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क्या ईरान 'इस्लामिक NATO' में शामिल होगा? मक्का समझौता बदल देगा पश्चिम एशिया की तस्वीर, भारत के लिए क्या ऑप्शन?

Mecca Joint Defence Agreement: ईरान को सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के मक्का संयुक्त रक्षा समझौते में शामिल होने का न्योता। जानिए मिडिल ईस्ट की इस नई सुरक्षा व्यवस्था का भारत पर क्या असर पड़ेगा।

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क्या ईरान 'इस्लामिक NATO' में शामिल होगा? मक्का समझौता बदल देगा पश्चिम एशिया की तस्वीर, भारत के लिए क्या ऑप्शन?

Islamic NATO: सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच एक नए रणनीतिक गठबंधन के तौर पर देखे जा रहे डिफेंस अलायंस में एक बड़ा मोड़ आ सकता है। अल-मायादीन की एक रिपोर्ट में एक सीनियर ईरानी अधिकारी का हवाला देते हुए बताया गया कि ईरान को हाल ही में बने मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट में शामिल होने के लिए न्योता दिया गया है। हालांकि, इस न्योते की खबर की अभी तक ईरान के विदेश मंत्रालय, सऊदी अरब, तुर्की या पाकिस्तान ने आधिकारिक तौर पर पुष्टि नहीं की है।

अगर इस रिपोर्ट की पुष्टि हो जाती है और तेहरान इसे स्वीकार कर लेता है, तो यह एक अहम घटनाक्रम होगा। ईरान और सऊदी अरब ने मध्य-पूर्व के झगड़ों में बरसों तक एक-दूसरे के विरोधी पक्ष में समय बिताया है और हाल ही में उन्होंने राजनयिक संबंध फिर से बनाने शुरू किए हैं। अब, हो सकता है कि ये दोनों देश एक ही क्षेत्रीय सुरक्षा घेरे के तहत आ जाएं।...और भारत के लिए, इसके असर पश्चिमी एशिया की जियोपॉलिटिक्स से कहीं आगे तक जाएंगे।

मक्का समझौता क्या है?

मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट (संयुक्त रक्षा समझौता) पर 7 अगस्त को सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने हस्ताक्षर किए।

इसका मुख्य सिद्धांत यह है कि तीनों देशों में से किसी एक पर भी सशस्त्र हमला होने पर उसे तीनों पर हमला माना जाएगा। इस समझौते का मकसद सामूहिक सुरक्षा और सैन्य सहयोग को मजबूत करना है। इस प्रावधान की वजह से इसकी तुलना स्वाभाविक रूप से NATO के सामूहिक रक्षा सिद्धांत से की जा रही है।

लेकिन इसे 'इस्लामिक NATO' कहना अभी तकनीकी रूप से सही होने के बजाय सिर्फ सुर्खियां बटोरने जैसा है। इस समझौते में NATO जैसा इंटीग्रेटेड मिलिट्री कमांड, संस्थागत ढांचा या दशकों पुराना गठबंधन का सिस्टम नहीं है। इसके बजाय, जानकारों ने इसे मुस्लिम-बहुल तीन प्रभावशाली ताकतों की ओर से एक मजबूत क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचा बनाने और बाहरी ताकतों पर अपनी निर्भरता कम करने की कोशिश के तौर पर देखा है।

यह समझौता ऐसे समय में हुआ जब इलाके का माहौल बहुत अस्थिर था। इसमें ईरान, अमेरिका-इजरायल के बीच टकराव, ईरान और उसके क्षेत्रीय सहयोगियों से जुड़े हमले और ऊर्जा की सप्लाई में रुकावट जैसी चीजें शामिल हैं। खासकर सऊदी अरब ने पूरी तरह से वॉशिंगटन पर निर्भर रहने के बजाय अपनी सुरक्षा के विकल्पों को मजबूत करने के तरीके तलाशे हैं।

ईरान को क्यों बुलाया जाएगा?

