Why boredom is good for kids: आज के बच्चों की जेनरेशन शायद पहली ऐसी पीढ़ी है, जिसे बोर होने का मौका ही नहीं मिलता। घर में मोबाइल है, टैबलेट है, स्मार्ट टीवी है, वीडियो गेम हैं और अगर ये भी न हों तो माता-पिता तुरंत कोई नई एक्टिविटी खोज लेते हैं। नतीजा यह है कि जैसे ही बच्चा बोर होता है, हम तुरंत उसका मनोरंजन करने लगते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि बोरियत कोई समस्या नहीं, बच्चे के विकास का जरूरी हिस्सा है।
यूनिवर्सिटी ऑफ ईस्ट एंग्लिया की शिक्षा विशेषज्ञ डॉ. टेरेसा बेल्टन ने क्रिएटिविटी पर किए अपने एक रिसर्च में पाया कि बोरियत कई बार रचनात्मकता की शुरुआत होती है। जब बच्चे के पास कोई काम नहीं होता, तब उसका दिमाग खुद नए खेल, नई कहानियां और नए विचार गढ़ना शुरू करता है। यानी बोरियत दिमाग को खाली नहीं करती, उसे सक्रिय करती है।
टाइम्स नाउ नवभारत पर ये भी पढ़ें: अंकुर वारिकू से जानें बच्चों को कैसे बनाएं फाइनेंशियली इंटेलिजेंट
हर समय मनोरंजन, रचनात्मकता का दुश्मन
अमेरिकी मनोवैज्ञानिक डॉ. पीटर ग्रे अपनी चर्चित किताब फ्री टू लर्न में लिखते हैं कि बच्चों का सबसे बड़ा शिक्षक फ्री प्ले होता है। जब बच्चे बिना किसी निर्देश के अपने तरीके से खेलते हैं, तभी वे समस्या सुलझाना, फैसले लेना और कल्पना करना सीखते हैं।
अगर हर खाली समय पर उन्हें मोबाइल पकड़ा दिया जाए या कोई तय गतिविधि दे दी जाए, तो उनके पास अपनी दुनिया बनाने का अवसर ही नहीं बचता।
बोरियत से जन्म लेती है कल्पना
क्या आपने गौर किया है कि बचपन में एक तकिया कभी पहाड़ बन जाता था, कभी किला और कभी अंतरिक्ष यान? एक लकड़ी की छड़ी तलवार भी बनती थी और क्रिकेट का बैट भी। ऐसा इसलिए होता था क्योंकि हमारे पास हर समय तैयार मनोरंजन उपलब्ध नहीं था।
अमेरिकी पत्रकार मैनूश ज़ोमोरोडी अपनी किताब बोर्ड एंड ब्रिलियंट में लिखती हैं कि जब दिमाग कुछ देर के लिए बाहरी उत्तेजनाओं से मुक्त होता है, तब उसका डिफॉल्ट मोड नेटवर्क सक्रिय होता है। यही वह अवस्था है, जिसमें नए विचार, रचनात्मक सोच और आत्मचिंतन जन्म लेते हैं। यानी बोरियत के दौरान दिमाग आराम नहीं कर रहा होता, भीतर ही भीतर नए संबंध और नए विचार बना रहा होता है।
टाइम्स नाउ नवभारत पर ये भी पढ़ें: बच्चे को कैब से स्कूल भेजने वाले पेरेंट्स को जरूर पता होने चाहिए ये नियम
बच्चे का बोर होना इस बात का संकेत नहीं कि आप अच्छे माता-पिता नहीं हैं। कई बार यह उसके दिमाग के लिए जरूरी खाली जगह होती है।मनोवैज्ञानिक डॉ. शैफाली त्सबरी अपनी किताब द कॉन्शियस पेरेंट में लिखती हैं कि माता-पिता का काम हर पल बच्चे का मनोरंजन करना नहीं, ऐसा वातावरण बनाना है जहां वह खुद अपने अनुभवों से सीख सके।
हो सकता है शुरुआत में बच्चा कुछ मिनट तक इधर-उधर घूमे, लेकिन थोड़ी देर बाद वही बच्चा कागज से कुछ बनाने लगे, किताब उठा ले, चित्र बनाने लगे या अपने खिलौनों से नई कहानी गढ़ने लगे।
