Special Economic Zones Explained : भारत में निर्यात बढ़ाने, विदेशी निवेश आकर्षित करने और रोजगार के नए अवसर पैदा करने के लिए विशेष आर्थिक क्षेत्र यानी स्पेशल इकोनॉमिक जोन (SEZ) बनाए गए। इन क्षेत्रों को सामान्य औद्योगिक क्षेत्रों के मुकाबले कुछ विशेष सुविधाएं दी जाती हैं, ताकि कंपनियां आसानी से उत्पादन कर सकें और अपने प्रोडक्ट्स को दूसरे देशों में बेच सकें। समय के साथ भारत के SEZs का दायरा बढ़ा है। शुरुआत में इनका ध्यान मुख्य रूप से निर्यात पर था, लेकिन अब सरकार इन्हें सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, सूचना प्रौद्योगिकी और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवाओं जैसे क्षेत्रों से जोड़ने की कोशिश कर रही है। हालांकि SEZs की कहानी केवल विकास और उपलब्धियों तक सीमित नहीं है। कई क्षेत्रों में आज भी काम शुरू नहीं हो पाया है। कहीं जमीन का सही इस्तेमाल नहीं हो रहा, तो कहीं सरकारी मंजूरियों और सीमा शुल्क से जुड़ी प्रक्रियाएं कारोबार के लिए मुश्किल बनी हुई हैं। ऐसे में सवाल है कि भारत में SEZs की शुरुआत कैसे हुई, इनके सामने कौन-सी चुनौतियां हैं और किन सुधारों से इन्हें नई रफ्तार मिल सकती है?
क्या हैं विशेष आर्थिक क्षेत्र और कैसे हुई इनकी शुरुआत?
विशेष आर्थिक क्षेत्र यानी SEZ ऐसे निर्धारित औद्योगिक क्षेत्र होते हैं, जहां कंपनियों को कारोबार, उत्पादन और निर्यात बढ़ाने के लिए कुछ खास सुविधाएं दी जाती हैं। इनका उद्देश्य निवेश आकर्षित करना, रोजगार पैदा करना, बेहतर बुनियादी ढांचा तैयार करना और देश के निर्यात को बढ़ावा देना है। SEZ को कुछ अधिकृत गतिविधियों के लिए सीमा शुल्क के मामले में भारत के सामान्य सीमा शुल्क क्षेत्र से अलग माना जाता है। हालांकि, ये भारतीय संप्रभुता और देश के कानूनों के दायरे में ही आते हैं। भारत में इस व्यवस्था की शुरुआत साल 1965 में हुई थी। उस समय गुजरात के कांडला में एशिया का पहला निर्यात प्रसंस्करण क्षेत्र (EPZ) स्थापित किया गया था। इसका मकसद था कि कंपनियों को एक ऐसा क्षेत्र मिले, जहां से वे आसानी से अपने उत्पादों का निर्यात कर सकें। इसके बाद 1973 में मुंबई में सांताक्रूज इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात प्रसंस्करण क्षेत्र (SEEPZ) बनाया गया। शुरुआत में यहां इलेक्ट्रॉनिक्स के उत्पादन पर ध्यान दिया गया, लेकिन 1987-88 में इसका विस्तार रत्न और आभूषण उद्योग तक कर दिया गया। हालांकि, उस समय कंपनियों को कई तरह की सरकारी मंजूरियां लेनी पड़ती थीं। बुनियादी सुविधाओं की कमी और प्रोत्साहनों को लेकर अनिश्चितता के कारण EPZ मॉडल उम्मीद के मुताबिक प्रभावी नहीं हो पाया। इसी वजह से एक व्यापक और आसान व्यवस्था की जरूरत महसूस हुई।
साल 2000 में बदली नीति, 2006 में मिला कानूनी आधार
भारत सरकार ने अप्रैल 2000 में नई SEZ नीति की घोषणा की। इसका मकसद पुराने EPZ मॉडल की कमियों को दूर करना था। नई नीति के तहत बेहतर सड़क, बिजली और अन्य बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने, सरकारी प्रक्रियाएं आसान बनाने और घरेलू तथा विदेशी निवेश को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया। इसके बाद नवंबर 2000 से फरवरी 2006 तक SEZ का कामकाज विदेश व्यापार नीति और दूसरे संबंधित कानूनों के तहत चलता रहा। फरवरी 2006 में विशेष आर्थिक क्षेत्र अधिनियम, 2005 और SEZ नियम, 2006 लागू हुए। इसके साथ ही SEZ व्यवस्था को मजबूत कानूनी आधार मिला। इस कानून के तहत कंपनियों के लिए सिंगल विंडो मंजूरी यानी सिंगल विंडो क्लीयरेंस, आसान प्रक्रियाएं और खुद से प्रमाणन जैसी सुविधाएं शुरू की गईं। इसका उद्देश्य यह था कि कंपनियों को अलग-अलग सरकारी विभागों के चक्कर कम लगाने पड़ें।
