भारत में परिवार और बच्चों को लेकर सोच लंबे समय से सामाजिक परंपराओं से प्रभावित रही है। खासकर बेटे को लेकर कई परिवारों में एक अलग तरह की उम्मीद देखने को मिलती रही है। परिवार का नाम आगे बढ़ाने से लेकर माता-पिता की देखभाल तक, बेटे को कई जिम्मेदारियों से जोड़कर देखा जाता रहा है। ऐसे माहौल में बेटी के जन्म को लेकर सोच अलग रही है।
दूसरी तरफ वरिष्ठ राजनेता शरद पवार के परिवार से जुड़ा एक पुराना किस्सा इस पारंपरिक सोच से कुछ अलग तस्वीर सामने रखता है। उनकी बेटी और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) की नेता सुप्रिया सुले ने अभिनेत्री सोहा अली खान के पॉडकास्ट ‘All About Her’ में अपने माता-पिता की शादी और परिवार से जुड़ी एक दिलचस्प बात साझा की। उन्होंने बताया कि शादी से पहले उनके पिता ने उनकी मां प्रतिभा पवार के सामने बच्चों को लेकर एक खास शर्त रखी थी।
शादी से पहले शरद पवार ने क्या कहा था?
सुप्रिया सुले के मुताबिक, शादी से पहले शरद पवार ने उनकी मां से कहा था कि वह सिर्फ एक बच्चा चाहते हैं। खास बात यह थी कि उनके लिए बच्चे का बेटा या बेटी होना मायने नहीं रखता था। यानी वह एक बच्चे के पक्ष में थे, चाहे वह बेटा हो या बेटी।
सुप्रिया ने बताया कि उनकी मां ने इस विचार को स्वीकार किया था और चाहती थीं कि दोनों का कम से कम एक अपना बच्चा जरूर हो। बातचीत के दौरान गोद लेने का विकल्प भी सामने आया था। शरद पवार ने परिवार के भीतर से किसी बच्चे को गोद लेने की संभावना पर भी विचार किया था।
आखिरकार दोनों की एक बेटी हुईं- सुप्रिया सुले। इस किस्से का सबसे दिलचस्प पहलू यही है कि परिवार में बेटे के जन्म को लेकर किसी तरह की प्रतीक्षा या दबाव की बात सामने नहीं आती। शरद पवार के लिए एक बच्चा ही पर्याप्त था और वह बेटा हो या बेटी, इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता था।
बेटी के जन्म के बाद भी नहीं बदली सोच
सुप्रिया सुले ने बातचीत के दौरान अपने पिता की इसी सोच से जुड़ा एक और किस्सा सुनाया। उन्होंने बताया कि उनके जन्म के बाद परिवार नियोजन की जिम्मेदारी उनके पिता ने खुद ली थी। इसके बाद जब कई साल गुजर गए और सुप्रिया खुद दूसरी बार गर्भवती हुईं तो उन्होंने यह खबर अपने पिता को बताई। सुप्रिया को उम्मीद थी कि दूसरी संतान की खबर सुनकर उनके पिता खुश होंगे, लेकिन उनका रिएक्शन कुछ अलग था। उन्होंने सवाल किया कि जब एक बच्चा पहले से है तो दूसरा बच्चा क्यों चाहिए।
सुप्रिया के लिए यह प्रतिक्रिया थोड़ी हैरान करने वाली थी, क्योंकि वह अपने पिता को खुशखबरी देने गई थीं। शरद पवार की सोच में परिवार के लिए एक बच्चे का विचार अब भी कायम था। हालांकि, उन्होंने अपनी बेटी पर अपनी इच्छा नहीं थोपी। जब सुप्रिया ने बताया कि वह और उनके पति दूसरा बच्चा चाहते हैं, तो उन्होंने फैसला उन्हीं दोनों पर छोड़ दिया।
बेटे की चाह से अलग थी सोच
इस पूरे किस्से का सबसे अहम पहलू सिर्फ यह नहीं है कि शरद पवार छोटा परिवार चाहते थे। इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि उनकी शर्त में बच्चे के लिंग को लेकर कोई प्राथमिकता नहीं थी। भारतीय समाज के एक बड़े हिस्से में लंबे समय तक बेटे को परिवार का उत्तराधिकारी और बुजुर्ग माता-पिता का सहारा माना जाता रहा है। ऐसे में ‘एक बच्चा, चाहे बेटा हो या बेटी’ वाली सोच अपने समय के संदर्भ में अलग नजर आती है।
सुप्रिया सुले की बातों से यह भी संकेत मिलता है कि उन्हें अपने पिता के परिवार में कभी इस भावना के साथ नहीं पाला गया कि बेटी पर्याप्त नहीं है और उसके बाद बेटे की जरूरत होगी। उनके लिए बेटी ही परिवार की संतान थी, किसी बेटे की जगह लेने वाली संतान नहीं।
