कुछ फिल्ममेकर सिर्फ फिल्में बनाते हैं, तो कुछ अपनी एक अलग पहचान बना लेते हैं। मेघना गुलजार (Meghna Gulzar) ने इससे भी ज्यादा दिलचस्प काम किया है। उन्होंने ऐसा सिनेमैटिक वर्ल्ड बनाया है, जिसे देखते ही पता चल जाता है कि फिल्म उनकी है। राजी (Raazi), तलवार (Talvar) और सैम बहादुर (Sam Bahadur) जैसी फिल्मों में उन्होंने अलग-अलग जॉनर और मुद्दों पर काम किया, लेकिन उनकी कहानी कहने का अंदाज एक चीज पर हमेशा टिका रहा है- किसी बड़ी घटना के बीच छिपी इंसानी कहानी को सामने लाना। वो किसी खबर की हेडलाइन को उठाकर उसे एक ऐसी कहानी में बदल सकती हैं, जिसमें कई परतें हों। वो बेहद मुश्किल मुद्दों पर बिना जरूरत से ज्यादा सनसनी फैलाए बात करती हैं। उनकी फिल्मों में कोई गाना पूरी भावना को अपने साथ लेकर चल सकता है और बॉलीवुड के बड़े-बड़े सितारे भी ऐसे किरदारों में ढल जाते हैं कि दर्शक कुछ देर के लिए ये भूल जाते हैं कि सामने कोई स्टार है। अब दायरा (Daayra) में निर्देशक मेघना गुलजार एक बार फिर क्राइम, पुलिसिंग और न्याय की दुनिया में कदम रख रही हैं। फिल्म में करीना कपूर (Kareena Kapoor) और पृथ्वीराज सुकुमारन (Prithviraj Sukumaran) नजर आएंगे। Junglee Pictures और Pen Studios के बैनर तले बनी दायरा सच्ची घटनाओं से प्रेरित है और 18 सितंबर को सिनेमाघरों में रिलीज होगी।
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यहां जानते हैं पांच वजहें, जिनकी वजह से मेघना गुलजार का सिनेमा अपने आप में एक अलग जॉनर जैसा लगता है:
1) जहां दूसरों को सिर्फ हेडलाइन दिखती है, वहां मेघना कहानी ढूंढ लेती हैं
मेघना गुलजार के लिए किसी खबर की हेडलाइन ही पूरी कहानी नहीं होती। असल जिंदगी की घटनाएं, असाधारण लोग और ऐसी कहानियां जो पहले ही खबरों में आ चुकी हैं, उनके लिए सिर्फ शुरुआत होती हैं। इसके बाद वो उन लोगों की जिंदगी और उनके पीछे छिपी कहानी को और गहराई से सामने लाती हैं।
'तलवार' ने देश के सबसे पेचीदा आपराधिक मामलों में से एक को लेकर सच के अलग-अलग पहलुओं की पड़ताल की। 'राजी' ने एक असाधारण जासूसी कहानी को देशभक्ति, त्याग और परिवार से जुड़ी बेहद निजी कहानी बना दिया। छपाक (Chhapaak) ने सिर्फ एसिड अटैक तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि एक महिला की जिंदगी दोबारा अपने तरीके से जीने की कहानी दिखाई। वहीं 'सैम बहादुर' ने सिर्फ एक बड़े सैन्य अधिकारी की कहानी नहीं बताई, बल्कि वर्दी के पीछे के इंसान को भी दिखाया।।
किसी बड़ी खबर के पीछे छिपी इंसानी कहानी को सामने लाना मेघना की सबसे बड़ी खूबियों में से एक है। 'दायरा' में भी वो सच्ची घटनाओं से प्रेरणा लेकर एक भयानक अपराध की कहानी को सिर्फ अपराध तक सीमित नहीं रखतीं। इसके जरिए न्याय, पुलिस की कार्रवाई और मुश्किल हालात में लोगों के फैसलों की बात भी सामने आती है।
