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Amrita Pritam Birth Anniversary: अमृता प्रीतम की कलम से निकलीं वो 2 कविताएं, जिन्हें पढ़कर दिल में घर कर जाती हैं

अमृता प्रीतम की कविताएं सिर्फ शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि प्रेम, विरह, दर्द, समाज की सच्चाई को महसूस करने का जरिया हैं। उनकी दो चर्चित रचनाएं आज भी पाठकों को अपने भीतर झांकने, भावनाओं को समझने का मौका देती हैं।

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अमृता प्रीतम की कविताएं (Photo Credit - Wikipedia)

Amrita Pritam Birth Anniversary: 31 अगस्त 1919 को जन्मीं अमृता प्रीतम पंजाबी और हिंदी साहित्य की ऐसी रचनाकार थीं, जिनकी लेखनी ने प्रेम से लेकर बंटवारे के दर्द और स्त्री के मन तक को बेहद संवेदनशीलता से शब्द दिए। उन्होंने अपने लंबे साहित्यिक जीवन में कविता, कहानी, उपन्यास और आत्मकथा समेत कई विधाओं में लिखा।

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उनकी कविताओं की खासियत यह है कि वे सिर्फ पढ़ी नहीं जातीं, बल्कि धीरे-धीरे महसूस होती हैं। ‘अज्ज आखां वारिस शाह नूं’ उनकी सबसे चर्चित रचनाओं में शामिल है, जिसमें 1947 के विभाजन की त्रासदी और पंजाब के दर्द की तस्वीर दिखाई देती है। वहीं ‘मैं तैनूं फिर मिलांगी’ प्रेम और रिश्ते की ऐसी कल्पना सामने रखती है, जिसमें मिलना केवल एक जीवन तक सीमित नहीं रहता। दोनों कविताएं अमृता प्रीतम की संवेदनशील और बेबाक लेखनी का अलग-अलग रूप दिखाती हैं।