जब यह समझौता हुआ, तो ईरान इस समूह के बाहर की सबसे अहम ताकतों में से एक था। ऐतिहासिक रूप से तेहरान सऊदी अरब को इलाके में अपना प्रतिद्वंद्वी मानता रहा है, जबकि रियाद को ईरान के मिसाइल प्रोग्राम, उसके क्षेत्रीय सहयोगियों और इराक, सीरिया, लेबनान और यमन तक फैले उसके प्रभाव को लेकर गहरी चिंता रही है।

लेकिन सऊदी-ईरान संबंधों में बदलाव आया है। सालों की दुश्मनी के बाद, 2023 में दोनों देशों ने राजनयिक संबंध बहाल किए, जिसमें चीन ने मध्यस्थ की अहम भूमिका निभाई। तब से, दोनों पक्षों की दिलचस्पी इस बात में रही है कि उनकी प्रतिद्वंद्विता सीधे क्षेत्रीय टकराव में न बदल जाए।

इसलिए, मक्का फ्रेमवर्क में ईरान का शामिल होना एक बड़ा बदलाव हो सकता है: मुख्य रूप से ईरान को रोकने के लिए सुरक्षा व्यवस्था बनाने के बजाय, सऊदी अरब और उसके सहयोगी ईरान को उस ढांचे में लाने की कोशिश कर सकते हैं।

इसके पीछे एक व्यावहारिक कारण भी है। पाकिस्तान इस क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण मध्यस्थ के रूप में उभरा है। पाकिस्तानी सेना प्रमुख आसिम मुनीर सोमवार को तेहरान का दौरा करने वाले हैं और उम्मीद है कि बातचीत में क्षेत्रीय शांति और सुरक्षा, नए पाकिस्तान-तुर्की-सऊदी समझौते और व्यापक ईरान संकट जैसे मुद्दे शामिल होंगे। लगातार तनाव के बीच पाकिस्तान ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थता कर रहा है।

तुर्की ने भी खुद को क्षेत्र की प्रतिद्वंद्विता में केवल एक और पक्षकार के बजाय एक सेतु के रूप में स्थापित किया है। राष्ट्रपति एर्दोगन ने हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से ईरान के साथ बातचीत करने का आग्रह किया और कहा कि तुर्की वाशिंगटन, तेहरान और पाकिस्तान तथा कतर सहित क्षेत्रीय मध्यस्थों के साथ काम करना जारी रखेगा।

ईरान को मिला यह कथित निमंत्रण ऐसे समय में आया है जब कूटनीति और क्षेत्रीय सुरक्षा के समीकरण तेजी से आपस में जुड़ रहे हैं।

तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन ने साफ तौर पर कहा है कि इस समझौते में दूसरे देश भी शामिल हो सकते हैं। यह बात इसलिए भी अहम है क्योंकि खबर है कि ईरान को भी इसमें शामिल होने का न्योता दिया गया है। उन्होंने पहले कहा था, 'इन तीन देशों के अलावा, दूसरे देश भी कभी भी हमारे साथ जुड़ सकते हैं। यह समझौता सिर्फ सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान तक ही सीमित नहीं है।'

अगर ईरान सच में इसमें शामिल हो जाए तो क्या होगा?

एक ऐसा समझौता जो मुख्य रूप से तीन सुन्नी ताकतों के साथ शुरू हुआ था, उसमें अचानक इस इलाके की सबसे अहम शिया ताकत भी शामिल हो जाएगी। इससे इस गठबंधन को सिर्फ एक 'सुन्नी मिलिट्री ब्लॉक' कहना मुश्किल हो जाएगा। यह 'मक्का समझौते' को एक ऐसे क्षेत्रीय तंत्र में भी बदल सकता है जिसके जरिए अलग-अलग हितों वाले देश किसी और बड़े युद्ध को रोकने की कोशिश कर सकें।

लेकिन एक बड़ा सवाल भी है। क्या होगा जब सदस्य इस बात पर सहमत न हों कि हमलावर कौन है?