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2) बिना दिखावे के मुश्किल से मुश्किल मुद्दों पर बात
क्राइम, वॉर, देशभक्ति, न्याय, कानून और सजा जैसे मुद्दों को आसानी से सनसनीखेज तरीके से पर्दे पर दिखाया जा सकता है। लेकिन मेघना गुलजार ऐसा करने के बजाय कहानी को एक ठहराव के साथ सामने रखती हैं और शायद इसी वजह से उनकी फिल्में ज्यादा असर करती हैं।
'तलवार' में दर्शकों को सबसे ज्यादा उलझन इस बात की रहती है कि आखिर सच क्या है। वहीं 'राजी' में सहमत के फैसलों का उसकी जिंदगी पर क्या असर पड़ता है, यह सबसे ज्यादा महसूस होता है। उनकी फिल्में मुश्किल मुद्दों का इस्तेमाल सिर्फ लोगों को चौंकाने के लिए नहीं करतीं। वह कहानी को समय देती हैं और दर्शकों को खुद सोचने का मौका देती हैं।
'दायरा' में भी यही अंदाज नजर आ रहा है। ट्रेलर में सिर्फ भयानक अपराध को दिखाकर बात खत्म नहीं होती, बल्कि कहानी जल्दी ही न्याय, पुलिस की कार्रवाई और कानून के तहत होने वाली प्रक्रिया तक पहुंच जाती है। करीना कपूर की DCP अजोनी कोहली और पृथ्वीराज सुकुमारन के DCP रमन कुमार का न्याय को लेकर नजरिया अलग-अलग है। फिल्म किसी एक को सही बताने के बजाय सवाल खड़े करती हुई नजर आती है।
3) फिल्म का हिस्सा बन जाते हैं गाने
कुछ गाने हिट होते हैं, कुछ लंबे समय तक याद रहते हैं और कुछ ऐसे होते हैं जिन्हें फिल्म से अलग करना मुश्किल होता है। मेघना गुलजार की फिल्मों में गुलजार साहब के लिखे शब्द इस काम को और खास बना देते हैं।
'राजी' का “दिलबरो” इसका बेहतरीन उदाहरण है। ये सिर्फ एक गाना नहीं रहा, बल्कि सहमत और उसके परिवार के रिश्ते को समझने का एक भावनात्मक जरिया बन गया। घर छोड़ने का दर्द और अपने बड़े मिशन के पीछे छिपा त्याग, दोनों इस गाने के जरिए महसूस होते हैं।
इसी तरह 'छपाक' का एंथम भी फिल्म की सोच का हिस्सा बन गया। ये पर्दे के बाहर भी हिम्मत और अपनी पहचान दोबारा हासिल करने की भावना को आगे लेकर जाता है।
मेघना की फिल्मों में संगीत का इस्तेमाल भी कुछ अलग तरह से होता है। गाने सिर्फ इसलिए नहीं लगते कि फिल्म में एक साउंडट्रैक होना चाहिए। वे कहानी का हिस्सा बन जाते हैं। वे भावनाओं को और मजबूत करते हैं, रिश्तों को सामने लाते हैं और फिल्म खत्म होने के बाद भी दर्शकों के पास कुछ ऐसा छोड़ जाते हैं, जिसे वे अपने साथ लेकर जाते हैं।
4) मेघना गुलजार की फिल्म दिमाग में सवाल छोड़ देती हैं
मेघना गुलजार की फिल्म आपको एंटरटेन कर सकती है, भावुक कर सकती है और फिर चुपचाप आपको किसी ऐसी बात पर सोचने के लिए मजबूर कर सकती है, जिसके बारे में आपको लगता था कि आप उसे पहले से समझते हैं।
'तलवार' देखने के बाद सवाल उठता है कि हम किसी सच को लेकर कितने भरोसे के साथ कह सकते हैं कि यही सच्चाई है। राजी में देशभक्ति को बेहद निजी बना दिया गया है, जहां त्याग सबसे अहम हो जाता है। 'छपाक' की स्टोरी सिर्फ एसिड अटैक तक नहीं रुकती, बल्कि उस महिला की जिंदगी पर फोकस करती है जिसे इसके बाद अपनी जिंदगी दोबारा खड़ी करनी पड़ती है।
