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Psychology: ग्रुप फोटो में खड़े होने से क्यों कतराते हैं कुछ बच्चे? खुद Photo खींचना करते हैं पसंद

जरूरी नहीं कि बच्चा लोगों से घुलना-मिलना पसंद नहीं करता। हो सकता है कि उसे दूसरों के साथ रहना अच्छा लगता हो, लेकिन सबकी नजरों का केंद्र बनना पसंद न हो।

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क्यों कुछ बच्चों को फोटो खिंचवाने से ज्यादा फोटो खींचने में आता है मजा (AI Generated and Newsroom verified image)

घर में कोई पारिवारिक समारोह हो या दोस्तों के साथ घूमने का मौका, ग्रुप फोटो खिंचवाना अक्सर हर किसी की पहली पसंद होता है। लोग एक साथ खड़े होते हैं, मुस्कुराते हैं और कैमरे की तरफ देखते हैं। लेकिन इसी बीच कोई बच्चा ऐसा भी होता है, जो फोटो में शामिल होने से साफ मना कर देता है। वह सबसे अलग हटकर खड़ा हो जाता है। हैरानी तब होती है, जब कुछ देर बाद वही बच्चा कैमरा हाथ में लेकर दूसरों की तस्वीरें खींचने लगता है। आखिर ऐसा क्यों होता है?

मनोविज्ञान के नजरिए से देखें तो इस व्यवहार के पीछे कई वजहें हो सकती हैं। जरूरी नहीं कि बच्चा लोगों से घुलना-मिलना पसंद नहीं करता। हो सकता है कि उसे दूसरों के साथ रहना अच्छा लगता हो, लेकिन सबकी नजरों का केंद्र बनना पसंद न हो।

सबकी नजरें खुद पर होना क्यों लगता है मुश्किल?

ग्रुप फोटो कुछ बच्चों के लिए असहज करने वाला अनुभव बनता है। जब सभी लोग उन्हें देखते हैं, मुस्कुराने के लिए कहते हैं या अपनी पसंद के मुताबिक खड़ा होने को कहते हैं, तो बच्चा दबाव महसूस करता है। उसे लगता है कि लोग उसके चेहरे, कपडों या व्यवहार पर ध्यान दे रहे हैं।

इंटरनेशनल जर्नल ऑफ बिहेवियरल डेवलपमेंट में प्रकाशित एक अध्ययन में बच्चों के भीतर झिझक पैदा करने वाली स्थितियों पर चर्चा की गई। इसमें तीन प्रमुख वजहें सामने आईं- अनजान सामाजिक माहौल, दूसरों की नकारात्मक राय का डर और सबके सामने ध्यान का केंद्र बनना। यानी बच्चा किसी सामाजिक गतिविधि में शामिल तो होना चाहता है, लेकिन सबके सामने आने से हिचक सकता है।

कैमरे के पीछे रहना क्यों लगता है आसान?

जब बच्चा खुद कैमरा पकड़ता है, तो उसके पास एक स्पष्ट भूमिका होती है। वह तय कर सकता है कि तस्वीर कब खींचनी है, कैमरा किस तरफ रखना है और कौन कहां खड़ा होगा। इस तरह वह परिवार की गतिविधि का हिस्सा भी बना रहता है और उसे खुद सबकी निगाहों का सामना भी नहीं करना पड़ता।

कुछ बच्चों को कैमरे के पीछे रहकर चीजों को संभालना अच्छा लगता है। उन्हें दूसरों की तस्वीरें लेना, सही एंगल चुनना या सबको एक साथ खड़ा करना मजेदार लग सकता है। इसलिए फोटो में शामिल न होने और तस्वीरें खींचने के बीच का यह अंतर विरोधाभास नहीं है।

बच्चे को जिद्दी या शर्मीला मानने की गलती न करें

अगर बच्चा ग्रुप फोटो खिंचवाने से मना करता है, तो इसका मतलब यह नहीं कि वह बदतमीज, जिद्दी या आत्मविश्वास की कमी से जूझ रहा है। हो सकता है कि वह उस समय थका हो, उसे पोज देना पसंद न हो या वह अपनी मर्जी से गतिविधि में शामिल होना चाहता हो।

अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स के मुताबिक, कुछ बच्चों को सामाजिक माहौल में सहज होने के लिए दूसरों की तुलना में ज्यादा समय चाहिए होता है। इसलिए एक फोटो के आधार पर बच्चे के स्वभाव का फैसला करना ठीक नहीं है।

माता-पिता क्या कर सकते हैं?

सबसे पहले बच्चे पर फोटो खिंचवाने का दबाव न डालें। अगर वह सामने नहीं आना चाहता, तो उससे पूछें कि क्या वह तस्वीर लेना चाहेगा या सबको सही जगह खड़ा करने में मदद करेगा। बार-बार मनाना, मजाक उड़ाना या यह कहना कि सब उसका इंतजार कर रहे हैं, उसकी झिझक बढा सकता है।

बच्चे को बाद में फोटो में शामिल होने का मौका भी दिया जा सकता है। हो सकता है कि दूसरों को देखकर वह खुद तैयार हो जाए। अगर वह फिर भी मना करे, तो उसकी पसंद का सम्मान करें। हां, अगर बच्चा केवल फोटो से ही नहीं, बल्कि स्कूल, दोस्तों और दूसरी सामाजिक गतिविधियों से भी लगातार बचता है और इस वजह से परेशान दिखता है, तो माता-पिता को उसकी भावनाओं को समझने की कोशिश करनी चाहिए। जरूरत पड़ने पर किसी विशेषज्ञ से सलाह ली जा सकती है।

Suneet Singh
सुनीत सिंहauthor

सुनीत सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में डिप्टी न्यूज एडिटर के रूप में कार्यरत हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन में स्पेशल स्टोरीज प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहे हैं। टीवी और डिजिटल पत्रकारिता में 13 वर्षों के अनुभव के साथ, सुनीत उन बहुमुखी पत्रकारों में शामिल हैं जिन्होंने न्यूजरूम और फील्ड—दोनों मोर्चों पर खुद को साबित किया है। माइक, कैमरा और एडिटिंग डेस्क तीनों से उनकी सहज जुगलबंदी ने उन्हें एक संतुलित और विश्वसनीय मीडिया प्रोफेशनल के रूप में स्थापित किया है। पिछले 10 वर्षों से सुनीत लाइफस्टाइल, लिटरेचर, सिनेमा और संस्कृति से जुड़ी गहन व विश्लेषणात्मक स्टोरीज लिखते रहे हैं और अबतक 12,000 से अधिक आर्टिकल पब्लिश कर चुके हैं। उनकी लेखन शैली गहराई, मौलिक दृष्टिकोण और रिसर्च-आधारित प्रस्तुति से पहचानी जाती है। वे विषयों की बारीकियों को पकड़कर उन्हें सरल, प्रभावी और पाठकों से जुड़ने वाली भाषा में ढालने में दक्ष हैं।

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