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होम लोन में छिपा है वो नंबर जो चुपके से बढ़ा देता है आपकी EMI, आज ही चेक करें अपना एग्रीमेंट!

होम लोन एग्रीमेंट में छिपा 'स्प्रेड मार्जिन' या 'रिस्क प्रीमियम' क्लॉज ब्याज दरें न बढ़ने पर भी आपकी ईएमआई चुपके से बढ़ा सकता है। इस छिपे हुए नंबर को इग्नोर करने पर लाखों का नुकसान हो सकता है, इसलिए तुरंत अपना एग्रीमेंट चेक करें।

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Home Loan

अपना खुद का घर खरीदना हर किसी का सबसे बड़ा सपना होता है। चूंकि घर की कीमतें आसमान छू रही हैं, इसलिए ज्यादातर लोग इस सपने को पूरा करने के लिए बैंकों से होम लोन (Home Loan) का सहारा लेते हैं। होम लोन लेते समय हमारा पूरा ध्यान मुख्य रूप से सिर्फ दो बातों पर होता है पहला कि बैंक हमें किस ब्याज दर (Interest Rate) पर लोन दे रहा है और दूसरा कि हमारी हर महीने की ईएमआई (EMI) कितनी बनेगी। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आपके होम लोन के दस्तावेजों और एग्रीमेंट (Loan Agreement) के बारीक अक्षरों (Fine Print) के बीच एक ऐसा सीक्रेट या छिपा हुआ नंबर होता है, जो बैंक की ब्याज दरें न बढ़ने पर भी आपकी ईएमआई या लोन की अवधि (Tenure) को चुपके से बढ़ा सकता है?

होम लोन में छिपा वो नंबर

कई बार लोन एग्रीमेंट में कुछ ऐसे क्लॉज और कैलकुलेशन नंबर छिपे होते हैं, जिन्हें आम लोग साधारण समझ के कारण नजरअंदाज कर देते हैं। इस छिपे हुए गणित को न समझने का खामियाजा ग्राहकों को लंबे समय तक ज्यादा पैसे चुकाकर भुगतना पड़ता है। आइए जानते हैं कि होम लोन एग्रीमेंट में छिपा वह 'जादुई नंबर' क्या है, वह आपकी जेब पर कैसे डाका डालता है और आप लोन लेने से पहले या बाद में इस नुकसान से खुद को कैसे बचा सकते हैं।

कैसे होता है खेल?

इस पूरे खेल को समझने के लिए सबसे पहले आपको 'रीसेट पीरियड' (Reset Period) और 'मार्जिन' (Margin/Spread) के कॉन्सेप्ट को समझना होगा। आजकल लगभग सभी बैंकों के होम लोन 'फ्लोटिंग इंटरेस्ट रेट' (Floating Interest Rates) पर आधारित होते हैं, जो सीधे तौर पर भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के रेपो रेट (Repo Rate) या बैंक के एक्सटर्नल बेंचमार्क लेंडिंग रेट (EBLR) से जुड़े होते हैं। लेकिन बहुत से लोग यह नहीं जानते कि जब आरबीआई रेपो रेट में बदलाव करता है, तो बैंक आपके लोन की ब्याज दर को तुरंत उसी दिन नहीं बदलते। इसके लिए बैंक आपके एग्रीमेंट में एक 'रीसेट पीरियड' तय करते हैं, जो आमतौर पर 3 महीने, 6 महीने या 1 साल का होता है। इसी रीसेट क्लॉज में वह छिपा हुआ नंबर होता है जो यह तय करता है कि बैंक आपके लोन पर बेस रेट के ऊपर कितना एक्स्ट्रा 'मार्जिन या स्प्रेड' वसूल रहा है।

