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ओपिनियन: लड़की गाली दे तो असहज क्यों हो जाता है समाज, क्या भाषा से तय होगी 'अच्छी लड़की' की परिभाषा

कहीं से भी गाली देने को सही नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन महिलाओं से ही हमेशा शालीन भाषा की अपेक्षा आखिर क्यों की जाती है? क्या सिर्फ इसलिए कि यह एक अच्छा गुण है?

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क्यों लड़कियों के कंधे ही उठाए नैतिकता और शालीनता का सारा बोझ (AI Generated Image)
Authored by: Suneet Singh
Updated Jul 30, 2026, 15:20 IST
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"मैंने अपनी पूरी लाइफ में इतना अजीब और इतना बुरा कुछ नहीं देखा है। इन्हें किसने पैदा किया है, कौन इन्हें पाल रहा है? ये जेनरेशन गटर है। ये लड़कियां वेस्टर्न कल्चर के प्रभाव में हैं। ये पढ़ाई में अच्छी नहीं हैं। इनमें अच्छे संस्कार नहीं हैं। ये अच्छी हाउस वाइफ भी नहीं बन सकतीं। आजादी के नाम पर ड्रग्स और शराब का सोशल मीडिया पर प्रदर्शन करती हैं। ये बिना मेहनत किए काम करने वाली लड़कियों की नकल करती हैं और इसलिए अब ये परिवार और जिम्मेदारियां संभालने के लायक भी नहीं रह गई हैं।"

ये कहना है बॉलीवुड एक्ट्रेस और बीजेपी सांसद कंगना रनौत का। वही कंगना रनौत जिन्होंने 'क्वीन' फिल्म में समाज की सोच पर अपनी आजादी को तरजीह देने वाली लड़की का किरदार निभा नेशनल अवार्ड जीता था। बॉलीवुड की उसी 'क्वीन' ने ये बातें उन लड़कियों के बारे में कही हैं जो हाल ही में जंतर मंतर पर प्रोटेस्ट में शामिल हुई थीं।

क्वीन कंगना की इन बातों से कुछ सहमत हैं, तो कुछ को लगता है उन्हें ऐसा नहीं कहना चाहिए। कंगना के अपने तर्क होंगे। उनसे इत्तेफाक ना रखने वालों के अपने तर्क होंगे। इन सबके बीच एक अहम सवाल फिर चर्चा में है- आखिर लड़कियां गाली दें तो समाज असहज क्यों हो जाता है?

समस्या गाली है या गाली देने वाली महिला?

ऐसा क्यों होता है कि अगर कोई लड़का गाली दे तो उसे आसानी से नजरंदाज कर दिया जाता है और वही गाली अगर कोई लड़की दे दे, तो पहाड़ टूट पड़ता है। कैसी लड़की है? घर से क्या संस्कार मिले हैं? लड़की होकर ऐसी भाषा का इस्तेमाल करती है? ऐसे सवालों से शुरू हुई बहस उनके चरित्र हनन के साथ ही खत्म होते हैं।

यहीं से एक बड़ा सवाल पैदा होता है। क्या समाज को गाली से दिक्कत है? या फिर गाली देने वाली लड़की से? एक बात तो साफ होनी चाहिए। अगर कोई व्यवहार गलत है, तो वह सभी के लिए गलत होना चाहिए। अगर कोई व्यवहार स्वीकार्य है, तो उसके नियम भी सभी पर समान होने चाहिए।

इतिहास उठाकर देखिए। महिलाओं के कपड़ों पर नियम बने, हंसने पर नियम बने, चलने-फिरने पर नियम बने, खाने-पीने पर नियम बने..और तो और भाषा पर भी नियम बने। समाज हमेशा से यह तय करने की कोशिश करता रहा है कि किसी लड़की की भाषा कैसी हो। उसकी भाषा को उसके चरित्र तक से जोड़ दिया गया। इस तथाकथित सभ्य समाज में अच्छी लड़की वही है जो धीरे बोलेगी। प्रतिरोध नहीं करेगी। बहस नहीं करेगी और गाली तो बिल्कुल नहीं देगी।

दिलचस्प बात यह है कि अच्छा लड़का बनने के क्राइटेरिया में उसकी भाषा को लेकर इतनी सख्ती नहीं दिखाई देती है। ये हमारे समाज का दोगलापन नहीं है तो और क्या है? समाज ने हमेशा यही बताने की कोशिश की है कि स्त्रियां पैदा नहीं होतीं, समाज उसे बनाता है। ये समाज ही तय करता है कि किसी लड़की को कैसा दिखना चाहिए, कैसे बोलना चाहिए और कैसा व्यवहार करना चाहिए।

कैसा 'सभ्य' है समाज?

