Munshi Premchand Biography in Hindi: हिंदी साहित्य के इतिहास में जब भी मानवीय संवेदना, यथार्थवाद और समाज के अछूते वर्ग की सच्ची तस्वीर की बात होती है, तो एक ही नाम सबसे पहले स्मरण आता है- मुंशी प्रेमचंद। आज यानी 8 अक्टूबर को हिन्दी कथा-उपन्यास की दुनिया के सबसे प्रसिद्ध हस्ताक्षर, कालजयी साहित्यकार, उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद जी की पुण्यतिथि है। अपनी समावेशी साहित्यिक दृष्टि द्वारा समाज में कौड़ियों से लेकर बेशकीमती मोतियों तक को एक धागे में पिरोने वाले हिंदी साहित्य और कहानियों के प्रतीक-पुरुष मुंशी प्रेमचंद जी की लेखनी ने समाज के शोषित, वंचित और पीड़ित वर्ग की व्यथा को स्वर देने का काम किया। एक साधारण व्यक्ति की धनपत राय से कथा सम्राट 'प्रेमचंद' तक की यात्रा का रहस्य समझ बेहद दिलचस्प है। उनका असली नाम धनपत राय श्रीवास्तव था लेकिन साहित्य जगत उन्हें "उपन्यास सम्राट" और "आधुनिक हिंदी साहित्य का पितामह" कहता है। उनकी कलम ने समाज के दर्द को आवाज दी और यह दिखाया कि साहित्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि परिवर्तन का सबसे शक्तिशाली माध्यम है। वे सिर्फ एक कथाकार या उपन्यासकार नहीं थे, बल्कि भारतीय समाज की आत्मा के द्रष्टा और जनसाहित्य के निर्माता थे। प्रेमचंद की रचनाएं आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, जितनी पहले थीं।
बनारस के लमही से आरंभ हुई जीवन यात्रा
प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को वाराणसी जिले के लमही गांव में हुआ। उनके पिता अजायब राय डाकखाने में मुंशी के पद पर कार्यरत थे। जब वे मात्र सात वर्ष के थे, तभी उनकी माता आनंदी देवी गोलोकवासी हो गईं और जब वह किशोर हुए तो पिता का भी साया सिर से उठ गया। 14 वर्ष की उम्र में ही प्रेमचंद के नाजुक कंधों पर जिम्मेदारियों का बोझ आ गया। सौतेली मां, दो छोटे भाई-बहन और अपनी पत्नी की जीविका का भार उन पर था। विपरीत परिस्थितियों के बावजूद प्रेमचंद का झुकाव शिक्षा और पुस्तकों की ओर रहा और वह पढ़ते रहे। वे पुस्तकालयों और किताब की दुकानों पर बैठकर घंटों उपन्यास और कहानियां पढ़ा करते थे। उनकी शिक्षा की शुरुआत उर्दू माध्यम से हुई और यही कारण था कि उनकी रचनाओं में उर्दू की भाषा की मिठास और प्रवाह साफ झलकता है।

मुंशी प्रेमचंद: आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह
वकालत का अधूरा सपना
प्रेमचंद वकील बनना चाहते थे और एमए तक पढ़ना चाहते थे, लेकिन आर्थिक तंगी ने उनका रास्ता रोक दिया। पढ़ाई के साथ-साथ वे ट्यूशन पढ़ाकर घर चलाते थे। जब 1919 में उनका ग्रेजुएशन पूरा हुआ तो वह डिप्टी सब-इंस्पेक्टर के पद पर नियुक्त हुए। सरकारी नौकरी की व्यस्ततता और स्थायित्व भी उनकी रचनात्मकता और लेखन की गति को नहीं रोक सकीऔर वह जीवन की सच्चाइयों एवं समाज के संघर्षों की तस्वीर पन्नों पर उतारते रहे। सबसे पहले उन्होंने उर्दू में लिखना शुरू किया और अपना उपनाम रखा "नवाब राय"।
विद्रोही कलम की शुरुआत
उनकी पहली कहानियों का संग्रह था ‘सोजे वतन’ जिसका अर्थ है “देश का मातम”। 1907 में आए इस कहानी संग्रह में उन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ आम जनता के उत्पीड़न और शोषण का चित्रण किया था। तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने ‘सोजे वतन’ की सभी प्रतियां जलाने का आदेश दिया और प्रेमचंद को कलेक्टर के सामने पेश किया गया। उन पर जनता को भड़काने का आरोप लगा और उन्हें अपना उपनाम ‘नवाब राय’ छोड़ना पड़ा। हालांकि इस घटना ने भी उनकी लेखनी की धार को कमजोर नहीं होने दिया और वह समाज की आवाज बनकर लिखते रहे।

