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कोट, चश्मा और चेकदार शर्ट: जानिए कैसे गढ़ा गया था भारत के सबसे मशहूर 'कॉमन मैन' का अक्स

कॉमन मैन का कोई नाम नहीं था। न उसका कोई घर था, न परिवार। वह कहां रहता है, ये भी नहीं पता। कभी वह दिल्ली में दिखाई देता तो कभी मुंबई में। वह कहीं का भी हो सकता था।

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कार्टूनिस्ट आर के लक्ष्मण के कॉमन मैन की कहानी (AI Genetrated and Newsroom verified image)
Authored by: सुनीत सिंह
Updated Sep 19, 2026, 12:11 IST
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भारत में अगर किसी एक काल्पनिक किरदार ने देश के करोड़ों आम लोगों के सुख-दुख, लाचारी और परेशानियों को आवाज दी है, तो वह है महान कार्टूनिस्ट आर के लक्ष्मण का बनाया हुआ 'कॉमन मैन'। आंखों पर गोल चश्मा, सफेद बिखरे बाल, बदन पर कोट, धोती और सबसे खास पहचान- उसकी चेकदार शर्ट। द टाइम्स ऑफ इंडिया अखबार के पहले पन्ने पर कोने में खड़े होकर तमाशा देखते इस बुजुर्ग शख्स ने आधी सदी से भी ज्यादा समय तक भारतीय राजनीति और समाज को आईना दिखाने का काम किया।

आर. के. लक्ष्मण ने इस एक किरदार में उस आम भारतीय को पकड़ लिया था, जो हर दिन व्यवस्था को अपने सामने बदलते हुए देखता है, लेकिन खुद की जिंदगी में बदलाव का इंतजार करता रहता है। बहुत से लोगों के मन में ये सवाल होगा कि आखिर लक्ष्मण ने इस आम आदमी को ऐसा ही क्यों बनाया? उसकी शर्ट चेकदार क्यों थी? वह हमेशा धोती और कोट में ही क्यों नजर आया? गोल चश्मा और सफेद बाल ही उसकी पहचान क्यों बने? इसके पीछे की कहानी उतनी ही दिलचस्प है जितना कि खुद कॉमन मैन नाम का यह किरदार।

कार्टूनिस्ट की कलम से आखिर कैसे जन्मा कॉमन मैन

आर के लक्ष्मण की आत्मकथा 'द टनल ऑफ टाइम' में कॉमन मैन के जन्म का बेहद दिलचस्प किस्सा दर्ज है। लक्ष्मण ने साल 1951 में 'द टाइम्स ऑफ इंडिया' के साथ बतौर कार्टूनिस्ट अपनी पारी का आगाज किया था। अखबार में उनका मशहूर कॉमिक स्ट्रिप कार्टून यू सेड इट (You Said It) छपा करता था।

अपने इस कॉमिक स्ट्रिप के जरिए वो आम आदमी के सरोकार से जुड़े ताजा राजनैतिक और सामाजिक घटनाक्रमों को हल्के-फुल्के अंदाज में पेश किया करते थे। ये काम काफी चुनौती भरा था। वो यूं कि महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार या अफसरशाही जैसी चीजों से परेशान आम आदमी की अलग-अलग परेशानियों को दिखाने के लिए उन्हें रोज नए किरदार गढ़ने पड़ते।

आर के लक्ष्मण और कॉमन मैन

आर के लक्ष्मण और कॉमन मैन

उनके कार्टूनों में कभी कोई दक्षिण भारतीय व्यक्ति होता तो कभी बंगाली धोती में नजर आता कोई आदमी। कभी मराठी टोपी में कोई बुजुर्ग दिखता तो कभी पगड़ी पहने को परेशान सरदार। यानी हर कार्टून में आम लोगों के चेहरे और कपड़े बदलते रहते थे। लेकिन रोज ऐसा करना आसान नहीं था। अखबार की डेडलाइन होती थी। समय कम होता था और लक्ष्मण को जल्दी से ऐसा चेहरा बनाना था, जिसे देखते ही पाठक समझ जाए कि यह ‘आम आदमी’ है।

बकौल लक्ष्मण इसी परेशानी से गुजरते हुए उनके मन में एक आइडिया आया। उन्होंने सोचा कि क्यों न एक ऐसा किरदार बनाया जाए जिसकी कोई खास पहचान ही न हो? न वह सिर्फ मुंबई का हो, न दिल्ली का, न दक्षिण का, न उत्तर भारत का, न किसी खास धर्म या जाति का। बस वह भारत का आम आदमी हो। वह आम आदमी जो चुपचाप देश की व्यवस्था, महंगाई, लालफीताशाही और राजनीतिक वादों के बोझ तले दबा चला आ रहा है।

इसी सोच के आधार पर धीरे-धीरे भीड़ छंटती गई और लक्ष्मण के कैनवास पर केवल एक किरदार बचा। आम आदमी का ऐसा किरदार जो 'कॉमन मैन' के नाम से हमेशा के लिए अमर हो गया।

कॉमन मैन के कण-कण में मौजूद इंडियन मिडिल क्लास

आर के लक्ष्मण ने अपने कॉमन मैन के पहनावे और हाव भाव को बहुत ही सोच समझकर गढ़ा था। इस कॉमन मैन का हर हिस्सा आम भारतीय की जिंदगी से जुड़ा था:

