महाराष्ट्र के बीड जिले में जिला परिषद प्रशासन के एक विवादित आदेश ने सरकारी स्कूलों की तस्वीरें लेने और वीडियो रिकॉर्डिंग को लेकर नई बहस छेड़ दी है। इस आदेश के बाद सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों ने स्कूलों में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। बीड जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी जितिन रहमान ने 20 अगस्त को हुई एक आपात बैठक के बाद यह आदेश जारी किया। ग्रुप एजुकेशन ऑफिसर्स के माध्यम से उनके अधिकार क्षेत्र में आने वाले स्कूलों के केंद्र प्रमुखों और प्रधानाचार्यों को इस संबंध में निर्देश दिए गए हैं।
फोटो या वीडियो से पहले लेनी होगी अनुमति
बीड पंचायत समिति की ग्रुप एजुकेशन ऑफिसर प्रणिता गंगाखेडकर की ओर से जारी निर्देशों के अनुसार, स्कूल परिसर में किसी भी विषय पर फोटो खींचने या वीडियो रिकॉर्ड करने से पहले स्कूल के प्रधानाचार्य की अनुमति लेनी होगी। निर्देश में स्कूल समय के दौरान ऐसी गतिविधियों से बचने पर भी जोर दिया गया है। प्रशासन का कहना है कि बिना अनुमति होने वाली रिकॉर्डिंग और अन्य गतिविधियां छात्रों की पढ़ाई और शिक्षा की समग्र गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती हैं।
'स्कूल फिक्स कैंपेन' के बीच आया आदेश
यह आदेश कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके की ओर से 15 अगस्त को शुरू किए गए 'स्कूल फिक्स कैंपेन' के बीच आया है। इस अभियान के तहत ग्रामीण इलाकों में स्थित जिला परिषद के स्कूलों का दौरा किया जा रहा है। अभियान का उद्देश्य स्कूलों में पीने के पानी, शौचालय, कक्षाओं, टूटी खिड़कियों और अन्य बुनियादी सुविधाओं की स्थिति को सामने लाना है। अभियान के दौरान छात्रों और शिक्षकों से बातचीत के साथ-साथ स्कूलों की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर साझा किए जा रहे हैं, ताकि सरकारी स्कूलों की वास्तविक स्थिति लोगों तक पहुंच सके।
स्कूल समय में गतिविधियों की अनुमति न देने की सलाह
प्रशासन के निर्देश में प्रधानाचार्यों को यह भी सलाह दी गई है कि वे स्कूल समय के दौरान ऐसी गतिविधियों की अनुमति न दें। इसके बजाय आगंतुकों से विनम्रतापूर्वक स्कूल समय समाप्त होने के बाद परिसर में आने या रुकने के लिए कहा जाए। प्रशासन का तर्क है कि स्कूल समय में फोटो और वीडियो रिकॉर्डिंग जैसी गतिविधियां छात्रों की पढ़ाई में बाधा डाल सकती हैं और शिक्षा की गुणवत्ता पर असर पड़ सकता है।
पारदर्शिता और जवाबदेही पर उठे सवाल
हालांकि, इस आदेश के बाद सवाल उठने लगे हैं कि क्या फोटो और वीडियो रिकॉर्डिंग पर पाबंदी लगाने से सरकारी स्कूलों की वास्तविक समस्याओं को सार्वजनिक होने से रोका जा सकता है।
कई सरकारी स्कूलों में पीने के पानी की कमी, गंदे शौचालय, खराब बुनियादी ढांचा, जर्जर कक्षाएं और टूटी खिड़कियों जैसी समस्याएं छात्रों की पढ़ाई और उनके दैनिक जीवन को सीधे प्रभावित करती हैं।
सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि अभिभावकों, स्कूल प्रबंधन समितियों, सरपंचों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और शिक्षा से जुड़े लोगों को स्कूलों की सुविधाओं की निगरानी करने और कमियों को सामने लाने का अधिकार होना चाहिए।
अभिजीत दीपके ने की आदेश वापस लेने की मांग
'स्कूल फिक्स कैंपेन' चला रहे अभिजीत दीपके ने प्रशासन के इस निर्देश की आलोचना की है। उन्होंने मांग की है कि फोटो और वीडियो रिकॉर्डिंग से जुड़ी पाबंदियों को हटाया जाए।
दीपके ने चेतावनी दी है कि अगर प्रशासन ने आदेश वापस नहीं लिया तो इसके "गंभीर नतीजे" हो सकते हैं।
