ताकि उन्हें एक राजनीतिक लक्ष्य दिख सके।

अगर बिना किसी स्पष्ट निगरानी तंत्र और निष्पक्ष मध्यस्थ के सिर्फ समझौते थोपे जाते रहेंगे, तो निरस्त्रीकरण का मुद्दा हल होने के बाद भी प्रक्रिया फिर से किसी न किसी गतिरोध पर जाकर ठप पड़ जाएगी।

monu jha
मोनू झाauthor

मोनू कुमार टाइम्स नाउ नवभारत की डिजिटल टीम में वायरल और ट्रेंडिंग डेस्क पर काम कर रहे हैं। न्यूजरूम में 4 साल से अधिक का अनुभव रखने वाले मोनू वायरल कंटेंट, ऑफबीट खबरों और सोशल मीडिया ट्रेंड्स को पहचानने में बेहद दक्ष हैं। यूनीक एंगल तलाशने और कहानियों को आकर्षक अंदाज में प्रस्तुत करने की उनकी क्षमता उन्हें डिजिटल कंटेंट स्पेस में अलग पहचान देती है। मोनू कुमार 4,000 से अधिक स्टोरीज लिख चुके हैं, जिनमें कई वायरल रिपोर्ट्स, ट्रेंड-बेस्ड अपडेट्स और सोशल मीडिया-फोकस्ड कंटेंट शामिल हैं।

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