हमारा 'सभ्य' समाज लड़कियों से हमेशा कुछ तय मानकों पर खरा उतरने की उम्मीद करता रहा है। अगर कोई लड़की उन मानकों को तोड़े तो वही समाज और उसके लोग असहज हो जाते हैं। लड़कियों का गाली देना या अभद्र भाषा का इस्तेमाल करना भी उन्हीं तय मानकों को टूटना है।

सार्वजनिक जीवन में कहीं से भी गाली देने को सही नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन महिलाओं से ही हमेशा शालीन भाषा की अपेक्षा आखिर क्यों की जाती है? क्या सिर्फ इसलिए कि यह एक अच्छा गुण है? या सिर्फ इसलिए कि सदियों से महिलाओं को समाज का नैतिक प्रतिनिधि मान लिया गया है?

आप अपने आसपास का समाज देख लें। हर परिवार की इज्जत बेटी से जुड़ी मिलेगी। परिवार की प्रतिष्ठा उसी के हाथों में होगी। वही पिता के पगड़ी की लाज रखेगी। घर की हर परंपरा बेटी निभाएगी। घर का सम्मान बेटी बचाएगी। गौर से देखिए तो पाएंगे कि नैतिकता का भार उसी के कंधे पर नजर आएगा। ऐसा नहीं है कि घर के बेटों पर नैतिकता को बोझ नहीं होता, लेकिन परिवार की इज्जत तो लड़की के ही हिस्से आती रही है।

यही कारण है कि जब कोई महिला उन सीमाओं को पार करती है, जिन्हें समाज ने उसके लिए बनाया है, तो बहुत से लोगों को ये बर्दाश्त नहीं होता। इन लोगों की दिक्कत लड़कियों का गाली देने भर से नहीं है। ये उनके खुलकर हंसने पर, उनके कपड़ों पर, देर रात बाहर रहने पर, प्रेम संबंधों पर, पार्टियों पर..यहां तक कि उनके गुस्से पर भी असहज हो जाते हैं। उनकी नजर में पुरुष का गुस्सा मर्दानगी और महिला का गुस्सा बदतमीजी बन जाता है।

क्या बराबरी का मतलब गाली देना है?

यहां बतौर सभ्य समाज हमें ये भी पूछना चाहिए कि क्या बराबरी का मतलब यह है कि महिलाएं भी पुरुषों की तरह गाली दें? अगर ईमानदारी से जवाब दें तो कहेंगे कि नहीं..कतई नहीं। बराबरी का मतलब यह कभी नहीं है कि जो पुरुष करे वही महिला भी करे। यहां बस मुद्दा ये है कि नियम सभी के लिए एक समान हो। अगर गाली गलत है, तो वह सबके लिए गलत हो।

अगर समाज में भाषा संयमित होनी चाहिए, तो यह अपेक्षा महिलाओं से पहले पुरुषों से भी की जानी चाहिए। समस्या यह नहीं कि समाज महिलाओं से बेहतर भाषा की उम्मीद करता है। समस्या यह है कि वह पुरुषों से वही उम्मीद बहुत कम करता है।

कई बार तर्क दिया जाता है कि महिलाएं हमेशा से संवेदनशील रही हैं, इसलिए उनसे अधिक शालीनता अपेक्षित है। यह तर्क अपने आप में बहुत कुछ कह देता है। दरअसल जैसे ही किसी एक के ऊपर नैतिकता को बोझ थोप दिया जाता है, बाकी लोग अपने ऊपर से नैतिक जिम्मेदारी का हिस्सा उतार देते हैं।

कंगना ने जिस जेन जी को 'जनेरेशन गटर' कहा, वो पीढ़ी इसी असमानता पर सवाल उठा रही है। वह गाली देने की आजादी नहीं मांग रही है। वह समान पैमानों की बात करती है। अगर समाज भाषा को लेकर गंभीर है, तो उसे अपने बेटों और बेटियों दोनों से एक जैसी अपेक्षाएं रखनी होंगी। अगर वह शालीनता की बात करता है, तो उसे यह भी देखना होगा कि उसकी अपनी भाषा में कितनी स्त्री-विरोधी गालियां मौजूद हैं।

जब हम सभ्य समाज की बात करते हैं तो हमें ये भी नहीं भूलना चाहिए कि किसी सभ्य समाज की पहचान यह नहीं होती कि महिलाएं कितनी शांत हैं। समाज तब सभ्य कहलाता है जब वो सोच पाए कि उसके नैतिक नियम कितने निष्पक्ष हैं। लड़कियां गाली दें या न दें, इससे अहम सवाल यह है कि क्या हम आज भी महिलाओं को इंसान से पहले नैतिकता का प्रतीक मानते हैं? और अगर जवाब 'हां' है, तो शायद हमें उस 'जेनरेशन गटर' की भाषा से पहले अपनी सोच की समीक्षा करने की जरूरत है।

(नोट: यह लेखक के निजी विचार हैं। )

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