Mental Health Symptoms In Hindi: मानसिक स्वास्थ्य को लेकर आज भी समाज में कई गलत धारणाएं मौजूद हैं। किसी व्यक्ति के शांत रहने, ज्यादा मुस्कुराने या सामान्य तरीके से काम करने को देखकर यह तय नहीं किया जा सकता कि वह अंदर से ठीक है। कई बार व्यक्ति अपने तनाव और परेशानियों को छिपाकर सामान्य जिंदगी जीता रहता है। ऐसे में उसके व्यवहार में आए बदलावों को पहचानना बेहद जरूरी हो जाता है।
मानसिक रोग विशेषज्ञ डॉ. दीपक कुमार ने टाइम्स नाऊ नवभारत के आई ओपनर में कुछ ऐसे साइन बताए हैं, जिनको कभी भी नजरंदाज नहीं करना चाहिए। अगर आपमें या अपनों में ऐसे कोई भी बदलाव दिखते हैं तो तुरंत साइकेट्रिस्ट की मदद लेनी चाहिए। डॉ. दीपक कुमार के अनुसार, मानसिक स्वास्थ्य सिर्फ किसी मानसिक बीमारी की गैरमौजूदगी का नाम नहीं है। इसमें व्यक्ति का सोच पाना, अपनी भावनाओं को संभालना, रोजमर्रा के तनाव से निपटना, अपने काम करना और समाज के साथ सामान्य रूप से जुड़ पाना भी शामिल है।
चेहरे की मुस्कान देखकर न करें मानसिक स्थिति का फैसला
किसी व्यक्ति को देखकर यह पता लगाना आसान नहीं होता कि उसके मन में क्या चल रहा है। हो सकता है कि जो व्यक्ति बाहर से बहुत खुश और मिलनसार दिखाई देता है, वह अंदर से भावनात्मक संघर्ष से गुजर सकता है। मानसिक परेशानी में सबसे बड़ी दिक्कत यही होती है कि व्यक्ति कई बार अपनी समस्या किसी को बताता ही नहीं है। ऐसे में परिवार और दोस्तों की जिम्मेदारी है कि वे अचानक आए व्यवहारिक बदलावों को नजरअंदाज न करें।
ये बदलाव दिखें तो मानसिक स्वास्थ्य पर दें ध्यान
किसी व्यक्ति का सामान्य व्यवहार अचानक बदलने लगे तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। डॉ. दीपक कुमार के अनुसार हर व्यक्ति का एक सामान्य 'सिग्नेचर स्टाइल' होता है। उस व्यवहार में अचानक बदलाव मानसिक परेशानी का संकेत हो सकता है। उदाहरण के लिए पहले बहुत बातचीत करने वाला व्यक्ति अचानक लोगों से कटने लगे, अकेला रहने लगे या गुमसुम बैठा रहे तो ध्यान देना चाहिए। नींद का पैटर्न बदलना, सोशल मीडिया पर जरूरत से ज्यादा समय बिताना या नशे की तरफ बढ़ना भी चिंता की वजह हो सकता है।
बच्चों में पढ़ाई के प्रदर्शन में अचानक गिरावट भी एक संकेत हो सकती है। अगर बच्चा पहले पढ़ाई में अच्छा था और अचानक उसके ग्रेड गिरने लगें तो इसके पीछे मानसिक या भावनात्मक परेशानी की वजह भी हो सकती है।
सफाई, अकेलापन और अजीब व्यवहार को भी न करें नजरअंदाज
कुछ गंभीर मानसिक स्वास्थ्य स्थितियों में व्यक्ति को अपनी व्यक्तिगत साफ-सफाई की भी परवाह नहीं रहती है। वह खुद से बातें कर सकता है, लगातार अकेला रह सकता है या ऐसा व्यवहार कर सकता है जो उसके सामान्य स्वभाव से बिल्कुल अलग हो। किसी व्यक्ति का अचानक जरूरत से ज्यादा सामान इकट्ठा करना, सामाजिक गतिविधियों से पूरी तरह दूर होना या रोजमर्रा की जिम्मेदारियों से पीछे हटना भी परिवार के लिए ध्यान देने वाली बात है। अगर व्यक्ति का व्यवहार उसके सामान्य स्वभाव से हटकर हो रहा है और इसका असर उसकी पढ़ाई, नौकरी या रिश्तों पर पड़ रहा है तो प्रोफेशनल मदद लेने में देरी नहीं करनी चाहिए।
