इलाहाबाद हाई कोर्ट (फाइल फोटो- PTI)
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में उत्तर प्रदेश की पूरी प्रशासनिक मशीनरी को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है कि राज्य में जो लोग ईसाई धर्म अपना चुके हैं, वे किसी भी हालत में अनुसूचित जाति के लाभ लेना जारी न रखें। अदालत ने साफ कहा कि धर्म परिवर्तन के बाद भी अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा बनाए रखना संविधान के साथ धोखा है। न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरी की एकल पीठ ने यह आदेश जस्टिस सीआरपीसी की धारा 482 के तहत दायर एक याचिका को खारिज करते हुए दिया। अदालत ने यूपी के सभी जिलाधिकारियों को चार महीने की समय सीमा में कानून के अनुसार कार्रवाई कर रिपोर्ट मुख्य सचिव को भेजने का निर्देश दिया है।
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याचिकाकर्ता जितेंद्र साहनी ने अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर, चार्जशीट और समन आदेश को रद्द करने की मांग की थी। उन पर आरोप है कि उन्होंने अपने क्षेत्र में लोगों को ईसाई धर्म अपनाने के लिए उकसाया, हिंदू देवी देवताओं का मजाक उड़ाया और साम्प्रदायिक वैमनस्य फैलाने वाली बातें कीं। एफआईआर में उन पर आईपीसी की धारा 153 ए और 295 ए के तहत केस दर्ज हुआ था। साहनी का तर्क था कि उन्होंने सिर्फ अपने खेत में यीशु के संदेश सुनाने की अनुमति मांगी थी और उन्हें झूठा फंसाया जा रहा है।
अदालत में राज्य की ओर से पेश अतिरिक्त सरकारी अधिवक्ता ने बताया कि पुलिस जांच में एक गवाह ने धारा 161 सीआरपीसी के तहत अपना बयान दिया जिसमें कहा गया कि साहनी मूल रूप से केवट समुदाय से आते हैं, पहले हिंदू थे, लेकिन अब ईसाई धर्म अपना चुके हैं और पादरी के रूप में काम करते हैं। गवाह के अनुसार साहनी लोगों को लालच देकर धर्म परिवर्तन के लिए प्रेरित करते थे और हिंदू देवी देवताओं का अपमानजनक भाषा में मजाक उड़ाते थे ताकि ग्रामीणों का मन बदल सके।
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में गवाह लक्ष्मण विश्वकर्मा के बयान के अहम हिस्सों को दर्ज किया। गवाह ने आरोप लगाया कि साहनी यह कहकर हिंदू आस्था का मजाक उड़ाते थे कि हिंदू धर्म में जाति व्यवस्था के कारण सम्मान नहीं मिलता, जबकि ईसाई धर्म अपनाने से नौकरी, व्यापार और आर्थिक मदद मिलने का दावा किया जाता था।
इस मामले में अदालत ने जोर देकर कहा कि संविधान अनुसूचित जाति आदेश 1950 का पैरा 3 बिल्कुल स्पष्ट है। उसके अनुसार कोई भी व्यक्ति जो हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को अपनाता है, वह एससी नहीं माना जा सकता। न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले सी. सेल्वारानी बनाम डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर 2024 का भी हवाला दिया। इस फैसले में शीर्ष अदालत ने साफ कहा था कि ईसाई धर्म अपनाने वाले व्यक्ति की मूल जाति की पहचान समाप्त हो जाती है और यदि वह आरक्षण के लाभ के लिए स्वयं को फिर से हिंदू बताता है तो यह संविधान के साथ धोखा है।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने आदेश में आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के वर्ष 2025 के फैसले अक्कला रामी रेड्डी बनाम स्टेट ऑफ एपी का भी उल्लेख किया। उस फैसले में कहा गया था कि ईसाई धर्म स्वीकार करने और सक्रिय रूप से उसी का पालन करने वाले व्यक्ति पर अनुसूचित जाति जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम लागू नहीं हो सकता, क्योंकि ईसाई धर्म में जाति व्यवस्था नहीं होती और इसलिए एससी वर्गीकरण का आधार ही खत्म हो जाता है।
न्यायमूर्ति गिरी ने सरकार और प्रशासन से कहा कि वह इस विषय को गंभीरता से लें और सुनिश्चित करें कि कहीं भी एससी लाभ का गलत इस्तेमाल न हो।
अदालत ने मुख्य रूप से अपने आदेश में
जैसे बड़े अधिकारियों को आदेश दिया कि वे कानून के अनुसार कदम उठाएं और यह सुनिश्चित करें कि अल्पसंख्यक दर्जे और एससी दर्जे के बीच किसी भी तरह की गड़बड़ी न हो। सबसे महत्वपूर्ण निर्देश यह था कि उत्तर प्रदेश के सभी जिलाधिकारियों को चार महीने के भीतर अपने जिलों में जांच कर कार्रवाई करनी होगी और अपनी रिपोर्ट मुख्य सचिव को भेजनी होगी।
अदालत ने देखा कि साहनी ने अपने हलफनामे में खुद को हिंदू बताया, जबकि पुलिस गवाह के मुताबिक वे ईसाई धर्म अपना चुके हैं और पादरी हैं।
इस पर कोर्ट ने इसे गंभीर विषय मानते हुए जिलाधिकारी महाराजगंज को आदेश दिया कि वे तीन महीने में जांच करें कि साहनी ने धर्म संबंधी तथ्य छिपाकर हलफनामा दिया या नहीं। यदि वे दोषी पाए जाएं, तो उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई हो ताकि भविष्य में कोई भी व्यक्ति अदालत में गलत धर्म या गलत पहचान दिखाकर हलफनामा न दे सके। अंत में अदालत ने साहनी की याचिका खारिज कर दी। हालांकि उन्हें यह छूट दी कि वे ट्रायल कोर्ट में डिस्चार्ज आवेदन देकर अपनी आपत्तियां उठा सकते हैं।
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