Trump China Visit: दुनिया की दो महाशक्तियों के राष्ट्राध्यक्ष, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, ने बीजिंग में मुलाकात हुई। इस मुलाकात पर पूरी दुनिया की निगाहें टिकी थी। हालांकि, इस मीटिंग को सबसे करीब से कोई देख रहा था तो वो था ताइवान। खुद को चीन से आजाद कराने के लिए संघर्ष कर रहा ताइवान,अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप से काफी उम्मीदें लगाए बैठा है। एक तरफ जहां, न ताइवान को अपना हिस्सा मानता है। वहीं, दूसरी ओर अमेरिका ताइवान को हथियार देने के लिए तैयार है।
दोनों नेताओं के बीच बीजिंग में कई मुद्दों पर चर्चा हुई। इनमें से एक ताइवान मुद्दा भी था। बंद कमरों के भीतर हुई करीब दो घंटे की वार्ता के बाद चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने राष्ट्रपति ट्रंप को बेहद कड़े शब्दों में चेतावनी दी।
शी जिनपिंग ने ताइवान मुद्दे पर क्या कहा?
शी जिनपिंग ने साफ कहा कि ताइवान का मुद्दा चीन-अमेरिका संबंधों की सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण 'रेड लाइन' है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इस मुद्दे को संभालने में अमेरिका की तरफ से जरा सी भी लापरवाही या चूक होती है, तो दोनों देशों के बीच "सीधी टक्कर और यहां तक कि एक सैन्य संघर्ष (Conflict)" पैदा हो सकता है, जिससे द्विपक्षीय रिश्ते पूरी तरह तबाह हो जाएंगे।
चीन की इस कड़ी आपत्ति के बावजूद, अमेरिकी अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि ताइवान को लेकर वाशिंगटन की नीति में कोई बदलाव नहीं आया है और वे उसकी रक्षा क्षमताओं का समर्थन जारी रखेंगे।
बता दें कि ट्रंप की रिपब्लिकन सरकार ने दिसंबर में ताइपे के लिए 11 अरब डॉलर के हथियार पैकेज को मंजूरी दी थी, लेकिन इस पर अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। सांसदों ने जनवरी में ताइवान को 14 अरब डॉलर के हथियार बेचने को भी मंजूरी दी थी, लेकिन यह सौदा तब तक आगे नहीं बढ़ सकता जब तक ट्रंप इसे औपचारिक रूप से कांग्रेस को नहीं भेज देते।

बीजिंग में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने शी जिनपिंग से की मुलाकात।
चीन से आते ही बदल गए ट्रंप के सुर?
हालांकि, चीन से लौटने के बाद ट्रंप के सुर बदले-बदले नजर आ रहे हैं। ट्रंप ने कहा है कि ताइवान खुद को चीन से आजाद होने की घोषणा नहीं करें। ट्रंप ने ताइवान को साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि वह खुद को चीन से आजाद घोषित करने की गलती न करे।
फॉक्स न्यूज को दिए इंटरव्यू में ट्रंप ने दो टूक कहा, "मैं नहीं चाहता कि कोई अपनी आजादी का आधिकारिक ऐलान करे।" उन्होंने साफ किया कि अमेरिका किसी युद्ध के मूड में नहीं है, बल्कि वह चाहते हैं कि चीन और ताइवान दोनों ही इस मामले पर शांत रहें।

चीन के दो दिवसीय यात्रा के बाद वॉशिंगटन पहुंचे ट्रंप।
ट्रंप ने कहा, ’’यह ताइवान पर कब्जे का मामला नहीं है। वे (चीन) सिर्फ यह नहीं चाहता कि ताइवान खुद को एक स्वतंत्र देश घोषित करे।’’ उन्होंने कहा, ’’जब तक मैं (सत्ता) में हूं, मुझे नहीं लगता कि वे कुछ करेंगे। लेकिन मेरे बाद वे ऐसा कर सकते हैं।’’ ट्रंप ने कहा, ’’मैं चाहता हूं कि चीन शांत रहे। हम युद्ध नहीं चाहते। अगर मौजूदा स्थिति बनी रहती है, तो मुझे लगता है कि चीन भी इससे संतुष्ट रहेगा।’’
हालांकि, ताइवान के राष्ट्रपति लाई चिंग-ते पहले ही कह चुके हैं कि ताइवान को अलग से आजादी की घोषणा करने की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि वह पहले से ही खुद को एक संप्रभु और स्वतंत्र देश मानता है।

