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गंगा किनारे निर्माण पर से हटी रोक तो NGT सख्त, सरकार से मांगा जवाब; 27 अक्टूबर को अगली सुनवाई

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने गंगा नदी और उसकी सहायक नदियों के किनारे 'नो कंस्ट्रक्शन जोन' हटाने संबंधी केंद्र सरकार की नई अधिसूचना पर पर्यावरण मंत्रालय, जल शक्ति मंत्रालय और NMCG को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

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NGT ने केंद्र सरकार और जल शक्ति मंत्रालय को भेजा नोटिस

Photo : ANI

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने गंगा नदी और उसकी सहायक नदियों को लेकर केंद्र सरकार द्वारा नियमों में किए गए हालिया बदलावों पर कड़ा रुख अपनाया है। गंगा के डूब क्षेत्र से 'नो कंस्ट्रक्शन जोन' की अनिवार्य शर्त को हटाने वाली केंद्र सरकार की नई अधिसूचना को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए NGT ने केंद्र सरकार से जवाब तलब किया है। NGT ने केन्द्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) तथा राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (NMCG) सहित अन्य उत्तरदाताओं को नोटिस जारी कर इस मामले पर अपना रुख स्पष्ट करने का निर्देश दिया है।

क्या है विवाद और याचिकाकर्ता का दावा?

यह पूरा मामला केंद्र सरकार (जल शक्ति मंत्रालय) द्वारा अगस्त 2026 में जारी की गई एक अधिसूचना से जुड़ा है। इस अधिसूचना के जरिए 'गंगा नदी (पुनरुद्धार, संरक्षण और प्रबंधन) प्राधिकरण आदेश, 2016' में संशोधन किया गया है।

पर्यावरणविद अमित कुमार द्वारा दायर याचिका में कहा गया है कि 'नो कंस्ट्रक्शन जोन' का खत्म होना: नए नियमों से गंगा और उसकी सहायक नदियों के तटों से 'नो कंस्ट्रक्शन ज़ोन' वाले प्रावधान को हटा दिया गया है, जिससे नदी तटों पर निर्माण कार्य का रास्ता साफ हो सकता है। याचिकाकर्ता के अनुसार, यह नई अधिसूचना पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 3 के मूल उद्देश्यों के खिलाफ है। नए नियमों में 'सक्रिय बाढ़ क्षेत्र' को "5 साल में एक बार आने वाली बाढ़" के आधार पर परिभाषित किया गया है, जो बेहद संकुचित है।

NGT की पीठ ने क्या कहा?

NGT के अध्यक्ष जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव और विशेषज्ञ सदस्य अफरोज अहमद की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए माना कि याचिकाकर्ता का यह तर्क विचारणीय है कि 2016 के आदेश में किया गया संशोधन ट्रिब्यूनल के पिछले फैसलों, उच्च न्यायालयों के आदेशों और पर्यावरण कानूनों के विपरीत है।

पहले के प्रमुख न्यायिक आदेश-

2015 का NGT आदेश: सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के निर्देशों के आधार पर नदी तट के 100 से 200 मीटर के भीतर किसी भी निर्माण पर रोक लगाई गई थी।

2017 का ऐतिहासिक फैसला: NGT की छह सदस्यीय पीठ ने हरिद्वार से उन्नाव (कानपुर) के बीच गंगा नदी के तट से 100 मीटर के दायरे को पूरी तरह 'नो डेवलपमेंट जोन' घोषित किया था।

5 साल के नियम से क्या होगा नुकसान?

पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, पहले गंगा के बाढ़ क्षेत्र का निर्धारण 100 साल में आने वाली अधिकतम बाढ़ के आधार पर किया जाता था। लेकिन नए 5 साल वाले नियम से नदी का वास्तविक बाढ़ क्षेत्र कागजों में काफी सिकुड़ जाएगा, जिससे नदी के प्राकृतिक बफर ज़ोन में आवासीय, वाणिज्यिक और औद्योगिक निर्माण को अनुमति मिल सकती है। NGT ने सभी पक्षों को अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश देते हुए इस मामले की अगली सुनवाई 27 अक्टूबर 2026 तय की है।

Nishant Tiwari
निशांत तिवारीauthor

निशांत तिवारी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल की सिटी टीम में कॉपी एडिटर हैं। शहरों से जुड़ी खबरों, स्थानीय मुद्दों और नागरिक सरोकार को समझने की उनकी गहरी दृष्टि उन्हें इस बीट का एक भरोसेमंद और प्रभावी कंटेंट राइटर बनाती है। वे जटिल लोकल इश्यूज को सहज, स्पष्ट और असरदार अंदाज में पेश करने में दक्ष हैं और अबतक 2,000 से अधिक न्यूज रिपोर्ट लिख चुके हैं। उनकी लेखन शैली शहर की नब्ज पकड़ते हुए ऐसे कंटेंट पर केंद्रित रहती है, जो सीधे पाठकों के जीवन और उनकी रोजमर्रा की चिंताओं से जुड़ा होता है।

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