नींद, भूख और रुचि में बदलाव भी हो सकते हैं संकेत
मानसिक स्वास्थ्य की समस्या का असर शरीर के दूसरे हिस्सों पर भी दिखाई दे सकता है। नींद कम या बहुत ज्यादा होना, भूख में बदलाव, किसी काम में रुचि खत्म होना और लोगों से दूरी बनाना ऐसे बदलाव हैं जिन पर ध्यान देना चाहिए। अगर पहले जिस व्यक्ति को दोस्तों के साथ समय बिताना, फिल्म देखना या अपने पसंदीदा काम करना अच्छा लगता था, वह अचानक इन सभी चीजों से दूर होने लगे तो परिवार को उसकी स्थिति समझने की कोशिश करनी चाहिए।
दो हफ्ते तक लगातार उदासी रहे तो इसे सामान्य मूड न समझें
हर व्यक्ति कभी-कभी उदास या मायूस हो सकता है। कुछ घंटों या थोड़े समय की उदासी को डिप्रेशन नहीं कहा जाता है। क्लिनिकल डिप्रेशन में लक्षण लगातार बने रहते हैं और व्यक्ति के रोजमर्रा के जीवन पर असर पड़ने लगता है। करीब दो सप्ताह तक लगातार लो मूड, उदासी या चिड़चिड़ापन बना रहे और इसके साथ थकान, पसंदीदा कामों में रुचि खत्म होना, नींद या भूख में बदलाव और ध्यान लगाने में परेशानी जैसी समस्याएं भी हों तो इसे गंभीरता से लेना चाहिए। ऐसी स्थिति में व्यक्ति के मन में खुद को बेकार समझने, भविष्य को लेकर निराशा और बेबसी जैसे विचार भी आ सकते हैं। आत्महत्या से जुड़े विचार आने पर तुरंत प्रोफेशनल मदद लेना जरूरी है।
बच्चों और बुजुर्गों में अलग तरीके से दिख सकता है डिप्रेशन
हर व्यक्ति अपनी मानसिक परेशानी को 'मैं उदास हूं' कहकर व्यक्त नहीं करता। खासकर बच्चे और बुजुर्ग कई बार मानसिक समस्या को शारीरिक परेशानी के रूप में बताते हैं। बच्चा बार-बार पेट दर्द या सिरदर्द की शिकायत कर सकता है। जांच में कोई स्पष्ट शारीरिक कारण नहीं मिलने के बावजूद समस्या बनी रहे तो उसकी भावनात्मक और मानसिक स्थिति पर भी ध्यान देना चाहिए। बुजुर्गों में भी मानसिक परेशानी कई बार शारीरिक लक्षणों के रूप में सामने आती है। ऐसे मामलों में केवल बार-बार शारीरिक जांच कराने के बजाय मानसिक स्वास्थ्य का आकलन भी जरूरी हो सकता है।
मानसिक बीमारी में शरीर भी होता है प्रभावित
दिमाग और शरीर एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। मानसिक परेशानी का असर नींद, भूख और दूसरे शारीरिक कामकाज पर पड़ सकता है। थायरॉइड जैसी शारीरिक समस्या और मूड के बीच भी संबंध हो सकता है। हाइपोथायरॉइडिज्म में डिप्रेशन और हाइपरथायरॉइडिज्म में एंग्जायटी जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। डायबिटीज और डिप्रेशन के बीच भी संबंध देखा जाता है। यही वजह है कि मानसिक स्वास्थ्य की जांच करते समय व्यक्ति की पूरी मेडिकल हिस्ट्री को देखना जरूरी होता है।
मानसिक बीमारी का इलाज सिर्फ दवा तक सीमित नहीं
