नॉलेज

55 हजार साल पहले अरब में क्या कर रहे थे निएंडरथल इंसान? पत्थर के औजारों ने खोला राज

सऊदी अरब के नफूद रेगिस्तान में करीब 55 हजार साल पुराने पत्थर के औजार मिले हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, उस समय अरब में झीलें और घास के मैदान मौजूद थे। संभव है कि निएंडरथल पानी और जानवरों की तलाश में इस इलाके तक पहुंचे हों। हालांकि, अभी मानव अवशेष वहां नहीं मिले हैं।

Image

नफूद रेगिस्तान में मिला प्राचीन सबूत, क्या अरब तक पहुंचे थे निएंडरथल? (सांकेतिक फोटो)

अब तक माना जाता था कि निएंडरथल इंसान यूरोप जैसे ठंडे इलाकों तक ही सीमित थे। लेकिन एक 'क्वाटरनरी साइंस रिव्यूज' जर्नल में छपी एक नई वैज्ञानिक रिसर्च ने इस धारणा को चुनौती दी है। शोधकर्ताओं का दावा है कि निएंडरथल (Neanderthals) की पहुंच आज के सऊदी अरब के अंदरूनी हिस्सों तक पहले के अनुमान से कहीं ज्यादा गहराई तक थी। नए अध्ययन के अनुसार, करीब 55 हजार साल पहले निएंडरथल ऐसे इलाके में पहुंचे चुके थे, जो आज बेहद शुष्क और रेगिस्तानी है।

खोज कहां हुई?

यह खोज सऊदी अरब के नेफुद रेगिस्तान में, जुब्बा शहर के पास स्थित जेबेल कातेफेह 1 (Jebel Katefeh 1) नाम की जगह से हुई है, जहां एक समय पर झील हुआ करती थी। यहां से शोधकर्ताओं को पत्थर से बने प्राचीन औजार मिले। दिलचस्प बात यह है कि इस जगह से न तो निएंडरथल की कोई हड्डी मिली, न ही उनका DNA। तो आखिर उनकी मौजदूगी के बारे में शोधकर्ताओं को कैसे पता चला।

बिना हड्डियों और DNA के कैसे हुई निएंडरथल पहचान?

इंसानी अवशेष न मिलने की वजह से वैज्ञानिकों ने एक अलग तरीका अपनाया। उन्होंने पत्थर के टुकड़ों ( flakes) के आकार के आधार पर पहचान की। दरअसल, अलग-अलग तरह के प्राचीन इंसानों के पत्थर के औजार बनाने का तरीका अलग-अलग होता था। यानी आकार देखकर पता लगाया जा सकता है कि औजार किस मानव समूह ने बनाया।

वैज्ञानिकों ने जेबेल कातेफेह और पास की एक छोटी जगह ALM 3 से सैकड़ों पत्थर के टुकड़े नापे। फिर इनकी तुलना अरब, लेवांत और उत्तर-पूर्वी अफ्रीका की उन जगहों के औजारों से की, जहां टूलमेकर की पहचान पहले से पक्की थी। इसी तुलना से एक सांख्यिकीय मॉडल तैयार किया गया, जिसने साफ दिखाया कि जेबेल कातेफेह से मिले औजार निएंडरथल की शैली से काफी ज्यादा मिलते-जुलते थे, न कि आस-पास के शुरुआती होमो सेपियंस (आधुनिक इंसान) की शैली से।

उम्र कैसे पता चली?

वैज्ञानिकों ने समय पता करने के लिए एक खास तकनीक का इस्तेमाल किया, जिसे OSL डेटिंग यानी ऑप्टिकली स्टिम्युलेटेड ल्यूमिनेसेंस कहते हैं। यह तकनीक बताती है कि मिट्टी के कणों पर आखिरी बार सूरज की रोशनी कब पड़ी थी। इससे पता चला कि यह औजार करीब 55,000 साल पुराने हैं। उस समय अरब का यह इलाका आज के मुकाबले कहीं ज्यादा हरा-भरा और गीला हुआ करता था। वहां झीलें और घास के मैदान थे, जहां जानवर चरने आया करते थे। उस समय उस इलाके में सिर्फ निएंडरथल ही एकमात्र इंसानी प्रजाति मौजूद थी।

यह खोज इतनी बड़ी बात क्यों है?

पहले माना जाता था कि निएंडरथल सिर्फ यूरोप तक ही सीमित थे। लेकिन पिछले दो दशकों की खोजों से पता चला कि वे साइबेरिया और मध्य-पूर्व तक भी गए थे। अब यह नई रिसर्च बताती है कि वे अरब के अंदरूनी और दुर्गम इलाकों तक भी पहुंच सकते थे।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ

जर्मनी के एक वैज्ञानिक कहते हैं कि यह सबूत काफी मजबूत है। उनका मानना है कि उस समय के गीले मौसम ने जानवरों को वहां आकर्षित किया होगा, जिनका पीछा करते हुए निएंडरथल भी वहां पहुंचे होंगे। लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि कुछ तुलना वाली जगहों के औजार लंबे समय में जमा हुए हो सकते हैं, इसलिए पूरी सावधानी ज़रूरी है। रिसर्च से जुड़े एक वैज्ञानिक भी मानते हैं कि अगर निएंडरथल की कोई हड्डी मिल जाती, तो यह बात और पक्की हो जाती। लेकिन अरब के कठोर मौसम में हड्डियां व DNA बचना बेहद मुश्किल है, इसलिए पत्थर के औजार ही हमारे पास सबसे भरोसेमंद सबूत बचते हैं।

Pooja Kumari
पूजा कुमारीauthor

पूजा टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल की सिटी डेस्क पर कार्यरत हैं। जर्नलिज़्म में पीजी डिप्लोमा कर चुकी पूजा को टीवी मीडिया में भी काम करने का अनुभव है। शहरी मुद्दों की गहरी समझ के कारण पूजा लोकल न्यूज, मेट्रो व रेल अपडेट्स, रोड और इंफ्रास्ट्रक्चर, लोकल डेवलपमेंट, मौसम, क्राइम, स्थानीय राजनीति और सामाजिक मुद्दों पर मजबूत पकड़ रखती हैं। शहरों की नब्ज पहचानने और स्थानीय संवेदनशीलताओं को खबरों में प्रभावी ढंग से पिरोने की क्षमता उनकी राइटिंग स्किल को विशेष बनाती है। पूजा अब तक 3,000 से अधिक न्यूज रिपोर्ट्स लिख चुकी हैं, जिनमें कई महत्वपूर्ण लोकल अपडेट्स, विश्लेषणात्मक स्टोरीज और रिपोर्ताज शामिल हैं।

और पढ़ें
End of Article