लाइफस्टाइल

किताब कैफे: अमृता प्रीतम क्यों चाहती थीं कि कुछ खास लोग ना पढ़ें उनकी रसीदी टिकट, कौन थे ये लोग

Kitaab Cafe (किताब कैफे): ​अमृता प्रीतम ने खुद रसीदी टिकट में लिखा है कि ये किताब कुछ खास लोगों के हाथों में नहीं जानी चाहिए। आखिर किन लोगों के पढ़े जाने के खिलाफ थीं अमृता?

Image

रसीदी टिकट: अमृता प्रीतम की आत्मकथा

Kitaab Cafe (किताब कैफे): आत्मकथाएं अमूमन किसी इंसान के जीवन की घटनाओं का सबसे अहम दस्तावेज होती हैं। लेकिन अमृता प्रीतम की ‘रसीदी टिकट’ केवल उन घटनाओं का लेखा-जोखा भर ही नहीं हैं। यह तो एक संवेदनशील स्त्री के मन की वह यात्रा है, जिसमें प्रेम, पीड़ा, खालीपन, विद्रोह और आत्म स्वीकृति के ना जाने कितने ही रंग घुल-मिल जाते हैं। रसीदी टिकट पढ़ेंगे तो महसूस होगा कि जैसे अमृता अपने जीवन के बंद कमरों की खिड़कियां खोल रही हों और पढ़ने वाला उन खिड़कियों से झांक कर उनके मन के मौसमों को महसूस कर रहा हो। लेकिन क्या आप जानते हैं कि अमृता प्रीतम चाहती थीं कि उनकी यह आत्मकथा कोई भी ऐरा गैरा इंसान पढ़े?

अमृता ने खुद रसीदी टिकट में लिखा है कि ये किताब कुछ खास लोगों के हाथों में नहीं जानी चाहिए। किताब कैफे के इस अंक में आपको इसी किस्से से रूबरू करवाएंगे कि अमृता क्यों नहीं चाहती थीं ये किताब हर कोई पढ़े। आखिर किन लोगों के पढ़े जाने के खिलाफ थीं अमृताप्रीतम ?

जब दूसरे के रेडियो पर बच्चे सुनते मां की आवाज

आपकी इस उलझन को सुलझाने के लिए पहले हम आपको अमृता प्रीतम के जीवन के उस दौर में ले चल रहे हैं जब उन्होंने दिल्ली के आकाशवाणी में नौकरी करना शुरू किया था। तब वह पटेल नगर के एक घर में किराए पर रहती थीं। उन दिनों आलम ये था कि उनके घर पर बिजली आए दिन आंख मिचौली खेलती रहती। उनके दोनों बच्चे अपनी मां की आवाज रेडियो पर सुनने के लिए पड़ोस के एक घर में जाया करते। उसी घर में भोलू नाम का एक लड़का रहता था। भोलू अमृता प्रीतम के बेटे का दोस्त बन गया था।

टाइम्स नाउ नवभारत पर ये भी पढ़ें: जब धर्मवीर भारती ने युद्ध के राख से रचा अंधा युग

एक दिन उनके बेटे ने उदास मन से कहा कि मम्मा आप भोलू के रेडियो पर ना बोला करें। अमृता सकपका गईं। उन्होंने कई बार पूछा लेकिन लेकिन बेटे ने कारण नहीं बताया। अमृता को बाद में पता चला कि भोलू से उनके बेटे की लड़ाई हो गई है। ऐसे में वो नहीं चाहता कि जिस घर में वो खुद नहीं जाएगा उस घर में उसकी मम्मा की आवाज भी नहीं जानी चाहिए। उस दिन तो इन बातों को अमृता प्रीतम ने हंस कर टाल दिया, लेकिन जब अपनी आत्मकथा रसीदी टिकट लिखी तो इस बात का जिक्र करते हुए उन्होंने अपनी टीस को दुनिया के सामने रखा।

हर कोई ना पढ़े रसीदी टिकट

अमृता प्रीतम ने साफ लिखा कि ये किताब उन लोगों के हाथों में कभी नहीं जानी चाहिए जिन्हें इसके शब्दों को मिट्टी में लथेड़ना हो। दरअसल शादी के बाद भी साहिर लुधियानवी के लिए उनकी दीवानगी और चाहत के कारण बहुत से लोगों ने उनके चरित्र पर सवाल उठाए। भद्दे आरोप भी लगाए। अमृता का मानना था कि जो लोग उनके और साहिर के रिश्ते को गलत चश्मे से देखते हैं, वे दरअसल प्यार की उस पवित्रता को समझ ही नहीं सकते। इस कारण वो इस रिश्ते को कभी मंजूर भी नहीं कर सकते। हालांकि वो कहती थीं कि साहिर के लिए उनका प्यार किसी सामाजिक मंजूरी का मोहताज नहीं है। वह दुनिया के तानों को अपने प्यार के आगे बेहद छोटा मानती थीं।

अमृता प्रीतम ने रसीदी टिकट में अपने जीवन के हर सच को, चाहे वह उनकी असफल शादी हो, साहिर के लिए उनका एकतरफा जैसा दिखने वाला जुनूनी इश्क हो या इमरोज का उनके जीवन में आना। सब कुछ बेहद बेबाकी से लिखा। उस दौर का समाज एक औरत के मुंह से ऐसी बेबाक बातें सुनने का आदी नहीं था। अमृता जानती थीं कि समाज उनके सच को स्वीकार करने के बजाय उन पर उंगलियां उठाएगा। इसलिए, उनका यह कहना कि 'हर कोई इसे न पढ़े' दरअसल एक कटाक्ष था कि जिस समाज में सच को समझने और स्वीकार करने की हिम्मत नहीं है, वह मेरी जिंदगी की इस खुली किताब से दूर ही रहे।

Suneet Singh
सुनीत सिंहauthor

सुनीत सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में डिप्टी न्यूज एडिटर के रूप में कार्यरत हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन में स्पेशल स्टोरीज प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहे हैं। टीवी और डिजिटल पत्रकारिता में 13 वर्षों के अनुभव के साथ, सुनीत उन बहुमुखी पत्रकारों में शामिल हैं जिन्होंने न्यूजरूम और फील्ड—दोनों मोर्चों पर खुद को साबित किया है। माइक, कैमरा और एडिटिंग डेस्क तीनों से उनकी सहज जुगलबंदी ने उन्हें एक संतुलित और विश्वसनीय मीडिया प्रोफेशनल के रूप में स्थापित किया है। पिछले 10 वर्षों से सुनीत लाइफस्टाइल, लिटरेचर, सिनेमा और संस्कृति से जुड़ी गहन व विश्लेषणात्मक स्टोरीज लिखते रहे हैं और अबतक 12,000 से अधिक आर्टिकल पब्लिश कर चुके हैं। उनकी लेखन शैली गहराई, मौलिक दृष्टिकोण और रिसर्च-आधारित प्रस्तुति से पहचानी जाती है। वे विषयों की बारीकियों को पकड़कर उन्हें सरल, प्रभावी और पाठकों से जुड़ने वाली भाषा में ढालने में दक्ष हैं।

और पढ़ें
End of Article