Shayari of the day, Allama Iqbal Shayari: अल्लामा मुहम्मद इकबाल उर्दू शायरी के महान शायर और दार्शनिक थे। उनकी शायरी भावनाओं की अभिव्यक्ति के साथ ही गहरी दार्शनिक चेतना, आत्म-जागरण और राष्ट्रप्रेम से भरी हुई होती थी। इकबाल को “शायर-ए-मशरिक” (पूर्व का कवि) भी कहा जाता था। उनकी भाषा सरल, मार्मिक और प्रभावशाली हुआ करती थी। आज भी उनकी शायरी पढ़ने वाले के मन में नई ऊर्जा, साहस और सोच पैदा करती है। अल्लामा इकबाल के यूं तो बहुत से शेर दशकों बाद भी आज सुने सुनाए जाते हैं, लेकिन एक शेर ऐसा है जो बहुत ज्यादा पॉपुलर है। अल्लामा इकबाल का यह शेर कुछ इस तरह से हैः
“हजारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है, बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा।”
अल्लामा इकबाल का यह मशहूर शेर गहरी सोच और दर्शन को अपने भीतर समेटे हुए है। इस शेर में ‘नर्गिस’ को रूपक के तौर पर इस्तेमाल किया गया है। नर्गिस का फूल यहां उस समाज या दुनिया का प्रतिनिधित्व करता है, जो लंबे समय तक एक सच्चे समझदार और दूरदर्शी व्यक्ति (दीदा-वर) की कमी महसूस करता है। ‘बे-नूरी’ का मतलब है रोशनी या चमक का अभाव, यानी ऐसा समय जब समाज में सच्ची समझ, नेतृत्व और गहरी दृष्टि रखने वाले लोग नहीं होते।
इकबाल कहना चाहते हैं कि एक सच्चा और महान इंसान, जो समाज को सही दिशा दिखा सके, बहुत मुश्किल से पैदा होता है। ऐसे लोग सामान्य नहीं होते, बल्कि सदियों में एक बार जन्म लेते हैं। जब तक ऐसा व्यक्ति नहीं आता, तब तक समाज अंधेरे में भटकता रहता है, जैसे नर्गिस का फूल अपनी रोशनी के बिना उदास रहता है।
यह शेर हमें यह भी सिखाता है कि महानता कोई आम बात नहीं है। एक सच्चा नेता, विचारक या मार्गदर्शक बनने के लिए असाधारण गुणों की जरूरत होती है। इसलिए जब ऐसे लोग जन्म लेते हैं, तो उनका महत्व और भी बढ़ जाता है। कुल मिलाकर, यह शेर समाज में असली प्रतिभा और दूरदर्शिता की कमी को उजागर करता है और बताता है कि एक सच्चा ‘दीदा-वर’ पूरी दुनिया को बदलने की क्षमता रखता है।
अल्लामा इकबाल के मशहूर शेर
इस शेर के अलावा अल्लामा इकबाल के और भी तमाम शेर हैं जो हर आयु वर्ग के लोगों को अपनी तरफ खींचता है। आइए पढ़ते हैं अल्लामा इकबाल के चंद मशहूर शेर:
1. माना कि तेरी दीद के क़ाबिल नहीं हूं मैं
तू मेरा शौक़ देख मिरा इंतिज़ार देख
2. ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले
ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है
3. नहीं है ना-उमीद 'इक़बाल' अपनी किश्त-ए-वीराँ से
ज़रा नम हो तो ये मिट्टी बहुत ज़रख़ेज़ है साक़ी
4. तिरे इश्क़ की इंतिहा चाहता हूं
मिरी सादगी देख क्या चाहता हूं
5. नशा पिला के गिराना तो सब को आता है
मज़ा तो जब है कि गिरतों को थाम ले साक़ी