सामूहिक सुरक्षा का नियम तब तक आसान लगता है जब तक दो सदस्यों के रणनीतिक हित आपस में न टकराएं। ईरान और सऊदी अरब के बीच राजनयिक रिश्ते सुधरने के बावजूद, अभी भी कई बड़े मतभेद हैं। यमन, खाड़ी क्षेत्र, इजरायल, प्रतिबंध और ईरान के क्षेत्रीय गठबंधन जैसे मुद्दे अभी भी पेचीदा बने हुए हैं।

इसलिए, ईरान के शामिल होने से यह समझौता राजनीतिक रूप से तो मजबूत हो सकता है, लेकिन साथ ही इसके सैन्य वादों को लागू करना कहीं ज्यादा मुश्किल हो सकता है।

समझौते में पाकिस्तान की मौजूदगी समीकरण को उलझाते वाली

समझौते में पाकिस्तान की मौजूदगी समीकरण को उलझाते वाली

इससे सऊदी अरब और ईरान को यह भी साबित करना होगा कि उनके रिश्ते सुधरना सिर्फ राजनयिक जोखिम कम करने की कोशिश है या फिर किसी गहरी चीज की शुरुआत।

अगर ईरान इस समझौते में शामिल होता है तो भारत के लिए इसका क्या मतलब होगा?

भारत ने सऊदी अरब और ईरान, दोनों के साथ रिश्ते बनाने में बरसों लगाए हैं, और साथ ही अमेरिका, इजरायल और पूरे खाड़ी क्षेत्र के साथ अपने रणनीतिक हितों को भी बनाए रखा है।

सऊदी अरब अब भारत के लिए एक अहम रणनीतिक साझेदार है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अप्रैल 2025 की यात्रा के दौरान, दोनों देशों ने 'भारत-सऊदी रणनीतिक साझेदारी परिषद' का विस्तार किया और राजनीतिक व सुरक्षा सहयोग, रक्षा, अर्थव्यवस्था, ऊर्जा, निवेश और तकनीक जैसे क्षेत्रों में मंत्री-स्तरीय तंत्र बनाए।

वहीं दूसरी ओर, ईरान भारत की कनेक्टिविटी रणनीति के लिए भी अहम बना हुआ है। इसका सबसे साफ उदाहरण चाबहार है।

भारत ने मई 2024 में ईरान के चाबहार बंदरगाह पर शहीद-बेहिश्ती टर्मिनल के विकास और संचालन के लिए 10 साल के समझौते पर हस्ताक्षर किए। यह प्रोजेक्ट रणनीतिक रूप से बहुत अहम है क्योंकि इससे भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंचने का एक ऐसा रास्ता मिलता है जो पाकिस्तान पर निर्भर नहीं है। इसी वजह से भारत के लिए एक स्थिर ईरान का होना बहुत जरूरी है। अगर तेहरान 'मक्का पैक्ट' में शामिल होता है और इससे ईरान और सऊदी अरब के बीच तनाव कम होता है, तो भारत को पश्चिम एशिया के ज्यादा स्थिर माहौल से फायदा हो सकता है।

भारतीय कारोबारों, शिपिंग रूट और एनर्जी मार्केट के लिए, खाड़ी क्षेत्र में कम सैन्य टकराव अच्छी खबर होगी।

एक और अहम बात है – इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर। ईरान के जरिए भारत की कनेक्टिविटी की बड़ी योजनाएँ उन रूट से जुड़ी हैं जो हिंद महासागर को मध्य एशिया, रूस और यूरोप से जोड़ते हैं। चाबहार इस रणनीति का एक अहम हिस्सा है। ईरान के क्षेत्रीय रिश्तों में सुधार से ऐसे कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स को आगे बढ़ाना आसान हो सकता है, हालांकि प्रतिबंध और इंफ्रास्ट्रक्चर की दिक्कतें बड़ी रुकावटें बनी रहेंगी।