IT और सेवाओं के क्षेत्र में बढ़ा SEZs का दायरा
साल 2007 से 2018 के बीच SEZs का विस्तार केवल सामान बनाने वाले उद्योगों तक सीमित नहीं रहा। सूचना प्रौद्योगिकी (IT), IT से जुड़ी सेवाओं, दवा उद्योग, जैव प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और भंडारण जैसे क्षेत्रों ने भी इसमें जगह बनाई। इस दौरान IT और IT से जुड़ी सेवाओं का दबदबा तेजी से बढ़ा। साल 2008-09 में निर्यात करने वाले 98 SEZs में से 60 IT और IT से जुड़ी सेवाओं के क्षेत्र में थे। दिसंबर 2025 के आंकड़ों के मुताबिक, 276 परिचालित SEZs में से 167 संयुक्त IT, IT से जुड़ी सेवाओं, इलेक्ट्रॉनिक हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर कैटेगरी में थे। इससे पता चलता है कि भारत के SEZs में तकनीक और सेवाओं की भूमिका कितनी बढ़ गई है। हालांकि, इस दौरान कुछ नीतिगत बदलाव भी हुए। वित्त अधिनियम 2011 के तहत आकलन वर्ष 2012-13 से SEZ की इकाइयों और विकासकर्ताओं पर न्यूनतम वैकल्पिक कर (MAT) लागू किया गया। वहीं, 2013 में बहु-उत्पाद SEZ के लिए न्यूनतम जमीन की जरुरत 1,000 हेक्टेयर से घटाकर 500 हेक्टेयर और क्षेत्र विशेष के SEZ के लिए 100 से घटाकर 50 हेक्टेयर कर दी गई। साल 2018 में बाबा कल्याणी समिति ने SEZ व्यवस्था की समीक्षा की। समिति ने वैश्विक व्यापार नियमों के अनुरूप बदलाव करने, खाली पड़ी जमीन का बेहतर इस्तेमाल करने और SEZs को औद्योगिक गलियारों से जोड़ने पर जोर दिया।
डिजिटल कामकाज और सेमीकंडक्टर पर सरकार का जोर
साल 2019 से 2024 के बीच SEZ नियमों में डिजिटल सेवाओं और बदलते कामकाज के तरीकों के अनुसार बदलाव किए गए। SEZ नियमों के नियम 43A के तहत पात्र कर्मचारियों को घर से काम करने की सुविधा दी गई। दिसंबर 2024 में हुए संशोधन के बाद इस व्यवस्था की अनुमति 31 दिसंबर 2027 तक बढ़ा दी गई। इसके बाद सरकार का ध्यान सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बनाने जैसे रणनीतिक उद्योगों पर बढ़ा। जून 2025 में नियमों में बदलाव करके केवल सेमीकंडक्टर या इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बनाने के लिए स्थापित SEZs की न्यूनतम जमीन की जरुरत 50 हेक्टेयर से घटाकर 10 हेक्टेयर कर दी गई। इसका मकसद ऐसे उद्योगों के लिए निवेश और उत्पादन शुरू करना आसान बनाना है, जिनमें अत्याधुनिक तकनीक और बड़े निवेश की जरुरत होती है। गुजरात के साणंद में माइक्रॉन का पैकेजिंग SEZ और कर्नाटक के धारवाड़ में एक्वस का इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट SEZ इसके उदाहरण हैं। अप्रैल 2026 में धोलेरा में टाटा सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग के लिए 66 हेक्टेयर का SEZ अधिसूचित किया गया, जिसमें 91,000 करोड़ रुपये के प्रस्तावित निवेश की बात कही गई है।
निर्यात और निवेश में कितनी हुई बढ़ोतरी?
भारत के SEZs ने निर्यात के मामले में लंबा सफर तय किया है। साल 2005-06 में इन क्षेत्रों से 22,840 करोड़ रुपये का निर्यात हुआ था। यह आंकड़ा बढ़कर 2025-26 में 16.36 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गया। मार्च 2026 की सरकारी तथ्यपत्रिका के अनुसार, देश में 368 SEZ अधिसूचित थे, जिनमें से 277 परिचालन में थे। इन क्षेत्रों में करीब 7.60 लाख करोड़ रुपये का निवेश हुआ था और करीब 32.61 लाख लोगों को रोजगार मिला था। ये आंकड़े बताते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था में SEZs की भूमिका बढ़ी है। हालांकि, इनके सामने कई ऐसी समस्याएं हैं, जिनका समाधान किए बिना इनकी पूरी क्षमता का इस्तेमाल करना मुश्किल है।
विशेष आर्थिक क्षेत्र क्यों नहीं पकड़ पा रहे पूरी रफ्तार? समझें विकास, खामियां और सुधारों का पूरा गणित (तस्वीर-AI)
SEZs के सामने सबसे बड़ी चुनौतियां क्या हैं?