चीन-ताइवान विवाद की पूरी कहानी। AI IMAGE
चीन-ताइवान संघर्ष का पूरा इतिहास समझें
ताइवान का शुरुआती इतिहास स्थानीय जनजातियों से जुड़ा है। लेकिन 17वीं शताब्दी (1683) में चीन के किंग राजवंश (Qing Dynasty) ने ताइवान पर अपना पूर्ण नियंत्रण स्थापित किया और इसे चीन का एक प्रांत बनाया।
पहला चीन-जापान युद्ध (1894-1895) किंग राजवंश के लिए बेहद निराशाजनक रहा। युद्ध में हारने के बाद चीन को 'शिमोनोसेकी संधि' (Treaty of Shimonoseki) के तहत ताइवान द्वीप को जापानी साम्राज्य को सौंपना पड़ा। इसके बाद अगले 50 सालों तक ताइवान पर जापान का शासन रहा।
चीन के भीतर दो बड़ी ताकतों चियांग काई-शेक की राष्ट्रवादी पार्टी और माओ ज़ेदोंग की कम्युनिस्ट पार्टी के बीच भयंकर गृहयुद्ध छिड़ गया। इस जंग में कम्युनिस्टों की जीत हुई और उन्होंने मुख्यभूमि पर पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की स्थापना की।
गृहयुद्ध में हारने के बाद चियांग काई-शेक और उनकी केएमटी पार्टी के करीब 20 लाख सैनिक और समर्थक मुख्यभूमि छोड़कर भाग गए और उन्होंने ताइवान द्वीप पर शरण ली। वहां उन्होंने अपनी पुरानी सरकार को जारी रखा और ताइपे को अपनी अस्थायी राजधानी घोषित किया। इस तरह एक ही समय पर दो चीन अस्तित्व में आ गए।
शुरुआत में दुनिया के कई देशों ने ताइवान को ही असली चीन माना, लेकिन 1971 में संयुक्त राष्ट्र ने मुख्यभूमि चीन को आधिकारिक मान्यता दे दी। इसके बाद 1979 में अमेरिका ने भी बीजिंग के साथ आधिकारिक कूटनीतिक संबंध स्थापित किए और ताइवान से अपने आधिकारिक रिश्ते तोड़ लिए।
ताइवान में कई दशकों तक मार्शल लॉ और सैन्य तानाशाही रही। लेकिन 1980 के दशक के उत्तरार्ध से यहाँ लोकतांत्रिक सुधार शुरू हुए। 1996 में ताइवान में पहला प्रत्यक्ष राष्ट्रपति चुनाव हुआ, जिसने ताइवान को चीनी मुख्यभूमि की कम्युनिस्ट व्यवस्था से पूरी तरह अलग एक स्वतंत्र लोकतांत्रिक पहचान दे दी।
बीजिंग ने ताइवान को शांत करने के लिए 'एक देश, दो प्रणाली' (One Country, Two Systems) का प्रस्ताव दिया—वही फॉर्मूला जिसके तहत हांगकांग चीन का हिस्सा बना था। लेकिन ताइवान की जनता और वहां की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों ने इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया, खासकर हांगकांग में लोकतंत्र को कुचले जाने के बाद ताइवान का अविश्वास और बढ़ गया।
आज ताइवान के पास अपना संविधान, लोकतांत्रिक सरकार, पासपोर्ट और सेना है। वहीं, मुख्यभूमि चीन इसे अपना एक 'टूटा हुआ प्रांत' मानता है और शी जिनपिंग साफ कर चुके हैं कि वे जरूरत पड़ने पर बल प्रयोग (सैन्य कार्रवाई) करके भी ताइवान को चीन में मिलाएंगे। वर्तमान में ताइवान जलडमरूमध्य (Taiwan Strait) में चीनी लड़ाकू विमानों और युद्धपोतों की घुसपैठ के कारण यह क्षेत्र दुनिया का सबसे बड़ा फ्लैशपॉइंट बना हुआ है।