मुंशी प्रेमचंद: उपन्यास सम्राट
कैसे बने ‘प्रेमचंद’ और फिर ‘मुंशी प्रेमचंद’
‘सोजे वतन’ उपनाम के बाद उन्हें नया नाम चाहिए था। ‘जमाना’ पत्रिका के संपादक मुंशी दयानारायण निगम थे। उन्होंने ‘प्रेमचंद’ नाम से पत्रिका में लेख लिखने की सलाह दी। वह अपने सहकर्मी कन्हैयालाल मुंशी के साथ लेख लिखते थे और दोनों के नाम साथ छपते थे। इस वजह से लोगों ने भ्रम के चक्कर में मुंशी और प्रेमचंद को साथ पढ़ना शुरू कर दिया। तब से साहित्य का यह महानायक ‘मुंशी प्रेमचंद’ कहलाया।वे लेखक ही नहीं, बल्कि एक युगद्रष्टा थे जिन्होंने भारतीय साहित्य को जनमानस के करीब लाया।
उपन्यास सम्राट प्रेमचंद
प्रेमचंद ने अपने जीवन में 15 उपन्यास, 300 से अधिक कहानियां, 3 नाटक, 10 अनुवाद, 7 बाल पुस्तकें और असंख्य लेख, संपादकीय व पत्र लिखे। उनकी कहानियां अपने आप में आंदोलन थीं। ‘पूस की रात’, ‘ईदगाह’, ‘कफन’, ‘नमक का दरोगा’, ‘दो बैलों की कथा’ जैसी कहानियों में उन्होंने उस भारत की तस्वीर पेश की, जिसे उस दौर के बड़े लेखक अक्सर नजरअंदाज करते थे। वे ऐसे लेखक थे जिन्होंने समाज के निम्न वर्ग, किसानों, मजदूरों, महिलाओं और दलितों के संघर्षों को मुख्यधारा में स्थान दिलाया।
उपन्यासों में सामाजिक यथार्थ का गहरा चित्रण
प्रेमचंद का साहित्य महज कल्पना नहीं, बल्कि जीवन का दस्तावेज है। उनके उपन्यासों में सामाजिक यथार्थ का गहरा चित्रण मिलता है। ‘सेवासदन’ (1918) में स्त्री की स्वतंत्रता और सामाजिक मर्यादाओं के संघर्ष की कहानी दिखती है, तो ‘प्रेमाश्रम’ (1922) में किसान आंदोलन का यथार्थ नजर आता है। ‘गोदान’ (1936) भारत के ग्रामीण जीवन की व्यथा का जीवंत दस्तावेज है और इसी कारण इसे हिंदी साहित्य की सबसे महान कृति माना जाता है। ‘निर्मला’, ‘रंगभूमि’, ‘कायाकल्प’, ‘गबन’ जैसी रचनाएं समाज की परतों को उजागर करती हैं। मुंशी प्रेमचंद ने भारतीय समाज को आत्मदर्शन कराया। उन्होंने आम आदमी के दुःख, उसकी हिम्मत और उसके अस्तित्व को सम्मान दिया।

मुंशी प्रेमचंद: साहित्य से क्रांति के सूत्रधार
साहित्य से क्रांति
प्रेमचंद के साहित्य, लेखन और कहानियों से क्रांति का उदय किया। उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत, जातिवाद, लैंगिक असमानता, सामंतवाद और गरीबी जैसे मुद्दों को कलम के जरिए चुनौती दी। उन्होंने अपने लेखन से आम आदमी के कष्ट, उसकी हिम्मत और अस्तित्व को सम्मान दिया। कहना गलत नहीं होगा कि मुंशी प्रेमचंद ने भारतीय समाज को साहित्य के माध्यम से आत्मदर्शन कराया। सरल, सहज और संवेदनशील लेखन वाले प्रेमचंद की भाषा आम जनमानस की भाषा थी। उन्होंने साबित किया था कि महान साहित्य जटिल शब्दों से नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं को उकेरने से बनता है।
अधूरा रह गया था उपन्यास
जीवन के अंतिम वर्षों में प्रेमचंद गंभीर रूप से बीमार पड़ गए थे। 8 अक्टूबर 1936 को उनका निधन हो गया था। अंतिम समय में वह उपन्यास ‘मंगलसूत्र’ लिख रहे थे, जिसे वे पूरा नहीं कर सके। बाद में उनके पुत्र अमृत राय ने इस उपन्यास को पूरा किया। गोरखपुर के जिस स्कूल में वे अध्यापक थे, वहां प्रेमचंद साहित्य संस्थान की स्थापना की गई है। उनकी स्मृतियां आज यहीं सुरक्षित हैं। उनकी स्मृति में भारत सरकार ने 31 जुलाई 1980 को उनकी जन्मशती के अवसर पर 30 पैसे मूल्य का डाक टिकट जारी किया था।
एक युग थे प्रेमचंद
प्रेमचंद चले गए, लेकिन उनकी लेखनी हमारे बीच अमर है। उनकी कहानियां आज भी उस भारत की धड़कन हैं, जहां गोदान का पात्र ‘होरी’ अब भी जीने की कोशिश करता है, हर ईदगाह का ‘हामिद’ अपने प्यार से दुनिया जीत लेता है और हर कफन के ‘घीसू-माधव’ गरीबी की बेबसी का प्रतीक बन जाते हैं। प्रेमचंद एक लेखक, कहानीकार या उपन्यासकार नहीं, एक युग थे और युग कभी मरते नहीं, अमर रहते हैं।
