UPI Charges : यूपीआई (UPI) के जरिए होने वाले भुगतान को लेकर नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने सरकार को एक अहम सुझाव दिया है। उनका कहना है कि सरकार को अभी कुछ और वर्षों तक यूपीआई लेनदेन पर शून्य शुल्क की व्यवस्था जारी रखनी चाहिए। इसके बाद हालात की समीक्षा करके आगे का फैसला लिया जा सकता है। राजीव कुमार ने पीटीआई-भाषा से बातचीत में कहा कि वह किसी भी राशि के यूपीआई लेनदेन पर कारोबारियों से शुल्क लेने के पक्ष में नहीं हैं। उनके मुताबिक यूपीआई केवल भुगतान का एक माध्यम नहीं है, बल्कि इसका अर्थव्यवस्था पर व्यापक सकारात्मक असर पड़ता है।
UPI को सार्वजनिक सेवा के तौर पर देखने की जरुरत
राजीव कुमार ने कहा कि सरकार को यूपीआई को ऐसी सार्वजनिक व्यवस्था के रूप में देखना चाहिए, जिसका फायदा पूरी अर्थव्यवस्था को मिलता है। उन्होंने कहा कि यूपीआई के बुनियादी ढांचे को बनाए रखने पर सरकारी खजाने से करीब 20,000 करोड़ रुपये खर्च होते हैं, लेकिन इससे मिलने वाले कुल फायदे इस खर्च से कहीं ज्यादा हैं। उनके अनुसार, यूपीआई ने देश में डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के साथ-साथ लोगों के लेनदेन के तरीके को भी बदल दिया है। ऐसे में इस व्यवस्था पर शुल्क लगाने से पहले इसके व्यापक आर्थिक प्रभाव को ध्यान में रखना जरूरी है।
कुछ और साल तक जीरो चार्ज की सलाह
राजीव कुमार ने कहा कि सरकार को कम से कम कुछ और वर्षों तक यूपीआई लेनदेन पर शून्य शुल्क की व्यवस्था जारी रखनी चाहिए। इसके बाद स्थिति की समीक्षा की जा सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार को यह देखना चाहिए कि डिजिटल भुगतान बढ़ने से देश में नकदी के इस्तेमाल और जीडीपी के बीच किस तरह का बदलाव हो रहा है। अगर आगे चलकर मुद्रा और जीडीपी के अनुपात में गिरावट का रुझान दिखाई देता है, तो उस समय यूपीआई शुल्क व्यवस्था की समीक्षा की जा सकती है।
छोटे शुल्क से बढ़ सकता है कैश का इस्तेमाल
राजीव कुमार ने चेतावनी दी कि यूपीआई पर छोटा सा शुल्क भी लोगों और कारोबारियों को दोबारा नकद भुगतान की ओर ले जा सकता है। उन्होंने कहा कि इससे डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के अब तक के प्रयासों को नुकसान पहुंचने की संभावना है। उनके मुताबिक, अगर लोग यूपीआई के इस्तेमाल पर अतिरिक्त लागत महसूस करने लगेंगे तो कुछ कारोबारी और ग्राहक नकद भुगतान को प्राथमिकता दे सकते हैं। इसलिए फिलहाल मौजूदा व्यवस्था को बनाए रखना बेहतर होगा।
15 अक्टूबर से बदलेगा शुल्क का नियम
दरअसल, सरकार ने 15 सितंबर को यूपीआई भुगतान से जुड़े शुल्क नियमों में बदलाव की घोषणा की थी। करीब छह साल तक पूरी तरह शुल्क-मुक्त रहने के बाद अब 15 अक्टूबर से कारोबारियों को 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई भुगतान पर 0.4 प्रतिशत शुल्क लगाया जाना है। हालांकि, इस बदलाव का असर आम लोगों के रोजमर्रा के व्यक्ति-से-व्यक्ति यानी P2P भुगतान पर नहीं पड़ेगा। छोटे भुगतान भी इस शुल्क के दायरे से बाहर रखे गए हैं।
ग्राहकों से सीधे नहीं लिया जाएगा शुल्क
वित्त मंत्रालय ने साफ किया था कि यूपीआई के जरिए भुगतान करने वाले ग्राहकों से कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा। मंत्रालय के मुताबिक, MDR यानी मर्चेंट डिस्काउंट रेट कारोबारियों के बीच भुगतान व्यवस्था में लगाया जाने वाला शुल्क है। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि व्यक्तियों के लिए यूपीआई का इस्तेमाल बिना किसी मासिक सीमा, लेनदेन की संख्या की पाबंदी या शुल्क-मुक्त लेनदेन की किसी सीमा के जारी रहेगा।
फैसले पर सियासी विवाद भी हुआ
यूपीआई शुल्क से जुड़े इस फैसले पर राजनीतिक विवाद भी देखने को मिला। विपक्षी दलों ने सरकार के फैसले की आलोचना की। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि यह अमेरिकी दबाव के आगे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फिर से झुकने जैसा है। इसके जवाब में भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस पर फर्जी खबर फैलाने का आरोप लगाया। भाजपा ने कहा कि सरकार पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि MDR शुल्क ग्राहकों से नहीं लिया जाएगा।
ऐसे में राजीव कुमार की सलाह के बाद यूपीआई शुल्क को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। अब यह देखना होगा कि सरकार डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने और यूपीआई के संचालन की लागत के बीच किस तरह संतुलन बनाती है।