मानसिक स्वास्थ्य के इलाज में मरीज की स्थिति के अनुसार दवा, थेरेपी और दूसरे मेडिकल ट्रीटमेंट का इस्तेमाल किया जाता है। कुछ स्थितियों में साइकोलॉजिकल थेरेपी ज्यादा उपयोगी हो सकती है, जबकि गंभीर स्थितियों में दवा और अन्य उपचार की जरूरत पड़ सकती है। इलेक्ट्रोकन्वल्सिव थेरेपी यानी ECT को लेकर भी समाज में कई गलत धारणाएं हैं। आज ECT मेडिकल सेटअप में एनेस्थीसिया के तहत दिया जाता है। मरीज को प्रक्रिया के दौरान दर्द या फिल्मों में दिखाए जाने जैसा अनुभव नहीं होता। इलाज के बाद सिरदर्द या कुछ समय के लिए मेमोरी लैप्स जैसे प्रभाव हो सकते हैं।
वर्कप्लेस का माहौल भी डालता है मानसिक स्वास्थ्य पर असर
ऑफिस में लगातार ज्यादा वर्कलोड, अनुचित व्यवहार, शिकायतों का समाधान न होना और खराब वर्क कल्चर कर्मचारी के मानसिक स्वास्थ्य पर असर डाल सकते हैं। इसके उलट अगर कर्मचारी को काम करने की स्वतंत्रता, काम का उद्देश्य और बेहतर वर्क एनवायरमेंट मिलता है तो उसका जॉब सेटिस्फेक्शन और प्रोडक्टिविटी बेहतर हो सकती है। मानसिक स्वास्थ्य खराब होने पर एब्सेंटिज्म के साथ 'प्रेजेंटिज्म' भी देखने को मिल सकता है, जिसमें कर्मचारी ऑफिस तो आता है, लेकिन काम का आउटपुट प्रभावित होता है।
वर्कप्लेस पर काउंसलिंग, स्ट्रेस मैनेजमेंट वर्कशॉप और जरूरत पड़ने पर मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ तक पहुंच की व्यवस्था कर्मचारियों के लिए मददगार हो सकती है।
सोशल मीडिया और नशे का बढ़ता इस्तेमाल भी ध्यान देने लायक
अगर किसी व्यक्ति का सोशल मीडिया इस्तेमाल अचानक बहुत बढ़ जाए और साथ ही उसके व्यवहार, नींद या सामाजिक जीवन में बदलाव आने लगे तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। मानसिक स्वास्थ्य और सोशल मीडिया का संबंध दोनों दिशाओं में देखा जा सकता है। ज्यादा सोशल मीडिया इस्तेमाल मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है और मानसिक परेशानी से जूझ रहा व्यक्ति भी सोशल मीडिया पर ज्यादा समय बिताने लग सकता है। नशे की तरफ बढ़ता झुकाव भी परिवार के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है।
मानसिक परेशानी दिखे तो न करें इंतजार
मानसिक स्वास्थ्य में सबसे महत्वपूर्ण बात समस्या की पहचान और समय पर मदद लेना है। अगर व्यक्ति के व्यवहार में लगातार बदलाव हो रहा है, नींद और भूख बिगड़ रही है, पसंदीदा कामों में रुचि खत्म हो रही है, पढ़ाई या नौकरी प्रभावित हो रही है या रिश्तों में परेशानी बढ़ रही है तो इसे सिर्फ मूड खराब होना मानकर छोड़ना ठीक नहीं है। मानसिक स्वास्थ्य की समस्या शर्म की बात नहीं है। जिस तरह शरीर की बीमारी के लिए डॉक्टर से सलाह ली जाती है, उसी तरह लगातार मानसिक परेशानी होने पर साइकेट्रिस्ट या क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट से संपर्क किया जा सकता है।
किसी भी उम्र में हो सकती है मेंटल हेल्थ की समस्या
मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या किसी एक उम्र या जेंडर तक सीमित नहीं है। बच्चे, युवा, बुजुर्ग, पुरुष, महिलाएं और ट्रांसजेंडर व्यक्ति भी मानसिक स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का सामना कर सकते हैं। हालांकि अलग-अलग लोगों में लक्षण दिखाई देने का तरीका अलग हो सकता है। महिलाओं में प्रेग्नेंसी, पोस्टपार्टम पीरियड और मेनोपॉज जैसे जीवन के अलग-अलग चरण मानसिक स्वास्थ्य पर असर डाल सकते हैं। वहीं पुरुषों और महिलाओं में मदद लेने की प्रवृत्ति में भी अंतर देखा जाता है। हालांकि महिलाएं मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए पुरुषों की तुलना में ज्यादा हेल्प सीक करती हैं।
भारत में सबसे बड़ी समस्या ट्रीटमेंट गैप
मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में भारत के सामने बड़ी चुनौती इलाज तक लोगों की पहुंच की है। इसका कारण मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, जागरूकता की कमी और सामाजिक स्टिग्मा है। ट्रीटमेंट गैप का मतलब उन लोगों और इलाज हासिल करने वाले लोगों के बीच का अंतर है जिन्हें मानसिक स्वास्थ्य सहायता की जरूरत है लेकिन वे इलाज तक नहीं पहुंच पाते है। इसके चलते बड़ी संख्या में लोग मानसिक स्वास्थ्य समस्या के बावजूद इलाज नहीं ले पाते है। भारत के ग्रामीण और छोटे शहरों में विशेषज्ञ सेवाओं की उपलब्धता भी एक चुनौती बनी हुई है। मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं लंबे समय तक बड़े शहरों तक ज्यादा सीमित रही हैं।
'पागल' समझे जाने के डर से लोग नहीं जाते डॉक्टर के पास
मानसिक बीमारी को लेकर समाज में मौजूद स्टिग्मा इलाज में बड़ी रुकावट बनता है। किसी व्यक्ति के मन में यह डर रहता है कि अगर वह साइकेट्रिस्ट के पास गया तो लोग उसे 'पागल' समझेंगे। यही सोच कई लोगों को इलाज से दूर रखती है। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ के पास जाना केवल गंभीर मानसिक बीमारी की स्थिति में जरूरी नहीं है। समस्या की शुरुआती पहचान और सही प्रोफेशनल से समय पर मदद लेने से स्थिति को बिगड़ने से रोका जा सकता है।
साइकेट्रिस्ट और साइकोलॉजिस्ट में क्या है अंतर
साइकेट्रिस्ट मेडिकल डॉक्टर होता है। वह मेडिकल डिग्री के बाद साइकेट्री में विशेषज्ञता हासिल करता है और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का मेडिकल असेसमेंट और ट्रीटमेंट करता है। क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट का बैकग्राउंड साइकोलॉजी में होता है। वह मनोवैज्ञानिक असेसमेंट और थेरेपी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। दोनों के काम पूरी तरह अलग-अलग नहीं हैं। मानसिक स्वास्थ्य के अच्छे सेटअप में साइकेट्रिस्ट, साइकोलॉजिस्ट, साइकेट्रिक सोशल वर्कर और साइकेट्रिक नर्स मिलकर मरीज की जरूरत के हिसाब से काम करते हैं। गंभीर स्थिति, जैसे साइकोसिस, ड्रग डिपेंडेंस, सुसाइडल रिस्क या ऐसी स्थिति जिसमें अस्पताल में भर्ती करने की जरूरत पड़ सकती है, उसमें साइकेट्रिस्ट से संपर्क करना जरूरी होता है।
