Parenting Advice: अलग-अलग देशों में बच्चों की परवरिश का तरीका भी अलग है। भारत में जहां बच्चों की सुरक्षा और पढ़ाई पर सबसे ज्यादा जोर दिया जाता है, वहीं कई यूरोपीय देशों में बच्चों को कम उम्र से ही स्वतंत्र बनाना पैरेंटिंग का अहम हिस्सा माना जाता है।
हाल ही में यूरोप में एक महीना बिताने वाली एक भारतीय महिला ने सोशल मीडिया पर उन पांच पैरेंटिंग आदतों के बारे में बताया, जिन्हें उन्होंने वहां के परिवारों में करीब से देखा। उनका कहना है कि ये आदतें बच्चों को आत्मनिर्भर, जिम्मेदार और मानसिक रूप से मजबूत बनाने में मदद करती हैं:
1. बच्चों को खुद फैसले लेने का मौका मिलता है
महिला के मुताबिक, यूरोप में माता-पिता हर छोटी-बड़ी बात पर बच्चों के लिए फैसला नहीं लेते। वे उन्हें उम्र के हिसाब से विकल्प देते हैं और अपनी पसंद चुनने का मौका देते हैं। जैसे कौन से कपड़े पहनने हैं, कौन सी किताब पढ़नी है या स्कूल के बाद क्या करना है।
इससे बच्चों में निर्णय लेने की क्षमता विकसित होती है और वे अपने फैसलों की जिम्मेदारी भी समझने लगते हैं।
2. बाहर खेलना डेली लाइफ का हिस्सा है
यूरोपीय परिवारों में बच्चों का हर दिन कुछ समय बाहर खेलना लगभग तय माना जाता है। चाहे मौसम थोड़ा ठंडा हो या हल्की बारिश हो रही हो, बच्चे पार्क, मैदान या खुले स्थानों में समय बिताते हैं।
विशेषज्ञ भी मानते हैं कि खुले वातावरण में खेलने से बच्चों का शारीरिक विकास बेहतर होता है, तनाव कम होता है और उनकी रचनात्मक सोच भी बढ़ती है।
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3. आजादी के साथ जिम्मेदारी भी सिखाई जाती है
यूरोपीय पैरेंटिंग का एक बड़ा सिद्धांत है कि बच्चों को स्वतंत्रता जरूर दी जाए, लेकिन उसके साथ जिम्मेदारी भी सिखाई जाए।
कम उम्र से ही बच्चे अपना बैग संभालना, अपना कमरा व्यवस्थित रखना या छोटे-मोटे घरेलू काम करना सीखते हैं। इससे उनमें आत्मनिर्भरता के साथ अनुशासन भी विकसित होता है।
4. हर पल बच्चों की निगरानी नहीं की जाती
महिला बताती हैं कि यूरोप में माता-पिता बच्चों को हर समय निर्देश देने या लगातार टोकने की बजाय उन पर भरोसा करना सीखते हैं। वे बच्चों को छोटी-छोटी चुनौतियों का सामना खुद करने देते हैं।
इसका मतलब यह नहीं कि बच्चों को अकेला छोड़ दिया जाता है। सुरक्षित माहौल में उन्हें अनुभवों से सीखने का अवसर दिया जाता है। इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ता है और वे समस्याओं का समाधान खुद खोजने लगते हैं।
5. पढ़ाई के साथ बचपन को भी महत्व दिया जाता है
भारतीय परिवारों में अकसर पढ़ाई और अच्छे नंबर्स को सबसे बड़ी प्राथमिकता मान लिया जाता है। वहीं यूरोप के कई परिवारों में पढ़ाई के साथ-साथ खेल, कला, संगीत, परिवार के साथ समय बिताना और आराम करना भी उतना ही जरूरी समझा जाता है।
उनका मानना है कि बचपन सिर्फ परीक्षा और होमवर्क तक सीमित नहीं होना चाहिए। जब बच्चों को संतुलित जीवन मिलता है, तो वे मानसिक रूप से ज्यादा स्वस्थ और खुश रहते हैं।
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क्या भारत में भी अपनाए जा सकते हैं ये तरीके?
हर देश की संस्कृति, सामाजिक व्यवस्था और पारिवारिक परिस्थितियां अलग होती हैं। इसलिए किसी एक देश की पैरेंटिंग शैली को पूरी तरह अपनाना हमेशा व्यावहारिक नहीं होता। लेकिन इन आदतों से प्रेरणा जरूर ली जा सकती है।
अगर बच्चों को उनकी उम्र के अनुसार छोटे फैसले लेने दिए जाएं, जिम्मेदारियां सौंपी जाएं, स्क्रीन की जगह बाहर खेलने के लिए प्रोत्साहित किया जाए और पढ़ाई के साथ उनके भावनात्मक व सामाजिक विकास पर भी ध्यान दिया जाए, तो यह उनकी परवरिश को अधिक संतुलित बना सकता है।
आखिरकार अच्छी पैरेंटिंग का मतलब भी यही है कि बच्चों को ऐसा इंसान बनाया जाए जिससे वो भविष्य की चुनौतियों का सामना आत्मविश्वास और समझदारी के साथ कर सके।