चेक वाली शर्ट

कॉमन मैन की सबसे बड़ी पहचान उसकी काली-सफेद खादी जैसी चेकदार शर्ट थी। लक्ष्मण का मानना था कि चेकदार पैटर्न साधारण और मध्यम वर्गीय कपड़े की निशानी है। यह शर्ट न तो ज्यादा भड़कीली थी और न ही एकदम सादी। यह देश के उस मिडिल क्लास की पहचान थी, जो न तो बहुत गरीब है कि सड़क पर उतर आए और न ही इतना अमीर कि सिस्टम उसे छू न सके।

बदन पर कोट और धोती

कॉमन मैन के शरीर के ऊपरी हिस्से पर थोड़ा पुराना सा कोट था और नीचे धोती। यह मेल भी काफी दिलचस्प था। कोट उसे एक तरह की सामाजिक गरिमा देता था। ऐसा लगता था जैसे वह अपनी साधारण जिंदगी के बावजूद खुद की औकात बनाए रखने की कोशिश कर रहा है। वहीं नीचे की धोती उसे जमीन से जोड़े रखती थी।

वह न पूरी तरह आधुनिक था, न पूरी तरह से पुराने जमाने का। वह ठीक उसी भारत का आदमी था, जो एक तरफ बदलती दुनिया को देख रहा था और दूसरी तरफ अपनी पुरानी आदतों और जीवनशैली से भी जुड़ा हुआ था।

गोल चश्मा और सफेद बिखरे बाल

गोल चश्मा और हैरान-परेशान सी उठी हुई भौंहें यह दिखाती थी कि वह इंसान दुनिया में जो कुछ हो रहा है, उसे बहुत गौर से देख रहा है। वहीं उसके सफेद बिखरे बाल इस बात की गवाह थे कि वह जीवन के तजुर्बों और संघर्षों से गुजर चुका है। बावजूद इसके व्यवस्था में कोई सुधार न देखकर हैरान है।

आम आदमी का अक्स था कॉमन मैन

आम आदमी का अक्स था कॉमन मैन

कॉमन मैन कुछ बोलता क्यों नहीं था?

कॉमन मैन की एक और खास बात थी, जो शायद उसके पूरे किरदार की जान थी। वह बोलता नहीं था। आर के लक्ष्मण के कार्टून में नेता बोलते थे, मंत्री बोलते थे या अफसर बोलते थे। वहीं कॉमन मैन चुपचाप खड़ा रहता था। कभी किसी नेता के भाषण की भीड़ में, कभी सरकारी दफ्तर के बाहर तो कभी राशन की लाइन में। वह हर जगह बस चुपचाप खड़ा रहता।

आर. के. लक्ष्मण ने इसी खामोशी के जरिए एक बड़ा काम किया। उन्होंने देश के हर आम आदमी को यह मौका दिया कि वह उस किरदार की जगह खुद को रख सके। कॉमन मैन कुछ नहीं कहता था, इसलिए हर पाठक उसके चेहरे पर अपनी बात पढ़ सकता था।

1990 के दशक में बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में जब आर के लक्ष्मण से पूछा गया कि आपका कॉमन मैन कभी बोलता क्यों नहीं, तो उनका जवाब था- मेरा कॉमन मैन अमर है। वह कभी बूढ़ा नहीं होता, कभी मरता नहीं और न ही कभी बहस करता है। वह चुपचाप सब देखता है क्योंकि वह हर उस भारतीय का चेहरा है जो रोजाना की अनगिनत दिक्कतों के बावजूद उम्मीद के साथ अपनी जिंदगी जीता चला जा रहा है।

इस किरदार की आत्मीयता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश के पूर्व राष्ट्रपति और महान वैज्ञानिक डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने आर के लक्ष्मण और कॉमन मैन की सराहना करते हुए कहा था- लक्ष्मण का 'कॉमन मैन' भारतीय लोकतंत्र की सबसे मजबूत और जीवंत आवाज है, जो बिना एक शब्द बोले भी सत्ता के शिखर तक अपनी बात पहुंचा देता है।

द टाइम्स ग्रुप की किताब An Uncommon Man

द टाइम्स ग्रुप की किताब An Uncommon Man

न कोई नाम, न पहचान, फिर भी सबका अपना

कॉमन मैन की एक खूबी यह भी रही कि उसका कोई नाम नहीं था। न ही उसका कोई घर था, न कोई परिवार दिखाया गया और न ही यह बताया गया कि वह भारत के किस शहर में रहता है। कभी वह दिल्ली में दिखाई देता, कभी मुंबई में तो कभी लोकल ट्रेन की भीड़ में। वह कहीं का भी हो सकता था। यही उसकी सबसे बड़ी खूबी थी।

अगर उसका नाम होता, उसका घर होता, उसका कोई निश्चित पेशा होता, तो शायद वह सिर्फ एक किरदार रह जाता। लेकिन बिना नाम के वह करोड़ों लोगों का प्रतिनिधि बन गया।

कुल मिलाकर आर के लक्ष्मण ने एक ऐसा किरदार बनाया जिसने भारत के आम आदमी की आत्मा को उकेर दिया था। वह असल जिंदगी में हमारे ही बीच का सा लगता। ऐसा किरदार जो सुबह काम पर जाता है, बस-ट्रेन की लाइन में लगता होता है, सरकारी फरमानों की मार झेलता और फिर अगले दिन उठकर अपनी जिंदगी शुरू कर देता। 'कॉमन मैन' का वह सादा सा गेटअप आज भी भारत के उस आम नागरिक के आत्मसम्मान, सहनशीलता और अटूट उम्मीद का सबसे बड़ा प्रतीक है।

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