Bahula Chaturthi Vrat Katha in Hindi: बहुला चतुर्थी को बहुला चौथ, बोल चौथ और भादुड़ी चौथ जैसे नामों से भी जाना जाता है। यह व्रत भाद्रपद महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि पर रखा जाता है। इस दिन भगवान गणेश, श्रीकृष्ण और गौ माता की पूजा करने की परंपरा है। माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, सुरक्षा और सुखी जीवन की कामना से यह व्रत रखती हैं। पूजा के समय बहुला गाय की कथा जरूर सुनी या पढ़ी जाती है। आखिर बहुला गाय ने ऐसा क्या किया था कि उसकी पूजा होने लगी? आइए पढ़ते हैं बहुला चौथ की भावपूर्ण व्रत कथा।
बहुला चतुर्थी व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण के समय नंद बाबा की गौशाला में अनेक गायें रहती थीं। उन्हीं में बहुला नाम की एक गाय थी। मान्यता है कि बहुला कामधेनु का अंश थी और भगवान श्रीकृष्ण को बहुत प्रिय थी।
बहुला बेहद शांत और सरल स्वभाव की थी। उसका एक छोटा बछड़ा भी था। वह हर दिन जंगल में चरने जाती और शाम होने से पहले गौशाला लौट आती थी। उसका बछड़ा दिनभर अपनी मां की राह देखता रहता था।
एक दिन बहुला जंगल में घास चरते-चरते अपने झुंड से दूर निकल गई। वापस लौटते समय अचानक एक शेर ने उसका रास्ता रोक लिया। शेर को सामने देखकर बहुला डर गई। उसे अपनी मृत्यु करीब दिखाई देने लगी। लेकिन अगले ही पल उसे गौशाला में इंतजार कर रहे अपने भूखे बछड़े का ध्यान आया।
बहुला ने साहस जुटाकर शेर से कहा - हे वनराज! मैं जानती हूं कि आज मैं आपका आहार हूं। लेकिन मेरा छोटा बछड़ा सुबह से भूखा है। वह मेरे लौटने की प्रतीक्षा कर रहा होगा। कृपया मुझे एक बार उसे दूध पिलाने की अनुमति दे दें। मैं वचन देती हूं कि उसे दूध पिलाने के बाद आपके पास वापस आ जाऊंगी।
शेर को उसकी बात पर विश्वास नहीं हुआ। उसने कहा कि मृत्यु के मुंह से जाने के बाद भला कौन वापस आता है? यदि मैंने तुम्हें छोड़ दिया तो तुम दोबारा कभी यहां नहीं आओगी।
बहुला ने सत्य और धर्म की शपथ लेते हुए कहा कि वह अपना वचन कभी नहीं तोड़ेगी। उसकी आंखों में भय जरूर था, लेकिन शब्दों में सच्चाई थी। शेर ने कुछ देर विचार किया और उसे जाने दिया।
बछड़े को दूध पिलाकर लौट आई बहुला
बहुला तेजी से गौशाला पहुंची। मां को देखकर बछड़ा खुशी से उसके पास दौड़ा और दूध पीने लगा। बहुला ने उसे खूब प्यार किया। उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे। बछड़ा समझ नहीं पा रहा था कि उसकी मां इतनी दुखी क्यों है।
दूध पिलाने के बाद बहुला ने अपने बछड़े को समझाया कि वह अपना ध्यान रखे। गौशाला में मौजूद दूसरी गायों ने बहुला से वापस जंगल न जाने की विनती की। सभी ने कहा कि शेर को दिया वचन निभाने की क्या जरूरत है, क्योंकि वहां जाने का अर्थ अपनी मृत्यु को बुलाना है।
बहुला ने उत्तर दिया कि प्राणों के मोह में यदि मैं अपना वचन तोड़ दूं तो मेरे जीवन का क्या अर्थ रह जाएगा? सत्य से बड़ा कोई धर्म नहीं है। इतना कहकर बहुला फिर उसी जंगल की ओर चल पड़ी।
बहुला के सत्य के आगे हार गया शेर
बहुला को वापस आता देखकर शेर भी हैरान रह गया। बहुला उसके सामने खड़ी हो गई और बोली कि वनराज, मैंने अपने बछड़े को दूध पिला दिया है। अब मैं अपना वचन पूरा करने के लिए लौट आई हूं।” बहुला की सच्चाई, मातृ-प्रेम और साहस देखकर शेर का हृदय बदल गया। कथा के एक प्रचलित स्वरूप के अनुसार, शेर के रूप में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण बहुला की परीक्षा ले रहे थे। बहुला के लौटते ही उन्होंने अपना वास्तविक स्वरूप प्रकट कर दिया।
श्रीकृष्ण ने कहा कि हे बहुला! तुमने कठिन परिस्थिति में भी सत्य का साथ नहीं छोड़ा। तुमने मां का कर्तव्य भी निभाया और अपना वचन भी पूरा किया। आज से भाद्रपद कृष्ण चतुर्थी पर तुम्हारी पूजा की जाएगी। इसके बाद भगवान ने बहुला और उसके बछड़े को अभयदान दिया। तभी से इस तिथि को बहुला चतुर्थी कहा जाने लगा। लोक परंपराओं में कथा के कुछ विवरण अलग मिलते हैं, लेकिन सत्य, मातृत्व और वचन निभाने का मूल भाव समान है।
बहुला चौथ की कथा से क्या सीख मिलती है
बहुला चतुर्थी की कहानी केवल धार्मिक कथा नहीं है। इसमें जीवन से जुड़ी कई गहरी बातें छिपी हैं।
- मुश्किल समय में भी सत्य का रास्ता नहीं छोड़ना चाहिए।
- मां अपनी संतान के लिए बड़े से बड़ा संकट सह सकती है।
- दिया गया वचन निभाना मनुष्य का बड़ा गुण है।
- साहस का अर्थ डर न लगना नहीं, बल्कि डर के बावजूद सही काम करना है।
- पशुओं के प्रति दया, सेवा और सम्मान रखना चाहिए।
बहुला चौथ की कथा कब पढ़ें
बहुला चौथ के दिन शाम को गौ माता, बछड़े, सिंह और भगवान श्रीकृष्ण का पूजन करने के बाद व्रत कथा पढ़ी जाती है। कुछ परिवारों में मिट्टी से गाय और सिंह की आकृति बनाकर पूजा की जाती है। कथा सुनते समय हाथ में फूल और अक्षत रख सकते हैं। कथा पूरी होने के बाद इन्हें पूजा स्थान पर अर्पित कर आरती करें।
यदि आसपास गाय उपलब्ध हो तो उसे हरा चारा, गुड़ या भोजन खिलाया जा सकता है। पशु को असुविधा देने वाली कोई चीज न खिलाएं। बहुला चौथ का वास्तविक संदेश पूजा के साथ जीवों के प्रति दया और जिम्मेदारी निभाना भी है।
डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं, लोक कथाओं और प्रचलित परंपराओं पर आधारित है। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में व्रत कथा तथा पूजा के नियमों में अंतर हो सकता है।
