Dhobiya Dance: सोशल मीडिया पर इन दिनों एक धुन कानों को सुकून दे रही है, लेकिन नजरें कहीं और अटक रही हैं। रंगीन कपड़े पहने कलाकार हैं। कदमों में गजब की फुर्ती है। चेहरे पर ऐसी मस्ती, जैसे कैमरा सामने नहीं बल्कि गांव का कोई मेला लगा हो। पीछे भोजपुरी गीत सुनाई देता है और उसी के बीच जापान के पारंपरिक वाद्य की खनक अपनी मौजूदगी दर्ज करा देती है।
इस वायरल गाने का नाम ‘चंपवा की कलियां’ है जिसे म्यूजिक प्रोजेक्ट माटी बानी ने तैयार किया है। गाने में गाजीपुर के लोक कलाकार जीवन राम और जापानी संगीतकार सायो कोमाडा की जुगलबंदी सुनाई दे रही है। गाने में निराली कार्तिक की मधुर आवाज सुनाई देती है। वहीं जापानी वाद्य शमिसेन और भोजपुरी लोकधुन का मेल पहली बार में ही ध्यान खींचता है।
मगर वीडियो का असली रंग वे कलाकार भरते हैं, जो पूरे जोश के साथ एक फोक डांस कर रहे हैं। धुन जापान से जुड़ती है, लेकिन कदम सीधे पूर्वांचल की मिट्टी तक ले जाते हैं। और सवाल उठाते हैं कि आखिर ये डांस है क्या।
धुन जापानी, कदम ठेठ पूर्वांचली
पहली नजर में जापानी संगीत और भोजपुरी लोकनृत्य का मेल थोड़ा अटपटा लग सकता है। आखिर दोनों के बीच हजारों किलोमीटर की दूरी है। भाषा अलग, पहनावा अलग और संगीत का मिजाज भी अलग। इसके बावजूद जब ‘चंपवा की कलियां’ बजता है तो कहीं कोई जोड़ जबरदस्ती का महसूस नहीं होता।
सायो कोमाडा शमिसेन बजाती हैं जो कि जापान का पारंपरिक तीन तार वाला वाद्य है। इसकी आवाज तीखी, साफ और खनकदार होती है। इसी खनक के बीच गाने में भोजपुरी गायकी और पूर्वांचल के इस प्रसिद्ध लोक नृत्य के तेज कदम दिखाई देते हैं।
वीडियो में कलाकार जिस बेफिक्री से नाच रहे हैं, वह इसकी सबसे बड़ी खूबी है। न कोई जरूरत से ज्यादा चमकदार सेट और न बनावटी भाव। लगता है जैसे गांव की चौपाल पर चल रही प्रस्तुति में कैमरा चुपके से पहुंच गया हो।
आखिर क्या है ये फोक डांस
यह डांस दरअसल पूर्वांचल का एक पारंपरिक लोकनृत्य है। इसे वहां की पंरपरा में Dhobia Dance कहते हैं। एक समय था जब शादी-विवाह, त्योहार और गांव के मेलों में इस नृत्य के बिना रौनक अधूरी लगती थी।
यह केवल तय कदमों पर किया जाने वाला नृत्य नहीं है। इसमें लोकगीत हैं, अभिनय है, सवाल-जवाब हैं और खूब सारा हंसी-मजाक भी। कलाकार कभी समूह में एक साथ कदम मिलाते हैं तो कभी एक-दूसरे से संवाद करते हुए नाचते हैं। उनकी भाव-भंगिमाएं भी कहानी का हिस्सा बन जाती हैं।
यानी यहां सिर्फ पैर नहीं थिरकते। आंखें, हाथ, चेहरा भाव बनाते हैं और नृत्य करने वाले की पूरी देह इन भावों को अपनी लचक और ठुमक से समझाती है।
कहां से आया है ये नृत्य
यह नृत्य एक विशेष समाज के दैनिक जीवन, श्रम और सामाजिक अनुभवों से निकलकर विकसित हुआ। इसके गीतों में गांव का जीवन, प्रेम, विवाह, परिवार और रिश्तों की नोकझोंक सुनाई देती है।
कई प्रस्तुतियों में सामाजिक स्थितियों पर हल्का-सा व्यंग्य भी किया जाता है। कलाकार बात को गंभीर भाषण बनाकर नहीं कहते। वे उसे गीत, हाव-भाव और मजेदार संवाद में पिरो देते हैं। दर्शक हंसते भी हैं और बात समझ भी जाते हैं। वैसे भारतीय लोककलाओं का पुराना हुनर भी यही रहा है- बड़ी बात को बड़ी आसानी से कह देना।

आम जीवन का चुटीला अंदाज दिखाता है धोबिया नृत्य
गाजीपुर से जुड़ी है खास पहचान
यह नृत्य मुख्य रूप से पूर्वी उत्तर प्रदेश यानी पूर्वांचल की पहचान माना जाता है। गाजीपुर में इसकी परंपरा खास तौर पर लोकप्रिय रही है। इसके अलावा वाराणसी, चंदौली, जौनपुर, आजमगढ़, मऊ और बलिया के आसपास भी इसके अलग-अलग रूप देखने को मिलते हैं।
इलाका बदलते ही बोली, गीत और प्रस्तुति में थोड़ा फर्क आ सकता है। कहीं गायकी का हिस्सा अधिक मजबूत होता है तो कहीं नृत्य और अभिनय ज्यादा प्रभावी दिखता है। हालांकि इसकी बुनियादी आत्मा एक ही रहती है- साथ मिलकर नाचना, गीतों में किस्सा सुनाना और दर्शकों को प्रस्तुति से जोड़े रखना।
