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Delhi vs Centre: 'सुप्रीम' फैसले का दिल्ली पर क्या होगा असर? केंद्र सरकार के पास अब कौन-कौन से विकल्प

  • Authored by: प्रांजुल श्रीवास्तव
  • Updated May 11, 2023, 03:25 PM IST

Delhi vs Centre: सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अन्य राज्यों की भांति दिल्ली सरकार के पास भी कई अधिकार होंगे। वह कई मामलों में अपने कानून लागू कर सकती है। हालांकि, दिल्ली में पुलिस, पब्लिक ऑर्डर और भूमि मामलों का अधिकार सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के पास रखा है।

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अरविंद केजरीवाल

Photo : BCCL

Delhi vs Centre: दिल्ली में IAS अधिकारियों ने नियंत्रण संबंधी एक मामले में केजरीवाल सरकार की बड़ी जीत हुई है। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने अपने फैसले में कहा है कि राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में एक चुनी हुई सरकार है। ऐसे में आईएएस अधिकारियों की नियुक्ति और तबादले का अधिकार दिल्ली सरकार के पास ही होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला एकमत से सुनाया है।

अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि कानून व्यवस्था, पुलिस और भूमि मामलों को छोड़कर अन्य मुद्दों पर दिल्ली सरकार का अधिकार होगा और प्रशासनिक कामों में उपराज्याल को दिल्ली की चुनी हुई सरकार की सलाह माननी होगी। सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले को दिल्ली सरकार की बड़ी जीत के तौर पर देखा जा रहा है। दरअसल, यह फैसला लंबे समय से कोर्ट में था, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना रुख साफ कर दिया है। ऐसे में जानते हैं सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिल्ली पर क्या असर होगा? केंद्र सरकार के पास अब कौन-कौन से विकल्प हैं? और इस फैसले को नजीर के दौर पर क्यों देखा जा रहा है?

पहले सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ किया है कि उपराज्यपाल के पास दिल्ली से जुड़े सभी मुद्दों का प्रशासनिक अधिकार नहीं है। दिल्ली विधानसभा से निर्वाचित सरकार को मिली शक्तियों में उपराज्यपाल हस्तक्षेप नहीं कर सकते। अधिकारियों की तैनाती और तबादले का अधिकार दिल्ली सरकार के पास ही होगा और उपराज्यपाल को अन्य राज्यों की तरह सरकार की सलाह माननी होगी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि पुलिस, पब्लिक ऑर्डर और भूमि मामलों का अधिकार केंद्र सरकार के पास ही रहेगा।

अब इस फैसले का असर क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद दिल्ली सरकार आईएएस अधिकारियों की नियुक्ति और तबादला अपने हिसाब से कर सकेगी। इसके अलावा उसे पुलिस, पब्लिक ऑर्डर और भूमि मामलों के अलावा अन्य मुद्दों पर फैसला लेने के लिए उपराज्यपाल से अनुमति नहीं लेनी पड़ेगी। ऐसे में दिल्ली में जिन मुद्दों पर केंद्रीय कानून नहीं लागू है, उस मामलों में दिल्ली की चुनी हुई सरकार विधानसभा के माध्यम से कानून बना सकेगी। वहीं, सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब दिल्ली सरकार की सलाह उपराज्यपाल को माननी ही होगी। बता दें, दिल्ली सरकार लगातार आरोप लगाती रही है कि जनता के हित में उसके कामकाजों पर उपराज्यपाल अनावश्यक रूप से अडंगा लगाते रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद उपराज्यपाल और दिल्ली सरकार के बीच टकराव कम हो सकता है।

अब जानिए केंद्र के पास क्या हैं विकल्प?

