Parenting Advice: हम में से बहुत से पेरेंट्स में एक आम आदत है। शाम को जैसे ही बच्चे स्कूल से घर लौटते हैं, हमारा पहला सवाल होता है - आज स्कूल में कैसा रहा तुम्हारा दिन? ज्यादातर बच्चों का जवाब भी लगभग एक जैसा होता है - अच्छा था या कुछ खास नहीं।
ऐसा नहीं है कि बच्चे बात नहीं करना चाहते। कई बार समस्या सवाल में होती है। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि बहुत सामान्य या बंद जवाब वाले सवाल बच्चों को खुलकर बोलने के लिए प्रेरित नहीं करते। अगर आप चाहते हैं कि बच्चा अपने अनुभव, भावनाएं और परेशानियां आपसे साझा करे, तो बातचीत का तरीका बदलना होगा।
आज सबसे मजेदार क्या हुआ?
यह सवाल बच्चे को किसी खास घटना के बारे में सोचने पर मजबूर करता है। वह सिर्फ अच्छा या ठीक था कहकर बात खत्म नहीं कर सकता। इससे बातचीत आगे बढ़ती है और माता-पिता को बच्चे की दुनिया को समझने का मौका मिलता है।
अपनी आदत बदलें
बच्चे वही करते हैं, जो वे अपने माता-पिता को करते हुए देखते हैं। इसलिए सीधे सवाल पूछने के बजाय पहले अपने दिन का कोई छोटा सा किस्सा शेयर करें। जब बच्चा देखता है कि सामने वाला भी खुलकर बात कर रहा है, तो वह भी अपने अनुभव बताने में सहज महसूस करता है।
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सवाल कम, जिज्ञासा ज्यादा दिखाएं
बच्चे को ऐसा महसूस नहीं होना चाहिए कि उससे पूछताछ हो रही है। अगर वह किसी दोस्त, खेल या शिक्षक का जिक्र करे, तो उसी विषय पर हल्के-फुल्के सवाल पूछें। इससे बातचीत स्वाभाविक बनी रहती है और बच्चा दबाव महसूस नहीं करता।
सही समय का इंतजार करें
कई बार बच्चे स्कूल से लौटते ही बात करने के मूड में नहीं होता। कई बच्चों को पहले आराम, खाना या थोड़ा अकेले समय चाहिए होता है। ऐसे में बातचीत का सही समय चुनना भी उतना ही जरूरी है। कई बार रात के खाने के दौरान या सोने से पहले बच्चे ज्यादा खुलकर बात करते हैं।
सलाह देने की जल्दी न करें
अगर बच्चा अपनी कोई परेशानी साझा करता है, तो तुरंत समाधान देने या डांटने की बजाय पहले उसकी बात पूरी सुनें। कई बार बच्चों को सलाह नहीं, सिर्फ एक ऐसा व्यक्ति चाहिए होता है जो उन्हें बिना टोके सुने। जब उन्हें यह भरोसा मिलता है, तो वे भविष्य में भी अपनी बातें साझा करने लगते हैं।
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बच्चों से बात करना क्यों है जरूरी
पेरेंटिंग सिर्फ बच्चों की पढ़ाई या अनुशासन तक सीमित नहीं है। यह भरोसे का रिश्ता बनाने की प्रक्रिया भी है। अगर बच्चा यह महसूस करे कि घर में उसकी बात ध्यान से सुनी जाती है और उसे जज नहीं किया जाएगा, तो वह अपनी छोटी-बड़ी हर बात माता-पिता से साझा करेगा।
बच्चों को बोलने के लिए मजबूर करने से बेहतर है कि ऐसा माहौल बनाया जाए, जहां वे खुद बात करने का मन करें। कई बार एक सही सवाल, लंबे भाषण से ज्यादा असरदार साबित होता है।