गाजीपुर जिला प्रशासन की वेबसाइट पर भी धोबिया नृत्य का उल्लेख जिले की प्रमुख लोक परंपराओं में किया गया है। ‘चंपवा की कलियां’ में गाजीपुर के कलाकारों की मौजूदगी इसलिए केवल संयोग नहीं है। बल्कि वे अपने क्षेत्र की जानी-पहचानी कला को ही दुनिया के सामने ला रहे हैं।
कदम आसान दिखते हैं, करना इतना आसान नहीं
धोबिया नृत्य देखते हुए लग सकता है कि कलाकार बस मस्ती में झूम रहे हैं। असल में इसके लिए अच्छी लय, दमखम और समूह के साथ तालमेल की जरूरत होती है। कलाकारों को गीत की गति के अनुसार कदम बदलने पड़ते हैं। साथ में चेहरे के भाव और अभिनय भी बनाए रखना होता है।
प्रस्तुति के दौरान कलाकार गोल घेरा बना सकते हैं या आमने-सामने खड़े होकर नाच सकते हैं। कभी तेजी से पैर उठाए जाते हैं, कभी शरीर को झुकाकर भाव दिखाया जाता है और कभी घूमते हुए अगली पंक्ति उठाई जाती है।
इसमें मंच की नाप से अधिक जरूरी कलाकारों के बीच की समझ होती है। एक कलाकार ने जरा-सा इशारा किया और बाकी पूरी मंडली उसी रंग में आ गई।
बीच में यह घोड़ा कहां से आ गया
वीडियो में नाचते कलाकारों के बीच घोड़े जैसी आकृति भी दिखाई देती है। इसे देखकर कुछ लोग इसे ही धोबिया नृत्य समझ सकते हैं, लेकिन यहां एक और लोक परंपरा कहानी में प्रवेश करती है- कठघोड़वा नाच।

गाने में कठघोड़वा नाच की झलक भी दिखती है
कठघोड़वा में कलाकार अपनी कमर के चारों ओर बांस, कपड़े और सजावटी सामान से बना घोड़े का ढांचा बांधता है। जब वह नाचता है तो देखने वाले को लगता है कि कोई सजा-धजा घोड़ा ताल पर थिरक रहा है।
कठघोड़वा अपने आप में एक अलग लोकनृत्य शैली है। हालांकि मेलों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में इसे धोबिया नृत्य के साथ भी पेश किया जाता रहा है। ‘चंपवा की कलियां’ में दोनों की झलक मिलना वीडियो को और रंगीन बना देता है। एक ही फ्रेम में पूर्वांचल की दो लोक परंपराएं नजर आ जाती हैं।
गीतों में प्रेम भी, तकरार भी
धोबिया नृत्य में गाए जाने वाले गीत आम जिंदगी से उठाए जाते हैं। कहीं प्रेम की बात होती है, कहीं शादी की छेड़छाड़ और कहीं घर-परिवार की हल्की-फुल्की शिकायतें। पात्र भी इतने जाने-पहचाने होते हैं कि दर्शक तुरंत उनसे जुड़ जाते हैं।
एक कलाकार पंक्ति उठाता है और बाकी मंडली उसे दोहराती है। कई बार गाने के भीतर ही सवाल पूछा जाता है और अगली पंक्ति में उसका मजेदार जवाब मिलता है। इसी बहाने कहानी भी आगे बढ़ती रहती है।
गीतों में भाषा की चमक-दमक से ज्यादा स्थानीय बोली का स्वाद जरूरी होता है। आवाज कच्ची हो सकती है, मगर भाव पक्का होता है। शायद इसी कारण ऐसी गायकी सीधे मन तक पहुंचती है।
वायरल धुन ने फिर दिखाई लोककला की ताकत
‘चंपवा की कलियां’ माटी बानी के ‘Folk Unmapped’ प्रोजेक्ट की प्रस्तुति है। इसमें निराली कार्तिक की आवाज, जीवन राम का पूर्वांचली लोक रंग और सायो कोमाडा के शमिसेन वाद्य के साथ पिरोई गई है। जापानी वाद्य की खनक गाने को नया बनाती है, लेकिन धोबिया कलाकारों की ऊर्जा इसे यादगार बना देती है। वीडियो देखने के बाद धुन कानों में रह जाती है और नृत्य आंखों में।
सबसे अच्छी बात यह है कि इस बहाने लोग धोबिया नृत्य को नाम से पहचान रहे हैं। जिस लोककला का मंच कभी गांव का मेला, चौपाल या शादी का आंगन हुआ करता था, वह आज सोशल मीडिया की टाइमलाइन पर घूम रही है।
इस वीडियो ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि लोककला को नया बनाने के लिए उसकी मिट्टी छुड़ाना जरूरी नहीं। उसका असली रंग बचाकर बस दुनिया के सामने रखने की जरूरत है। फिर चाहे पीछे ढोलक बजे या जापान का शमिसेन-पूर्वांचल के कलाकार ताल मिलाने का रास्ता खोज ही लेते हैं।
