Krishna Janmashtami, Dahi Handi Matki Fod: कृष्ण जन्माष्टमी की रात जैसे ही घड़ी की सुइयां आधी रात के करीब पहुंचती हैं, मंदिरों में घंटियां गूंजने लगती हैं। कहीं शंख बजता है, कहीं भजन शुरू हो जाते हैं और कहीं पालने में नन्हे कान्हा को झुलाकर उनके जन्म का जश्न मनाया जाता है। लेकिन जन्माष्टमी का असली रंग यहीं खत्म नहीं होता। अगले दिन वही शांत भक्ति अचानक ढोल-नगाड़ों, नारों और जोश से भरी गलियों में बदल जाती है। ऊंचाई पर लटकी एक मटकी, उसके नीचे खड़ी गोविंदाओं की टोली और मटकी तक पहुंचने के लिए बनती इंसानी पिरामिड... यही है दही हांडी या मटकी फोड़ का रोमांच।
माखन के पीछे भागते थे कान्हा, अब मटकी के पीछे भागती हैं टोलियां
दूर से देखने पर मटकी फोड़ किसी स्टंट या खेल जैसा लगता है, लेकिन इसकी जड़ें कृष्ण की बचपन की उन कहानियों से जुड़ी हुई हैं। कृष्ण की बाल लीलाओं में माखन चोरी की कहानियां सबसे ज्यादा लोकप्रिय हैं। गोकुल-वृंदावन की लोककथाओं में नन्हे कान्हा को ऐसा नटखट बच्चा बताया जाता है, जिसे माखन खूब प्रिय था। समस्या बस इतनी थी कि घरों में माखन की मटकी अक्सर ऊंचाई पर टांगी जाती थी।

माखनचोर मटकी फोड़
और ऊंचाई पर लटकी माखन की मटकी तक पहुंचने के लिए कान्हा, दोस्तों की टोली साथ, एक के ऊपर एक चढ़ मटकी फोड़ माखन खा लेते थे। यही बाल लीला समय के साथ दही हांडी की परंपरा से जोड़ी जाने लगी। फर्क बस इतना है कि तब लक्ष्य था माखन तक पहुंचना और आज गोविंदा टोली का लक्ष्य है ऊंचाई पर लटकी मटकी को फोड़ना।
आखिर कैसे फोड़ी जाती है दही हांडी?
दही हांडी के लिए एक मटकी को रस्सी की मदद से काफी ऊंचाई पर लटकाया जाता है। कई आयोजनों में मटकी के अंदर दही, मक्खन या दूसरी खाद्य सामग्री रखी जाती है।गोविंदाओं की टोली एक-दूसरे के कंधों पर चढ़कर मानव पिरामिड बनाती है। नीचे के लोग पूरी पिरामिड को संभालते हैं और सबसे ऊपर पहुंचने वाला गोविंदा मटकी तक पहुंचकर उसे फोड़ता है। मटकी टूटते ही दही नीचे गिरता है और पूरी टोली खुशी से झूम उठती है। देखने वालों की तालियां, ढोल की थाप और ‘गोविंदा आला रे’ जैसे नारों से माहौल और भी जोशीला हो जाता है। जो कोई भी इस ऊंचाई पर बांधी हुई मटकी को फोड़ देता है, उसे इनाम भी मिलता है।
लेकिन इस पूरे खेल में सिर्फ ताकत काम नहीं आती। एक छोटी-सी गलती पूरी पिरामिड को बिगाड़ सकती है। इसलिए बैलेंस, भरोसा और टीमवर्क इसकी सबसे बड़ी ताकत हैं। दही हांडी गिरने, उठने और फिर से कोशिश कर जीतने की कहानी भी है।
महाराष्ट्र में दही हांडी इतनी बड़ी क्यों है?