लेकिन भारत के लिए एक मुश्किल भी है – पाकिस्तान। इस समझौते में पाकिस्तान की मौजूदगी समीकरण को और उलझा देती है।

भारत और पाकिस्तान रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी हैं, और सऊदी अरब, तुर्की और शायद ईरान वाले क्षेत्रीय सुरक्षा गुट में इस्लामाबाद की औपचारिक भूमिका से पश्चिम एशिया में पाकिस्तान का कूटनीतिक प्रभाव बढ़ सकता है। तुर्की की मौजूदगी भी अहम है क्योंकि पाकिस्तान के साथ उसके रक्षा और राजनीतिक संबंध तेजी से मजबूत हो रहे हैं।

लेकिन भारत के पास एक बड़ा फायदा है: उसे किसी एक पक्ष को चुनने की जरूरत नहीं है। रियाद और तेहरान के साथ भारत के संबंध अलग-अलग रणनीतिक मकसद पूरे करते हैं। सऊदी अरब एनर्जी, निवेश, खाड़ी की अर्थव्यवस्था और वहां रहने वाले लाखों भारतीयों की भलाई के लिए बहुत अहम है। ईरान कनेक्टिविटी, मध्य एशिया और चाबहार के लिए अहम है।

इससे भारत को किसी क्षेत्रीय गुट का हिस्सा बने बिना तनाव कम होने का स्वागत करने का प्रोत्साहन मिलता है।

क्या पश्चिम एशिया एक नई सुरक्षा व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है?

'मक्का पैक्ट' को पहले ही क्षेत्रीय ताकतों की अपनी सुरक्षा की ज्यादा जिम्मेदारी लेने की बड़ी कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। सऊदी अरब मजबूत प्रतिरोध क्षमता चाहता है। तुर्की बड़ी क्षेत्रीय भूमिका चाहता है। पाकिस्तान अपने सैन्य और कूटनीतिक प्रभाव का फायदा उठाना चाहता है।

अगर ईरान भी इसमें शामिल होता है, तो समीकरण पूरी तरह बदल जाएगा। यह समझौते को तीन देशों की रक्षा व्यवस्था से बदलकर एक बहुत बड़े क्षेत्रीय सुरक्षा तंत्र का केंद्र बना सकता है। लेकिन इसे अभी बड़ी कामयाबी कहना जल्दबाजी होगी।

फिलहाल, ईरान को न्योता मिलने की बात सिर्फ एक रिपोर्ट है, न कि सदस्यता का पक्का फैसला। और अगर तेहरान इसे मान भी लेता है, तो ऐतिहासिक प्रतिद्वंद्वियों को भरोसेमंद सुरक्षा साझेदार बनाना, एक ही दस्तावेज पर दस्तखत करने से कहीं ज्यादा मुश्किल होगा।

Nitin Arora
नितिन अरोड़ाauthor

नितिन अरोड़ा टाइम्स नाउ नवभारत में न्यूज डेस्क पर सीनियर कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। मीडिया में उनका 6 वर्षों का अनुभव है। वह राजनीति, देश–विदेश की बड़ी घटनाओं और समसामयिक मुद्दों को गहराई से समझकर उन्हें सटीक और सरल भाषा में प्रस्तुत करने में माहिर हैं। उन्होंने अपने करियर में लगातार करंट अफेयर्स, पॉलिटिकल डेवलपमेंट्स, डिप्लोमैटिक घटनाएं और डिफेंस सेक्टर से जुड़े विषयों पर प्रभावशाली कॉन्टेंट तैयार किया है और अबतक 6 हजार से अधिक आर्टिकल लिख चुके हैं। विभिन्न टॉपिक्स पर एक्सप्लेनेर, डेटा-आधारित रिपोर्ट्स और विश्लेषणात्मक कॉपी लिखने में उनकी मजबूत पकड़ है।

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