कानूनी जानकारों का कहना है कि केंद्र सरकार इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में एक रिव्यू पिटीशन दाखिल कर सकती है और इस मामले को बड़ी बेंच के पास भेजने की अपील कर सकती है। इतना ही नहीं केंद्र सरकार संसद में कानून पारित कर दिल्ली के अधिकार अपने हाथ में ले सकती है। हालांकि, इस कानून को सिर्फ सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है।
प्रांजुल श्रीवास्तव
प्रांजुल श्रीवास्तवauthor

<p>मैं इस वक्त टाइम्स नाउ नवभारत से जुड़ा हुआ हूं। पत्रकारिता के 8 वर्षों के तजुर्बे में मुझे और मेरी भाषाई समझ को गढ़ने और तराशने में कई वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों का योगदान रहा। 2016 में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से शुरू हुआ यह सफर देश की राजधानी दिल्ली में 'टाइम्स नाउ नवभारत' तक आ पहुंचा है। अखबारों में रिपोर्टिंग करते हुए शहरों की धूल फांकना और डिजिटल पत्रकारिता की बारीकियों को समझते हुए देश-विदेश की खबरों को आप तक पहुंचाने का मेरा ये सफर काफी किस्से-कहानियों से भरा हुआ है। लखनऊ की बाबा भीम राव अंबेडकर सेंट्रल यूनिवर्सिटी के क्लासरूम में प्रोफेसरों से मिले किताबी ज्ञान और पत्रकारीय सिद्धांतों को जमीन पर उतारने का मौका मुझे 2016 में ही मिल गया। पहला ब्रेक टाइम्स ग्रुप के प्रतिष्ठित अखबार 'नवभारत टाइम्स' ने दिया। यहां बतौर इंटर्न मुझे कई सामाजिक संगठनों की रिपोर्टिंग करने का मौका मिला। दिनभर शहर में घूम-घूम कर खबरों को बटोरना और शाम होते ही उन्हें लिखकर डेस्क के हवाले करना मेरी दिनचर्या का हिस्सा हो गया। इस अनुभव ने मुझे समाज के तौर तरीकों से परिचित कराया तो न्यूजरूम में सीनियर्स से मिली डांट ने पत्रकारिता की बारीकियों और भाषाई मर्यादा को समझने में मदद की। करीब 3 से 4 महीनों की इंटर्नशिप के बाद मुझे 2017 आते-आते गांधी परिवार के गढ़ रायबरेली भेजा गया। यह समय उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव और सत्ता के बदलाव का था। यहां बतौर रिपोर्टर मैं पहली बार राजनीतिक खबरों से रूबरू हुआ। रायबरेली के मिजाज को करीब 8 महीनों तक समझने के बाद नवभारत टाइम्स ने मुझे वापस लखनऊ बुलाया और शहर की रिपोर्टिंग करने का मौका दिया। यहां विज्ञान, पर्यावरण, बाजार, लखनऊ विकास प्राधिकरण, आवास विकास और मेट्रो जैसी बीट पर जमकर काम किया। यह सफर अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले मुरादाबाद तक पहुंच गया था, जहां मुझे दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित अखबार के लिए दो वर्षों तक रिपोर्टिंग करने का अवसर मिला। करीब दो वर्षों की पत्रकारिता के बाद अब मुझे देश की राजधानी की ओर रुख करना था और यह मौका अमर उजाला (डिजिटल) ने दिया। अखबारों की रिपोर्टिंग से निकलकर डिजिटल पत्रकारिता के अनुभव से मैं पहली बार रूबरू हो रहा था। यहां पर मुझे मेन डेस्क पर जिम्मेदारी मिली। जहां सबसे आगे रहते हुए सबसे सटीक खबरें आप तक पहुंचाना चुनौती भरा काम था, लेकिन पत्रकारिता की शुरुआत में मिले अनुभवों ने मेरा काम आसान बना दिया। यहां भी करीब दो वर्षों के बाद 2023 में मुझे टाइम्स ग्रुप से दोबारा जुड़ने का मौका मिला और टाइम्स नाउ नवभारत की मेन डेस्क पर मेरा सफर अब तक जारी है।</p>

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