जन्माष्टमी पूरे देश में मनाई जाती है, लेकिन महाराष्ट्र में दही हांडी का उत्साह देखते ही बनता है। खासकर मुंबई, ठाणे और आसपास के इलाकों में यह सिर्फ धार्मिक कार्यक्रम नहीं रहता, बल्कि बड़े सार्वजनिक उत्सव का रूप ले लेता है। कई जगह गोविंदा मंडल महीनों पहले से तैयारी शुरू कर देते हैं। ऊंची मटकी, रंग-बिरंगी सजावट, तेज संगीत, ढोल-ताशे और बड़ी संख्या में जुटती भीड़ इसे किसी बड़े इवेंट जैसा बना देती है।
कई आयोजनों में मटकी फोड़ प्रतियोगिता भी होती है, जिसमें अलग-अलग टोलियां हिस्सा लेती हैं। इनाम और प्रतियोगिता का रोमांच इसे और आकर्षक बना देता है। यानी कान्हा की छोटी-सी माखन चोरी अब बड़े पैमाने पर होने वाला सामूहिक उत्सव बन चुकी है।
मटकी फुटती है, दिल जुड़ते हैं
दही हांडी की असली खूबसूरती सिर्फ उस पल में नहीं है, जब ऊंचाई पर लटकी मटकी टूटती है। असली मजा तो उस पूरे माहौल में है, जहां गोविंदा टोली के साथ-साथ आसपास खड़ी भीड़ भी इस खेल का हिस्सा बन जाती है। कोई ढोल की थाप तेज करता है, कोई जोर-जोर से नारे लगाता है, तो कृष्ण लीला देख झूम उठता है।
जैसे ही टोली ऊपर चढ़ती है, नीचे खड़े लोगों की धड़कनें भी उसके साथ ऊपर जाती हैं। एक कोशिश नाकाम होती है तो भीड़ फिर हौसला बढ़ाती है और अगली कोशिश के लिए माहौल तैयार हो जाता है। मटकी भले एक गोविंदा फोड़ता हो, लेकिन उसे वहां तक पहुंचाने में पूरी टोली की मेहनत होती है। शायद यही दही हांडी की सबसे प्यारी बात है, ऊंचाई पर मटकी टूटती है, और नीचे खड़े लोगों के दिल भक्तिभाव में जुड़ जाते हैं।
वक्त के साथ बदल गई मटकी, बदल गया अंदाज
पहले दही हांडी मुख्य रूप से स्थानीय और सामुदायिक परंपरा के तौर पर मनाई जाती थी। अब कई शहरों में इसके बड़े-बड़े आयोजन होते हैं। मंच, लाइट्स, संगीत, पुरस्कार और प्रतियोगिताओं ने इसे काफी भव्य बना दिया है। हालांकि उत्सव जितना रोमांचक है, उतनी ही जरूरी इसमें सुरक्षा भी है। ऊंचाई पर बनने वाली मानव पिरामिड में चोट का जोखिम रहता है, इसलिए आयोजकों और प्रतिभागियों के लिए सुरक्षा इंतजाम और सावधानी बेहद जरूरी हैं।

कृष्ण जन्माष्टमी दही हांडी उत्सव
साल भर रहता है इंतजार
कृष्ण जन्माष्टमी का खूबसूरत रंग शायद इसी वजह से अलग है। एक तरफ आधी रात को श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव होता है, तो दूसरी तरफ अगले दिन गलियों में गूंजते ढोल और गोविंदा की टोलियों का जोश। एक तरफ पालने में झूलते बाल गोपाल हैं और दूसरी तरफ माखन के पीछे दौड़ता वही नटखट कान्हा।
मटकी कुछ सेकंड में टूट जाती है, दही बिखर जाता है और उत्सव भी धीरे-धीरे खत्म हो जाता है। लेकिन उस मटकी तक पहुंचने के लिए बनी मानव पिरामिड एक बात जरूर याद दिलाती है, ऊंचाई चाहे कितनी भी हो, साथ हो तो रास्ता बन ही जाता है।
