अध्यात्म

वट सावित्री व्रत 2027 में कब है, ज्येष्ठ अमावस्या 2027 की डेट, वट सावित्री पूजा 2027 की तारीख क्या है

Vat Savitri Vrat 2027 Kab Hai: साल 2027 में वट सावित्री व्रत कब होगा। जानें जेठ अमावस्या 2027 डेट। वट सावित्री पूजा 2027 में किस तारीख को पड़ेगी।क्या है इस व्रत का धार्मिक महत्व।

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वट सावित्री पूजा 2027 में किस तारीख को है

Vat Savitri Vrat 2027 Kab Hai: वर्ष 2027 में वट सावित्री व्रत शुक्रवार, 4 जून को रखा जाएगा। यह व्रत ज्येष्ठ माह (jeth amavasya) की अमावस्या तिथि पर सुहागिन महिलाओं द्वारा पति की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए किया जाता है। हिंदू धर्म में इस व्रत का विशेष महत्व माना गया है। इस दिन महिलाएं वट वृक्ष यानी बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं और सावित्री-सत्यवान की कथा सुनती हैं।

2027 में कब है वट सावित्री व्रत

साल 2027 में वट सावित्री व्रत 4 जून, शुक्रवार को पड़ेगा। यह व्रत ज्येष्ठ अमावस्या के दिन रखा जाता है। इस तरह ज्येष्ठ अमावस भी 2027 में 4 जून को पड़ेगी। उत्तर भारत में इस दिन महिलाएं पूरे श्रद्धा भाव से उपवास रखती हैं और वट वृक्ष की पूजा कर अपने पति के सुखद और दीर्घ जीवन की प्रार्थना करती हैं।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अमावस्या तिथि पर किया गया यह व्रत विशेष फलदायी माना जाता है। इस दिन सुबह स्नान के बाद महिलाएं नए वस्त्र पहनकर पूजा की तैयारी करती हैं और बरगद के पेड़ के नीचे पूजा-अर्चना करती हैं।

वट वृक्ष की पूजा क्यों होती है

वट सावित्री व्रत में बरगद के पेड़ का खास महत्व बताया गया है। मान्यता है कि वट वृक्ष में त्रिदेवों का वास होता है। इसकी जड़ में ब्रह्मा, तने में विष्णु और शाखाओं में भगवान शिव का निवास माना जाता है। यही वजह है कि इस वृक्ष को दीर्घायु और स्थिरता का प्रतीक कहा जाता है।

बरगद का पेड़ लंबे समय तक जीवित रहता है, इसलिए इसे अखंड सौभाग्य और मजबूत वैवाहिक जीवन से जोड़कर देखा जाता है। महिलाएं पेड़ के चारों ओर कच्चा सूत या धागा बांधकर परिक्रमा करती हैं और अपने परिवार की खुशहाली की कामना करती हैं।

सावित्री और सत्यवान की कथा से जुड़ा है व्रत

वट सावित्री व्रत की सबसे प्रसिद्ध कथा सावित्री और सत्यवान से जुड़ी हुई है। पौराणिक कथा के अनुसार, सावित्री ने अपने तप, बुद्धिमानी और अटूट प्रेम से यमराज से अपने पति सत्यवान का जीवन वापस प्राप्त कर लिया था।

कहा जाता है कि सत्यवान की मृत्यु वट वृक्ष के नीचे हुई थी। जब यमराज उनके प्राण लेकर जा रहे थे, तब सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चल पड़ीं। सावित्री की निष्ठा और समर्पण से प्रसन्न होकर यमराज ने सत्यवान को पुनर्जीवन दे दिया। तभी से यह व्रत पति की लंबी आयु और अखंड सौभाग्य के प्रतीक के रूप में मनाया जाने लगा।

कैसे की जाती है वट सावित्री व्रत की पूजा

इस दिन महिलाएं सुबह जल्दी उठकर स्नान करती हैं और व्रत का संकल्प लेती हैं। पूजा की थाली में रोली, अक्षत, फूल, फल, धूप, दीप, मिठाई और कच्चा सूत रखा जाता है। इसके बाद वट वृक्ष की पूजा की जाती है।

महिलाएं पेड़ के चारों ओर धागा लपेटते हुए परिक्रमा करती हैं और सावित्री-सत्यवान की कथा सुनती हैं। कई जगहों पर महिलाएं समूह में पूजा करती हैं, जिससे त्योहार का माहौल और भी खास बन जाता है।

वट सावित्री व्रत का धार्मिक महत्व

हिंदू धर्म में वट सावित्री व्रत को बेहद शुभ माना गया है। मान्यता है कि इस व्रत को श्रद्धा और नियमपूर्वक करने से वैवाहिक जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। साथ ही परिवार में समृद्धि और सकारात्मकता का वास होता है।

यह व्रत सिर्फ धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि पति-पत्नी के विश्वास, समर्पण और प्रेम का प्रतीक भी माना जाता है। यही वजह है कि हर साल लाखों महिलाएं पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ यह व्रत रखती हैं।

Medha Chawla
मेधा चावला author

मेधा चावला टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में सीनियर एसोसिएट एडिटर हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन की लीड हैं। लाइफस्टाइल पत्रकारिता में 20 वर्षों का अनुभव रखने वा... और देखें

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