Monsoon Health Care : मौसम बदलते ही वायरल फीवर की समस्या परेशान करने लगती है। बुखार के साथ शरीर में दर्द, थकान, भूख कम लगना, गले में खराश और कमजोरी जैसी दिक्कतें हो सकती हैं। ऐसे समय में हर बार दवाओं का सहारा लेने के बजाय खान-पान और घरेलू देखभाल पर भी ध्यान देना जरूरी होता है। आयुर्वेद में बुखार को ज्वर कहा गया है और इसके लिए अलग-अलग कारणों, दोषों और अवस्था के अनुसार चिकित्सा बताई गई है। चरक संहिता के चिकित्सास्थान, ज्वरचिकित्सित अध्याय में ज्वर की शुरुआती अवस्था में भोजन और दिनचर्या को हल्का रखने, पाचन को ठीक करने और उचित मात्रा में तरल लेने पर जोर दिया गया है। भावप्रकाश संहिता के ज्वराधिकार में भी ज्वर की शुरुआत में लंघन और आगे की अवस्था में पाचन संबंधी उपायों का उल्लेख मिलता है। आइए जानते हैं कि आयुर्वेद के अनुसार किन उपायों को अपनाकर वायरल फीवर से राहत पाई जा सकती है।
वायरल फीवर के दौरान भूख कम लगने और पाचन बिगड़ने की समस्या हो सकती है। ऐसे में सोंठ यानी सूखी अदरक का हल्का इस्तेमाल किया जाता है। आयुर्वेद में सोंठ को पाचन और वात-कफ से जुड़े विकारों के लिए उपयोगी माना गया है। चरक संहिता में ज्वर की अवस्था में नागर यानी सोंठ का उल्लेख कई ज्वर संबंधी दवाइयों में मिलता है। ज्वर में इस्तेमाल होने वाली यवागू और पेय में भी नागर यानी सोंठ का प्रयोग बताया गया है। वायरल फीवर में घर पर सोंठ का बहुत हल्का इस्तेमाल गुनगुने पानी के साथ किया जा सकता है। सोंठ की मात्रा अधिक रखने की जरूरत नहीं है। जिन लोगों को एसिडिटी, सीने में जलन या मुंह में ज्यादा गर्मी महसूस होती है, उन्हें इसका इस्तेमाल सावधानी से करना चाहिए।
ताजा अदरक और सूखी अदरक दोनों का आयुर्वेद में इस्तेमाल भरपूर किया जाता है। बुखार के दौरान जब गला भारी हो या भूख कम लग रही हो तो अदरक की बहुत हल्की चाय ली जा सकती है। इसमें बहुत ज्यादा मसाले डालने की जरूरत नहीं है। अदरक का हल्का पानी या चाय शरीर को गर्माहट देने के साथ गले को भी आराम पहुंचाती है।
बुखार में अक्सर भूख कम हो जाती है। इस समय तला-भुना और भारी भोजन करने से पाचन पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। चरक संहिता में ज्वर की शुरुआती अवस्था के बाद यवागू यानी पतली खिचड़ी या पतला आहार देने का वर्णन मिलता है। इसे हल्का और आसानी से पचने वाला माना गया है। ऐसे में घर पर मूंग दाल और चावल की पतली खिचड़ी बनाई जा सकती है। इसमें ज्यादा तेल, घी, लाल मिर्च और गरम मसाले डालने से बचें।
बुखार में जब व्यक्ति को ठोस भोजन खाने का मन न हो तो चावल का पतला मांड लिया जा सकता है। चरक संहिता में ज्वर के दौरान अलग-अलग प्रकार की पेया और यवागू का उल्लेख मिलता है। इसके अनुसारऐसे पतले आहार पचने में हल्के होते हैं और शरीर को पोषण देने में मदद करते हैं। घर पर चावल को ज्यादा पानी में पकाकर उसका पतला मांड लिया जा सकता है। इसमें बहुत ज्यादा नमक या मसाले डालने की जरूरत नहीं है।
तुलसी और अदरक भारतीय घरों में लंबे समय से इस्तेमाल होते रहे हैं। वायरल फीवर के दौरान गले में खराश, नाक बंद होने या हल्की खांसी जैसी परेशानी में तुलसी-अदरक की हल्की चाय ली जा सकती है। इसमें 4-5 तुलसी की पत्तियां और अदरक का छोटा टुकड़ा पानी में उबालकर हल्का पेय बनाया जा सकता है। बहुत ज्यादा काढ़ा बनाकर बार-बार पीना जरूरी नहीं है। अगर गले में जलन या एसिडिटी बढ़ती है तो इसे बंद कर देना चाहिए।
यहां दी गई जानकारी सामान्य आयुर्वेदिक ग्रंथों पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है। Times Now Navbharat इसकी पुष्टि नहीं करता है। किसी भी जानकारी को उपयोग में लेने से पहले किसी योग्य चिकित्सक से परामर्श ले लें।