आज आखां वारिस शाह नूं

कितों कब्रां विच्चों बोल,

ते आज किताब-ए-इश्क दा,

कोई अगला वरका फोल।

इक रोई सी धी पंजाब दी,

तू लिख-लिख मारे वैन,

आज लाखां धियां रोंदियां,

तैनूं वारिस शाह नूं कहन।

उठ दर्दमंदां दियां दर्दिया,

उठ तक अपना पंजाब,

आज बैली लाशां बिछियां,

ते लहू दी भरी चनाब।

किसे ने पंजां पाणियां विच

दिती जहर रला,

ते उनहां पाणियां धरत नूं

दिता पानी ला।

इस जरखेज जमीन दे

लोम-लोम फुटिया जहर,

गिट्ठ-गिट्ठ चढ़ियां लालियां,

फुट-फुट चढ़िया कहर।

वे वलेसी वाह फेर,

वन-वन वगी जा,

ओहने हर इक वांस दी

वंजली दिती नाग बना।

पहला डंग मदरियां,

मंतर गए गुआच,

दूजे डंग दी लग गई,

जाने-खाने नूं लाग।

लागां कीलें लोक मूंह,

बस फिर डंग ही डंग,

पलो-पली पंजाब दे,

नीले पे गए अंग।

गलों टूटे गीत फिर,

तकलेयों टूटी तंद,

त्रिंजनों टुटियां सहेलियां,

चरखड़े घूकर बंद।

सणे सेज दे बेरियां,

लुड्डां दितियां रोड़,

सणे डालियां पींघ आज,

पिपलां दिती तोड़।

जिथे वजदी सी फूंक प्यार दी,

वे ओह वंजली गई गुआच,

रांझे दे सब वीर आज,

भुल गए ओहदी जाच।

धरती ते लहू वारसिया,

कब्रां पइयां चों,

प्रीत दियां शाहजादियां,

आज विच मज़ारां रोन।

आज सभे ‘कैदो’ बन गए,

हुस्न इश्क दे चोर,

आज कित्थों लियाइए लभ के

वारिस शाह इक होर।

आज आखां वारिस शाह नूं,

कितों कब्रां विच्चों बोल,

ते आज किताब-ए-इश्क दा,

कोई अगला वरका फोल।

मेन तैनू फिर मिलांगी

मैं तैनू फिर मिलांगी

किथे? किस प्रकार? पता नहीं

शायद तेरे तख़िल दी चीनाग बनके

तेरे कैनवास ते उतरंगी

हां खोरे तेरी कैनवास दे उत्ते

इक रहस्मयी लकीर बनके

खामोश तैनू तकदी रावंगी

मैं तैनू फिर मिलांगी

मैं तुमसे फिर मिलूंगा।

कैसे और कहाँ? मुझे नहीं पता। शायद मैं तुम्हारी कल्पना की उपज

हूँ । या शायद मैं खुद को तुम्हारे कैनवास पर एक रहस्यमय रेखा के रूप में चित्रित करूँ,

जो नहीं होनी चाहिए।

चुपचाप, मैं तुम्हें निहारूँगा और तुमसे फिर मिलूंगा।

जा खोरे सूरज दी लौ बनके

तेरे रंगा विच घुलांगी

जा रंगा दियां बहवा विच बैठके

तेरे कैनवास नू वलंगी

पता नहीं किश ट्रैह-किथे

पर तैनू जरूर मिलंगी।

शायद मैं सूरज की

किरण बन जाऊं , और तुम्हारे रंगों में मग्न हो जाऊं,

या शायद मैं खुद को तुम्हारे कैनवास पर चित्रित कर लूं।

मुझे नहीं पता कैसे या कहाँ,

लेकिन मैं तुमसे ज़रूर मिलूंगी।

जा खोरे इक चश्मा बनी होवंगी

ते जीवन झरनेया दा पानी उड़ दा

मैं पानी दियां बुंदा

तेरे पिंडे ते मलंगी

ते इक ठंडक जाही बनके

तेरी छती दे नाल लगांगी

मैं होर कुछ नहीं जांदी

पर एना जांदियां

की वक्त जो वी करेगा

ऐ जनम मेरे नाल तुरेगा

शायद मैं एक झरना बन जाऊँ

और उससे फूटने वाले पानी की

बूँदें मैं तुम्हारे शरीर पर मल दूँ,

मैं उसकी शीतलता बन जाऊँ जो

तुम्हारी जलती हुई छाती पर ठहर जाए। मुझे और कुछ

नहीं पता,

पर इतना ज़रूर पता है कि समय चाहे जो भी करे, यह जीवन मेरे

साथ चलता रहेगा।

यह शरीर? यह तो नश्वर है।

सब कुछ नश्वर है।

लेकिन स्मृति के धागे

इस प्रकार बुने गए हैं

कि ब्रह्मांड इसके प्रत्येक मोती में समाहित है।

मैं उन नन्हे मोतियों को चुनूंगा,

मैं धागों को बुनूंगा

और फिर... मैं तुमसे दोबारा मिलूंगा।

Avni Bagrola
अवनी बागरोलाauthor

अवनी बागरोला टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल के लाइफस्टाइल सेक्शन में कंटेंट राइटर के रूप में कार्यरत हैं। फैशन, ब्यूटी, ट्रेंड्स, पर्सनल स्टाइलिंग और मॉडर्न लाइफस्टाइल से जुड़े कंटेंट पर उनकी मजबूत पकड़ उन्हें जेन Z और स्टाइल-सेवी ऑडियंस के बीच खास पहचान दिलाती है। अवनी की लेखन शैली सरल, ट्रेंडी और यूज़र-फ्रेंडली है, जो पाठकों को तेजी से बदलते फैशन व लाइफस्टाइल ट्रेंड्स को समझने में मदद करती है। अब तक 3000 से अधिक आर्टिकल्स लिख चुकी अवनी क्रिएटिव अप्रोच, अपडेटेड नॉलेज और रियल-टाइम ट्रेंड सेंस के लिए जानी जाती हैं।

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