लाइफस्टाइल

हार के बाद भी सिर ऊंचा रखना कोई दादा से सीखे, आखिर क्या है सौरव गांगुली का सबसे बड़ा लाइफ लेसन

हार के बाद दोबारा खड़े होना क्या होता है, यह सौरव गांगुली की जिंदगी से बेहतर शायद ही कोई सिखा पाए। उनके जन्मदिन पर जानिए दादा के लाइफ लेसन, जो क्रिकेट ही नहीं, रोजमर्रा की जिंदगी में भी काम आएंगे।

Image

सौरव गांगुली से सीखें जिंदगी के ये बड़े सबक

Sourav Ganguly Birthday: जिंदगी में हार किसे नहीं मिलती! कभी इंटरव्यू छूट जाता है, कभी प्रमोशन किसी और को मिल जाता है। कई बार पूरी मेहनत के बाद भी वही नहीं होता, जिसकी उम्मीद होती है। ऐसे वक्त में सबसे पहले जो चीज टूटती है, वह है इंसान का आत्मविश्वास। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो हार को अपनी पहचान नहीं बनने देते। सौरव गांगुली उन्हीं लोगों में से एक हैं।

आज उनका जन्मदिन है। ऐसे में उनकी सेंचुरी, कप्तानी या लॉर्ड्स की बालकनी वाला जश्न याद करना आसान है। लेकिन अगर उनकी पूरी क्रिकेट यात्रा से सिर्फ एक बात अपने साथ लेकर चलनी हो, तो शायद वह यही होगी- मुश्किल वक्त में भी खुद पर भरोसा मत छोड़िए।

जब सबको लगा कि कहानी खत्म हो गई...

एक समय ऐसा भी आया, जब सौरव गांगुली भारतीय टीम से बाहर हो गए। क्रिकेट की दुनिया में तरह-तरह की बातें होने लगीं। किसी ने कहा कि अब उनकी वापसी मुश्किल है, तो किसी ने मान लिया कि उनका दौर खत्म हो चुका है।

सोचिए, जिस खिलाड़ी ने टीम इंडिया की तस्वीर बदल दी हो, उसे भी एक दिन खुद को फिर से साबित करने की जरूरत पड़ जाए। यह किसी के लिए भी आसान नहीं होता। लेकिन गांगुली ने एक रास्ता चुना। उन्होंने न रोज सफाई दी, न हर आलोचना का जवाब देने बैठे। उन्होंने वही किया, जो उनके हाथ में था- अपने खेल पर काम।

टाइम्स नाउ नवभारत पर ये भी पढ़ें: धोनी का 'कूल माइंड' सीक्रेट क्या है

हर लड़ाई आवाज उठाकर नहीं जीती जाती

आज सोशल मीडिया का दौर है। कोई कुछ कह दे, तो तुरंत जवाब देने का मन करता है। लेकिन कई बार चुप रहकर मेहनत करना सबसे बड़ा जवाब होता है।

सौरव गांगुली की वापसी इसी बात का उदाहरण है। उन्होंने यह साबित किया कि अगर आपके अंदर काबिलियत है, तो एक बुरा दौर आपकी पूरी पहचान तय नहीं कर सकता।

शायद इसलिए उनकी कहानी सिर्फ क्रिकेट प्रेमियों को नहीं, बल्कि हर उस इंसान को प्रेरित करती है, जो कभी न कभी खुद को कमतर महसूस कर चुका है।

टाइम्स नाउ नवभारत पर ये भी पढ़ें: गीता का यह एक श्लोक मन हल्का कर देगा

आत्मविश्वास का मतलब शोर मचाना नहीं होता

गांगुली मैदान पर हमेशा आत्मविश्वासी दिखते थे। उनकी बॉडी लैंग्वेज अलग थी। सामने दुनिया की सबसे मजबूत टीम हो या हजारों दर्शकों से भरा स्टेडियम, उनके चेहरे पर घबराहट कम ही दिखती थी। लेकिन इस आत्मविश्वास के पीछे सिर्फ अंदाज नहीं था, बल्कि तैयारी थी। मेहनत थी। खुद पर भरोसा था।

यही फर्क आत्मविश्वास और अहंकार के बीच की सबसे पतली रेखा भी है। जो व्यक्ति हर दिन खुद को बेहतर बनाने में लगा रहता है, उसे अपनी काबिलियत साबित करने के लिए ज्यादा बोलने की जरूरत नहीं पड़ती।

ऑफिस से लेकर जिंदगी तक काम आएगी 'दादा' की ये बात

हम सभी की जिंदगी में कभी न कभी ऐसा दौर आता है, जब लगता है कि लोग हमें कम आंक रहे हैं। ऑफिस में मेहनत दिख नहीं रही, बिजनेस में चीजें उम्मीद के मुताबिक नहीं चल रहीं या फिर निजी जिंदगी में लगातार मुश्किलें सामने खड़ी हैं।

ऐसे समय में गांगुली की कहानी याद आती है। उन्होंने यह नहीं सोचा कि लोग क्या कह रहे हैं। उन्होंने सिर्फ यह सोचा कि अगला कदम क्या होना चाहिए। शायद यही वजह है कि आज भी लोग उन्हें सिर्फ एक बेहतरीन कप्तान नहीं, बल्कि मजबूत इरादों वाले इंसान के रूप में भी याद करते हैं।

सबसे बड़ी जीत ट्रॉफी नहीं, वापसी होती है

ट्रॉफियां अलमारी में सज जाती हैं, रिकॉर्ड किताबों में दर्ज हो जाते हैं, लेकिन किसी इंसान की असली पहचान इस बात से बनती है कि वह मुश्किल वक्त में कैसा रहा।

सौरव गांगुली की जिंदगी यही सिखाती है कि हार हमेशा आखिरी पन्ना नहीं होती। कई बार वही नया अध्याय शुरू करती है। इसलिए अगर जिंदगी कभी आपके सामने मुश्किल सवाल खड़े करे, तो घबराइए मत। हो सकता है, आपकी सबसे अच्छी कहानी अभी लिखी जानी बाकी हो।

Medha Chawla
मेधा चावला author

मेधा चावला टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में सीनियर एसोसिएट एडिटर हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन की लीड हैं। लाइफस्टाइल पत्रकारिता में 20 वर्षों का अनुभव रखने वा... और देखें

End of Article