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जहर-मुक्त खेती के लिए गांव में बने जैविक खाद यूनिट, पद्म पुरस्कार से सम्मानित किसानों ने की सरकार से अपील

Poison Free Farming: पद्म पुरस्कार से सम्मानित किसानों और कृषि विशेषज्ञों ने ‘जहर-मुक्त खेती’ को बढ़ावा देने के लिए विशेष स्कूल खोलने का सुझाव दिया। उन्होंने गौशालाओं को जैविक खाद उत्पादन केंद्र बनाने और गांव स्तर पर कम्पोस्ट की उपलब्धता सुनिश्चित करने पर जोर दिया। उनका कहना है कि इससे उर्वरकों का संतुलित उपयोग बढ़ेगा और मिट्टी की गुणवत्ता खराब होने से बचाई जा सकेगी।

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शास्त्री भवन में हुई अहम बैठक: मिट्टी की सेहत पर जोर (तस्वीर-istock)

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Poison Free Farming : पद्म सम्मान प्राप्त किसानों और कृषि जानकारों ने ‘जहर-मुक्त खेती’ को बढ़ावा देने के लिए खास प्रशिक्षण स्कूल शुरू करने की जरूरत बताई। उन्होंने सुझाव दिया कि गौशालाओं को जैविक खाद बनाने के केंद्रों में बदला जाए और गांवों में कम्पोस्ट आसानी से उपलब्ध कराई जाए। उनका मानना है कि इससे खाद का संतुलित इस्तेमाल होगा और मिट्टी की सेहत सुरक्षित रहेगी। शास्त्री भवन में शुक्रवार को उर्वरक मंत्रालय की ओर से एक अहम बैठक आयोजित की गई। इस बैठक में पद्म पुरस्कार से सम्मानित किसान और खेती के विशेषज्ञ शामिल हुए। बैठक की अध्यक्षता उर्वरक मंत्रालय के सचिव रजत कुमार मिश्रा ने की। यह उच्च स्तरीय परामर्श केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक मंत्री जेपी नड्डा के नेतृत्व में हुआ। बैठक का उद्देश्य देश में मिट्टी की सेहत सुधारने और खेती को ज्यादा टिकाऊ बनाने के उपायों पर चर्चा करना था। यह पहल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ‘धरती बचाओ’ आह्वान के तहत चलाई जा रही मुहिम का हिस्सा है।

‘ज्यादा उर्वरक मतलब ज्यादा मुनाफा’ सोच पर चेतावनी

बैठक में विशेषज्ञों ने इस सोच के खिलाफ चेताया कि ज्यादा उर्वरक डालने से ही ज्यादा पैदावार और मुनाफा होता है। उनका कहना था कि रासायनिक खाद का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल मिट्टी की गुणवत्ता को खराब कर रहा है। इससे जमीन की उर्वरता कम हो रही है और लंबे समय में किसानों को नुकसान उठाना पड़ सकता है। विशेषज्ञों ने कहा कि किसानों को संतुलित मात्रा में खाद इस्तेमाल करने और फसल विविधीकरण अपनाने के बारे में सही जानकारी देना जरूरी है।

‘जहर-मुक्त कृषि स्कूल’ खोलने का प्रस्ताव

न्यूज एजेंसी पीटीआई-भाषा के मुताबिक पद्म पुरस्कार से सम्मानित किसान उमाशंकर पांडेय ने ‘जहर-मुक्त कृषि स्कूल’ शुरू करने का सुझाव दिया। उनका कहना था कि इन स्कूलों के जरिए किसानों को टिकाऊ और प्राकृतिक खेती के तरीकों के बारे में सिखाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि वे इस दिशा में सभी राज्यों के कृषि विभागों के साथ मिलकर काम करने को तैयार हैं। उनका मानना है कि अगर किसानों को सही प्रशिक्षण और मार्गदर्शन मिले, तो वे रासायनिक खेती पर निर्भरता कम कर सकते हैं।

फसल चक्र और हरित खाद पर जोर

न्यूज एजेंसी पीटीआई-भाषा के मुताबिक पद्म पुरस्कार से सम्मानित राम शरण वर्मा ने फसल चक्र और फसल विविधीकरण को जरूरी बताया। उन्होंने कहा कि एक ही फसल बार-बार उगाने से मिट्टी कमजोर हो जाती है। इसलिए फसल बदल-बदलकर उगानी चाहिए। उन्होंने हरित खाद को बढ़ावा देने और उर्वरक की बोरियों के आकार को संतुलित करने की भी सलाह दी, ताकि किसान जरूरत से ज्यादा खाद न डालें। उनका कहना था कि किसानों की सोच बदलना बेहद जरूरी है।

गांव स्तर पर कम्पोस्ट की उपलब्धता जरूरी

न्यूज एजेंसी पीटीआई-भाषा के मुताबिक भारत भूषण त्यागी ने वैज्ञानिक तरीके से फसल प्रबंधन अपनाने और गांव स्तर पर कम्पोस्ट (जैविक खाद) की उपलब्धता सुनिश्चित करने की बात कही। उन्होंने कहा, “फसल का बचा हुआ हिस्सा खुशहाली की नींव है।” उनका मानना है कि खेतों में बची फसल के अवशेषों को जलाने के बजाय खाद बनाने में इस्तेमाल किया जाए। इससे मिट्टी की सेहत सुधरेगी और किसानों की लागत भी कम होगी।

उर्वरकों की बिक्री के दबाव पर चिंता

न्यूज एजेंसी पीटीआई-भाषा के मुताबिक सेठ पाल सिंह ने कहा कि कई बार ज्यादा उर्वरकों की बिक्री का दबाव भी किसानों को अधिक खाद डालने के लिए प्रेरित करता है। उन्होंने सुझाव दिया कि खेती की जमीन के लिए कितनी खाद जरूरी है, इसका सही आकलन होना चाहिए। साथ ही किसानों को वैज्ञानिक और सटीक जानकारी दी जानी चाहिए, ताकि वे जरूरत के मुताबिक ही उर्वरक का इस्तेमाल करें।

गौशालाओं को जैविक खाद इकाई बनाने का सुझाव

न्यूज एजेंसी पीटीआई-भाषा के मुताबिक कंवल सिंह ने गौशालाओं को जैविक खाद बनाने वाली इकाई के रूप में विकसित करने का सुझाव दिया। उनका कहना था कि इससे गोबर और अन्य जैविक पदार्थों का सही उपयोग होगा और गांवों में आसानी से जैविक खाद उपलब्ध हो सकेगी। उन्होंने स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर खेती करने और जैविक खेती के लिए एक संगठित श्रृंखला बनाने की जरूरत पर भी जोर दिया।

संतुलित और जिम्मेदार खेती की ओर कदम

बैठक में शामिल सभी विशेषज्ञों का मानना था कि गांव स्तर पर खाद और जैविक खाद की स्थानीय उपलब्धता सुनिश्चित करने से किसानों को संतुलित और जिम्मेदार तरीके से खेती करने में मदद मिलेगी। अगर किसानों को सही जानकारी, प्रशिक्षण और संसाधन मिलें, तो मिट्टी की सेहत को बचाया जा सकता है और खेती को लंबे समय तक लाभकारी बनाया जा सकता है। सरकार की यह पहल देशभर में मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

रामानुज सिंह
रामानुज सिंह author

रामानुज सिंह पत्रकारिता में दो दशकों का व्यापक और समृद्ध अनुभव रखते हैं। उन्होंने टीवी और डिजिटल—दोनों ही प्लेटफॉर्म्स पर काम करते हुए बिजनेस, पर्सनल ... और देखें

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