एक तरफ चीन में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का राजकीय दौरा चल रहा है, तो दूसरी तरफ भारत की राजधानी नई दिल्ली वैश्विक कूटनीति का सबसे बड़ा केंद्र बनी हुई है। गुरुवार से दिल्ली में दो दिवसीय ब्रिक्स (BRICS) विदेश मंत्रियों की बैठक शुरू हो गई है। यह बैठक ऐसे समय में हो रही है जब खाड़ी क्षेत्र में 'ईरान युद्ध' के बादल गहरे मंडरा रहे हैं। दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या उभरती अर्थव्यवस्थाओं का यह समूह युद्ध की आग को ठंडा करने में कोई बड़ी भूमिका निभा पाएगा?
डिप्लोमैटिक 'टाइटरोप' पर भारत
भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर के लिए यह बैठक किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। उद्घाटन भाषण में जयशंकर ने अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र में "सुरक्षित और निर्बाध समुद्री प्रवाह" का आह्वान किया। यह बयान सीधे तौर पर 'हॉर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) की ओर इशारा था, जहां से दुनिया का पांचवां हिस्सा तेल और गैस गुजरता है और जो वर्तमान में संघर्ष के कारण ब्लॉक है। भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती संतुलन साधना है। उसे एक तरफ पुराने मित्र ईरान को साथ लेकर चलना है, तो दूसरी तरफ इजरायल और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे रणनीतिक साझेदारों के हितों का भी ध्यान रखना है।
ईरान की दिल्ली से गुहार: 'इजरायल और अमेरिका की निंदा हो'
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने दिल्ली पहुंचते ही ब्रिक्स देशों से एकजुट होने की अपील की। उन्होंने तेहरान के खिलाफ अमेरिका और इजरायल के हमलों को 'अवैध आक्रामकता' करार देते हुए इसकी निंदा करने की मांग की। अरागची का यह दौरा काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि फरवरी 2026 से जारी अमेरिका-ईरान तनाव के बाद वह लगातार जयशंकर के संपर्क में रहे हैं। ईरान का मानना है कि ब्रिक्स जैसा मंच वैश्विक व्यवस्था को बचाने और अंतरराष्ट्रीय कानूनों की रक्षा के लिए एक मजबूत हथियार साबित हो सकता है।
ब्रिक्स 2026: क्यों खास है दिल्ली की यह बैठक?
ब्रिक्स अब केवल पांच देशों (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका) का समूह नहीं रहा। इसमें अब मिस्र, इथियोपिया, ईरान और यूएई जैसे देश शामिल हो चुके हैं, जबकि इंडोनेशिया भी जनवरी 2025 में इसका हिस्सा बना।
इस बैठक के मायने:
ग्लोबल साउथ की आवाज: ब्रिक्स उन देशों का समूह है जो पश्चिमी देशों के प्रभुत्व को चुनौती देते हुए विकासशील देशों की मांगों को वैश्विक मंच पर रखना चाहते हैं।
आर्थिक और सुरक्षा समन्वय: सदस्य देश सुरक्षा और आर्थिक नीतियों पर तालमेल बिठाने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि पश्चिमी प्रतिबंधों या राजनीतिक दबाव का मुकाबला किया जा सके।
शांति की तलाश: ईरान युद्ध ने ब्रिक्स के भीतर भी मतभेद पैदा किए हैं। रूस और चीन का रुख जहाँ ईरान के करीब है, वहीं भारत और ब्राजील जैसे देश संतुलन की बात कर रहे हैं।
क्या रुक सकता है युद्ध?
ईरान युद्ध को खत्म करने में ब्रिक्स की भूमिका 'मध्यस्थ' के रूप में उभर सकती है। चूंकि इस समूह में ईरान खुद एक सदस्य है और भारत और रूस जैसे देशों के इजरायल व अमेरिका के साथ भी कामकाजी संबंध हैं, इसलिए पर्दे के पीछे की बातचीत (Back-channel diplomacy) का रास्ता खुल सकता है।
यदि ब्रिक्स देश तेल की आपूर्ति और समुद्री सुरक्षा के मुद्दे पर एक साझा प्रस्ताव लाते हैं, तो यह युद्धरत पक्षों पर दबाव बनाने का काम कर सकता है। हालांकि, ईरान ने स्पष्ट किया है कि वह अपने आत्मरक्षा के वैध अधिकार प्रयोग करने के लिए प्रतिबद्ध है।
भारत-ईरान संबंधों का नया अध्याय
अब्बास अराघची का यह दौरा भारत-ईरान मैत्री संधि की 75वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में किए गए पिछले प्रयासों को आगे बढ़ाएगा। मई 2025 में अपनी पिछली यात्रा के दौरान उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से भी मुलाकात की थी। भारत के लिए ईरान के साथ चाबहार बंदरगाह और ऊर्जा सुरक्षा जैसे कई रणनीतिक हित जुड़े हैं, जो युद्ध की स्थिति में खतरे में पड़ सकते हैं।
कुल मिला कर देखें तो दिल्ली में हो रही यह बैठक महज एक कूटनीतिक औपचारिकता नहीं है। यह उभरती हुई शक्तियों का एक ऐसी कोशिश है जो यह साबित करना चाहता है कि दुनिया के बड़े फैसलों के लिए अब केवल वॉशिंगटन या लंदन की ओर देखने की जरूरत नहीं है। अगर भारत अपनी अध्यक्षता में ईरान संकट पर कोई कॉमन ग्राउंड तलाश लेता है, तो यह 2026 की सबसे बड़ी कूटनीतिक जीत होगी।