'सैम बहादुर' भी सिर्फ मेडल और सैन्य इतिहास की कहानी नहीं है। इसमें एक बड़े सैन्य अधिकारी की जिंदगी के साथ उनके काम करने के तरीके और उनकी सोच को भी दिखाया गया है।
'दायरा' भी इसी तरह का सवाल खड़े करती नजर आ रही है। फिल्म के बीच से एक बड़ा सवाल निकलता है- जब किसी भयानक अपराध के बाद लोगों में बहुत गुस्सा हो, तो क्या न्याय तुरंत मिलना चाहिए या फिर हर हाल में कानून के मुताबिक प्रक्रिया पूरी होनी चाहिए? हो सकता है कि दर्शक थिएटर से निकलते वक्त इस सवाल का कोई पक्का जवाब लेकर न जाएं, लेकिन शायद इस सवाल के बारे में सोचे बिना भी नहीं निकलेंगे।
5) मेघना के यहां स्टार्स किरदार बन जाते हैं
मेघना गुलजार की सबसे खास खूबियों में से एक ये भी है कि वो बड़े सितारों को अपनी फिल्मों में लेती हैं, लेकिन फिर दर्शक कुछ देर के लिए उस स्टार को भूल जाते हैं। उन्हें सिर्फ एक्टर और उसका किरदार याद रहता है।
आलिया भट्ट (Alia Bhatt) राजी में सिर्फ आलिया भट्ट नहीं थीं। वह सहमत बन गई थीं, जो एक ऐसी दुनिया में पहुंचती है, जिसके बारे में उसने शायद कभी नहीं सोचा था। दीपिका पादुकोण (Deepika Padukone) 'छपाक' में ग्लैमरस बॉलीवुड स्टार की तरह नजर नहीं आईं। वो मालती के किरदार में पूरी तरह ढल गईं और उसका दर्द, गुस्सा और हिम्मत कहानी का हिस्सा बन गया।
विक्की कौशल (Vicky Kaushal) ने सैम बहादुर में सिर्फ एक मशहूर सैन्य अधिकारी का किरदार नहीं निभाया। उन्होंने सैम मानेकशॉ के व्यक्तित्व, उनकी हाजिरजवाबी और उनकी दमदार मौजूदगी को पर्दे पर उतारा।
अब 'दायरा' में करीना कपूर और पृथ्वीराज सुकुमारन भी ऐसे किरदारों में नजर आएंगे, जिसमें दर्शकों ने उन्हें पहले इस अंदाज में शायद ही देखा हो। दोनों सीनियर पुलिस अधिकारियों के किरदार में हैं, लेकिन न्याय को लेकर उनके विचार बिल्कुल अलग हैं और यही दोनों को अलग रास्तों पर ले जाता है। यही है मेघना का असर। स्टार आपको फिल्म देखने के लिए थिएटर तक लेकर आ सकता है, लेकिन किरदार आपको उस स्टार को भूलने पर मजबूर कर देता है।
अपने आप में एक जॉनर
सच्ची कहानियां, मुश्किल मुद्दे, दिल को छूने वाला संगीत और ऐसे किरदार जो फिल्म खत्म होने के बाद भी याद रहते हैं। इन सबको एक साथ देखें तो मेघना गुलजार की फिल्मों को किसी एक जॉनर में रखना मुश्किल हो जाता है। उनकी फिल्में कभी क्राइम पर होती हैं, कभी जासूसी पर, कभी किसी मशहूर शख्स की जिंदगी पर और कभी जिंदगी में आई मुश्किलों से लड़ने की कहानी होती हैं। लेकिन इन सबके बीच उनका अपना अंदाज साफ नजर आता है। मेघना गुलजार सिर्फ अलग-अलग जॉनर में फिल्में बनाने वाली फिल्ममेकर नहीं हैं। वो खुद अपने आप में एक जॉनर बन चुकी हैं।
