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Psychology: कभी घड़ी न पहनने वाले लोग कैसे होते हैं? क्या कहती है साइकोलॉजी

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि घड़ी न पहनने का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति लापरवाह या समय का पाबंद नहीं है। कई बार इसका संबंध व्यक्ति के व्यक्तित्व और जीवन को देखने के नजरिए से होता है।

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कैसे होते हैं कभी घड़ी ना पहनने वाले लोग (AI Image)

Pschology: कलाई पर घड़ी पहनना कभी समय की जरूरत था, लेकिन स्मार्टफोन के दौर में बहुत से लोग घड़ी पहनना छोड़ चुके हैं। दिलचस्प बात यह है कि कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो मोबाइल क्रांति के पहले से ही घड़ी पहनना पसंद नहीं करते। क्या यह केवल एक आदत है या इसके पीछे कोई मनोवैज्ञानिक कारण भी हो सकता है? साइकोलॉजी इस बारे में कुछ रोचक संकेत देती है।

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि घड़ी न पहनने का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति लापरवाह या समय का पाबंद नहीं है। कई बार इसका संबंध व्यक्ति के व्यक्तित्व और जीवन को देखने के नजरिए से होता है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार जो लोग घड़ी पहनने से बचते हैं, वे अक्सर ज्यादा स्वतंत्र सोच वाले हो सकते हैं। उन्हें हर समय मिनटों और सेकंडों के हिसाब से जीना पसंद नहीं होता। ऐसे लोग समय को एक सख्त नियम की बजाय एक प्रवाह की तरह देखते हैं। वे वर्तमान पल का आनंद लेने को अधिक महत्व देते हैं।

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कुछ लोगों के लिए घड़ी एक तरह का मानसिक दबाव भी पैदा करती है। लगातार समय देखते रहने से उन्हें तनाव महसूस हो सकता है। इसलिए वे अनजाने में घड़ी से दूरी बना लेते हैं। यह उनके लिए खुद को रिलैक्स रखने का एक तरीका हो सकता है। वहीं, रचनात्मक क्षेत्रों में काम करने वाले कई लोगों में भी यह आदत देखी जाती है। कलाकार, लेखक या संगीतकार अक्सर अपने काम में इतने डूब जाते हैं कि समय का बोध पीछे छूट जाता है। ऐसे लोगों के लिए घड़ी की टिक-टिक कभी-कभी उनकी रचनात्मकता में बाधा जैसी लग सकती है।

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इसका दूसरा पहलू भी है। कुछ अध्ययनों में पाया गया है कि जो लोग नियमित रूप से घड़ी पहनते हैं, वे समय प्रबंधन को लेकर अधिक सजग हो सकते हैं। इसलिए घड़ी न पहनने का अर्थ हमेशा सकारात्मक व्यक्तित्व गुण ही नहीं होता। कुछ मामलों में यह समय के प्रति अपेक्षाकृत ढीले रवैये का संकेत भी हो सकता है।

फैशन और पहचान भी इसमें भूमिका निभाते हैं। कुछ लोग घड़ी को अपने व्यक्तित्व का हिस्सा नहीं मानते। उन्हें लगता है कि स्मार्टफोन होने पर अलग से घड़ी पहनने की जरूरत नहीं है। नई पीढ़ी में यह सोच तेजी से बढ़ी है। आखिरकार, किसी व्यक्ति के घड़ी पहनने या न पहनने से उसके पूरे व्यक्तित्व का आकलन नहीं किया जा सकता। साइकोलॉजी इसे केवल एक व्यवहारिक संकेत मानती है, कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं।

Suneet Singh
सुनीत सिंहauthor

सुनीत सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में डिप्टी न्यूज एडिटर के रूप में कार्यरत हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन में स्पेशल स्टोरीज प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहे हैं। टीवी और डिजिटल पत्रकारिता में 13 वर्षों के अनुभव के साथ, सुनीत उन बहुमुखी पत्रकारों में शामिल हैं जिन्होंने न्यूजरूम और फील्ड—दोनों मोर्चों पर खुद को साबित किया है। माइक, कैमरा और एडिटिंग डेस्क तीनों से उनकी सहज जुगलबंदी ने उन्हें एक संतुलित और विश्वसनीय मीडिया प्रोफेशनल के रूप में स्थापित किया है। पिछले 10 वर्षों से सुनीत लाइफस्टाइल, लिटरेचर, सिनेमा और संस्कृति से जुड़ी गहन व विश्लेषणात्मक स्टोरीज लिखते रहे हैं और अबतक 12,000 से अधिक आर्टिकल पब्लिश कर चुके हैं। उनकी लेखन शैली गहराई, मौलिक दृष्टिकोण और रिसर्च-आधारित प्रस्तुति से पहचानी जाती है। वे विषयों की बारीकियों को पकड़कर उन्हें सरल, प्रभावी और पाठकों से जुड़ने वाली भाषा में ढालने में दक्ष हैं।

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