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पुरानी किताबों की खुशबू इतनी अच्छी क्यों लगती है? पीछे छिपा है बेहद दिलचस्प विज्ञान

कागज लकड़ी से बनता है। इसमें सेल्यूलोज और लिग्निन जैसे प्राकृतिक तत्व होते हैं। समय बीतने के साथ कागज में एक रासायनिक प्रक्रिया शुरू होती है, जिसे एसिड हाइड्रोलिसिस कहा जाता है।

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पुरानी किताबों की खुशबू इतनी अच्छी क्यों लगती है? (Photo: iStock)

पुरानी किताब खोलते ही जो हल्की सी मीठी खुशबू आती है, वह सिर्फ यादों का असर नहीं है। कई लोगों को यह महक बचपन की लाइब्रेरी, सेकेंड हैंड बुकस्टोर या पुराने घरों की याद दिलाती है। हालांकि विज्ञान कहता है कि यह खुशबू असल में किताब के धीरे-धीरे बूढ़ा होने का संकेत है।

किताब की खुशबू में क्यों आती है वनीला जैसी महक?

कागज लकड़ी से बनता है। इसमें सेल्यूलोज और लिग्निन जैसे प्राकृतिक तत्व होते हैं। समय बीतने के साथ कागज में एक रासायनिक प्रक्रिया शुरू होती है, जिसे एसिड हाइड्रोलिसिस कहा जाता है। इस दौरान कागज टूटने लगता है और हवा में कई तरह के वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (VOCs) निकलते हैं।

इनमें सबसे खास है वैनिलिन। यही वही यौगिक है जो प्राकृतिक वनीला की खुशबू देता है। इसलिए कई पुरानी किताबों में वनीला जैसी मीठी महक महसूस होती है। इसके अलावा बेंजाल्डिहाइड बादाम जैसी खुशबू देता है, जबकि कुछ दूसरे यौगिक फूलों और मिठास जैसी हल्की सुगंध पैदा करते हैं।

अलग-अलग किताबों की अलग महक

दिलचस्प बात यह है कि सभी पुरानी किताबें एक जैसी नहीं महकतीं। उनकी खुशबू इस बात पर निर्भर करती है कि कागज किस तरह बना था, किस तरह की स्याही और गोंद इस्तेमाल हुई थी, और किताब को वर्षों तक किन परिस्थितियों में रखा गया।

अगर किताब नमी वाली जगह पर रही हो, तो उसमें फफूंदी की गंध भी मिल सकती है। वहीं धूप, धूल, धुएं या इत्र जैसी बाहरी चीजें भी उसकी महक बदल सकती हैं।

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वैज्ञानिक भी सूंघकर जांचते हैं किताबें

2009 में प्रकाशित एक शोध में वैज्ञानिकों ने एक नई तकनीक विकसित की, जिसे मैटेरियल डिग्रेडोमिक्स नाम दिया गया। इसमें किताब के पन्ने काटे बिना सिर्फ उसकी महक में मौजूद रसायनों का विश्लेषण किया जाता है। इससे पता लगाया जा सकता है कि किताब कितनी तेजी से खराब हो रही है और उसे संरक्षण की जरूरत है या नहीं।

शोधकर्ताओं ने ऐतिहासिक किताबों की गंध को समझने के लिए एक हिस्टोरिक पेपर ओडर व्हील भी तैयार किया। इसमें लोगों ने पुरानी किताबों की खुशबू को अक्सर चॉकलेट, कॉफी और वनीला जैसे शब्दों में बयां किया।

नई किताबों से यह खुशबू क्यों नहीं आती?

आजकल बनने वाले बेहतर गुणवत्ता वाले कागज से ज्यादातर लिग्निन निकाल दिया जाता है, ताकि पन्ने लंबे समय तक सफेद रहें और जल्दी पीले न पड़ें। यही वजह है कि आधुनिक किताबें दशकों बाद भी वैसी वनीला जैसी खुशबू शायद ही विकसित करें, जैसी पुराने उपन्यासों या लाइब्रेरी की किताबों में मिलती है।

Suneet Singh
सुनीत सिंहauthor

सुनीत सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में डिप्टी न्यूज एडिटर के रूप में कार्यरत हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन में स्पेशल स्टोरीज प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहे हैं। टीवी और डिजिटल पत्रकारिता में 13 वर्षों के अनुभव के साथ, सुनीत उन बहुमुखी पत्रकारों में शामिल हैं जिन्होंने न्यूजरूम और फील्ड—दोनों मोर्चों पर खुद को साबित किया है। माइक, कैमरा और एडिटिंग डेस्क तीनों से उनकी सहज जुगलबंदी ने उन्हें एक संतुलित और विश्वसनीय मीडिया प्रोफेशनल के रूप में स्थापित किया है। पिछले 10 वर्षों से सुनीत लाइफस्टाइल, लिटरेचर, सिनेमा और संस्कृति से जुड़ी गहन व विश्लेषणात्मक स्टोरीज लिखते रहे हैं और अबतक 12,000 से अधिक आर्टिकल पब्लिश कर चुके हैं। उनकी लेखन शैली गहराई, मौलिक दृष्टिकोण और रिसर्च-आधारित प्रस्तुति से पहचानी जाती है। वे विषयों की बारीकियों को पकड़कर उन्हें सरल, प्रभावी और पाठकों से जुड़ने वाली भाषा में ढालने में दक्ष हैं।

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