असली गड़बड़ी तब होती है जब बैंक आपके रिस्क प्रोफाइल (Risk Profile) के आधार पर इस मार्जिन नंबर को चुपके से बदल देते हैं। लोन एग्रीमेंट में अक्सर एक ऐसा क्लॉज शामिल होता है जो बैंक को यह अधिकार देता है कि अगर भविष्य में आपका क्रेडिट स्कोर (CIBIL Score) कम होता है, या आपकी जॉब प्रोफाइल में कोई बदलाव आता है, तो बैंक आपके लोन पर लगने वाले 'रिस्क प्रीमियम' (Risk Premium) या स्प्रेड मार्जिन को बढ़ा सकता है। उदाहरण के लिए, मान लीजिए आपने 8.5% की दर पर लोन लिया था, जिसमें 6.5% बेंचमार्क रेट था और 2% बैंक का मार्जिन (स्प्रेड) था। अगर बैंक ने किसी वजह से आपका रिस्क मार्जिन बढ़ाकर 2.5% कर दिया, तो भले ही आरबीआई ने रेपो रेट न बढ़ाया हो, आपके लिए ब्याज दर बढ़कर 9% हो जाएगी। यह 0.5% का छोटा सा छिपा हुआ नंबर दिखने में बहुत मामूली लगता है, लेकिन 20 या 25 साल के लंबे होम लोन पर यह आपकी कुल ईएमआई के बोझ को लाखों रुपए बढ़ा देता है।

EMI पर कैसे पड़ता है असर?

इसके अलावा, एक और छिपा हुआ नंबर जो आपकी ईएमआई को प्रभावित करता है, वह है 'लोन रीपेमेंट फ्रीक्वेंसी और इंटरेस्ट कैलकुलेशन डेज' (Interest Calculation Method)। कुछ बैंक ब्याज की गणना हर महीने की पहली तारीख को बचे हुए मूलधन (Monthly Reducing Balance) पर करते हैं, जबकि कुछ बैंक दैनिक आधार (Daily Reducing Balance) पर करते हैं। यदि लोन एग्रीमेंट में इस तरीके को ठीक से स्पष्ट नहीं किया गया है, तो बैंक आपके पेमेंट शेड्यूल को इस तरह सेट कर सकते हैं जिससे शुरुआती वर्षों में आपके द्वारा चुकाई जाने वाली ईएमआई का एक बहुत बड़ा हिस्सा सिर्फ ब्याज चुकाने में चला जाता है और मूलधन (Principal Amount) बहुत धीमी गति से कम होता है। इसके कारण आपकी लोन की अवधि बढ़ती चली जाती है, जो अंततः आपकी जेब को भारी नुकसान पहुंचाती है।

इस अनचाहे वित्तीय नुकसान और चुपके से बढ़ने वाली ईएमआई से बचने का सबसे सही तरीका क्या है? सबसे पहले, जब भी आप होम लोन के फाइनल पेपर्स पर साइन करने जाएं, तो बैंक अधिकारी से सीधे पूछें कि आपके लोन पर 'स्प्रेड या मार्जिन' कितना है और क्या यह पूरे लोन कार्यकाल के दौरान फिक्स रहेगा या बैंक इसे अपने विवेक से बदल सकता है। इसके अलावा, अपने लोन एग्रीमेंट में 'रीसेट डेट' और 'रिस्क प्रीमियम क्लॉज' को बहुत ध्यान से पढ़ें। यदि आप पहले से होम लोन चुका रहे हैं, तो आज ही अपने बैंक से 'लोन स्टेटमेंट' और 'इंटरेस्ट रेट रीसेट लेटर' की मांग करें और देखें कि शुरुआत में तय किए गए मार्जिन नंबर में बैंक ने कोई बदलाव तो नहीं किया है। अपने अधिकारों के प्रति आपकी यही जागरूकता आपको बैंकों की छिपी हुई शर्तों से बचाएगी और आपके सपनों के आशियाने को आपके बजट के भीतर सुरक्षित रखेगी।

Richa Tripathi
रिचा त्रिपाठीauthor

रिचा त्रिपाठी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में बिजनेस डेस्क पर सीनियर कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। मीडिया इंडस्ट्री में 7 वर्षों के अनुभव के साथ रिचा, पर्सनल फाइनेंस, स्टॉक मार्केट, टैक्स प्लानिंग और अर्थव्यवस्था से जुड़े विषयों पर मजबूत पकड़ रखती हैं। अब तक 8,000 से अधिक कंटेंट लिख चुकी रिचा की विशेषता है—जटिल वित्तीय जानकारियों को सरल, स्पष्ट और भरोसेमंद तरीके से पाठकों तक पहुंचाना। वह ऐसी स्टोरीज तैयार करती हैं जो न केवल जानकारीपूर्ण होती हैं, बल्कि आम पाठक की वित्तीय समझ को बेहतर बनाने में भी मदद करती हैं।

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