1. मंजूरी मिलने के बाद भी शुरू नहीं होता काम:- SEZ के लिए सरकारी मंजूरी मिलना इस बात की गारंटी नहीं है कि वहां उत्पादन या कारोबार भी शुरू हो जाएगा। अगस्त 2026 के एक संसदीय जवाब के मुताबिक, देश के 372 अधिसूचित SEZs में से 95 में कामकाज शुरू नहीं हुआ था। यानी करीब एक चौथाई क्षेत्र गैर-परिचालित थे। इसके पीछे सरकारी मंजूरियों में देरी, टैक्स प्रोत्साहनों में बदलाव और खराब कारोबारी माहौल जैसे कारण बताए गए। इससे जमीन और बुनियादी सुविधाएं बेकार पड़ी रहती हैं और निवेशकों का भरोसा भी प्रभावित होता है।
2. कुछ राज्यों में ही सिमटा विकास:- SEZs का विकास पूरे देश में एक समान नहीं हुआ है। जुलाई 2026 के आंकड़ों के अनुसार, तमिलनाडु, कर्नाटक, तेलंगाना और महाराष्ट्र में कुल 161 परिचालित SEZ थे। यह देश के कुल परिचालित क्षेत्रों का करीब 58 फीसदी था। दूसरी ओर, बिहार, मणिपुर और नागालैंड में एक भी परिचालित SEZ नहीं था। इससे साफ है कि जिन राज्यों में पहले से बेहतर सड़क, बिजली, कुशल कर्मचारी और उद्योग मौजूद हैं, वहां निवेश आकर्षित करना आसान है। पिछड़े औद्योगिक क्षेत्रों को इसका उतना लाभ नहीं मिल पा रहा है।
3. जमीन का पूरा इस्तेमाल नहीं:- SEZ के लिए बड़ी मात्रा में जमीन आवंटित की जाती है, लेकिन कई बार वहां उत्पादन शुरू नहीं हो पाता। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की 2014 की रिपोर्ट के मुताबिक, 45,635 हेक्टेयर अधिसूचित जमीन में से केवल 28,488 हेक्टेयर पर ही कामकाज शुरू हुआ था। यानी करीब 62.42 फीसदी जमीन का ही परिचालन में इस्तेमाल हो रहा था। जमीन का इस्तेमाल न होने से आर्थिक नुकसान के साथ स्थानीय लोगों की आजीविका और कृषि भूमि पर भी असर पड़ सकता है।
4. श्रम-प्रधान उद्योगों की कम भागीदारी:- SEZs में IT और तकनीक से जुड़े उद्योगों का विस्तार तेजी से हुआ, लेकिन कपड़ा, जूते और चमड़ा जैसे रोजगार देने वाले उद्योगों का विकास सीमित रहा। दिसंबर 2025 के आंकड़ों में केवल छह कपड़ा एवं परिधान SEZ और चार फुटवियर एवं चमड़ा SEZ परिचालित थे। ऐसे उद्योगों की कम मौजूदगी से कम कौशल वाले श्रमिकों के लिए रोजगार के अवसर भी सीमित हो सकते हैं।
5. घरेलू बाजार से जुड़ने में मुश्किल:- SEZ और घरेलू प्रशुल्क क्षेत्र (DTA) के बीच सीमा शुल्क से जुड़ी प्रक्रियाएं कई बार कंपनियों के लिए मुश्किल पैदा करती हैं। SEZ में बनी वस्तुओं को भारत के घरेलू बाजार में बेचने, वापस लेने या उनकी मरम्मत कराने के लिए अलग-अलग नियमों का पालन करना पड़ता है। सरकार ने कुछ रियायतें दी हैं, लेकिन इनका लाभ सभी क्षेत्रों को समान रूप से नहीं मिलता।
6. नीतियों में अनिश्चितता और सरकारी प्रक्रियाएं:- कंपनियों को लंबे समय के निवेश के लिए स्थिर नीतियों की जरूरत होती है। लेकिन निर्यात पर मिलने वाली कुछ राहत सीमित अवधि के लिए होती है। इससे कंपनियों को भविष्य की लागत और मुनाफे का अनुमान लगाने में परेशानी हो सकती है। इसके अलावा, विकास आयुक्त, सीमा शुल्क विभाग, राज्य सरकार और अन्य एजेंसियों से मंजूरी लेने की प्रक्रिया भी कई बार लंबी हो जाती है।
SEZs को नई रफ्तार देने के लिए क्या सुधार जरूरी?
- भारत के SEZs को मजबूत बनाने के लिए सबसे पहले इनके प्रदर्शन को केवल निर्यात के आधार पर नहीं देखना चाहिए। यह भी देखना जरूरी है कि किसी क्षेत्र में कितना नया निवेश आया, कितने लोगों को रोजगार मिला, स्थानीय कंपनियों को कितना काम मिला और उत्पादन में कितना मूल्य जोड़ा गया। बाबा कल्याणी समिति ने भी SEZs को रोजगार और आर्थिक क्षेत्रों के रूप में विकसित करने की सिफारिश की थी।
- दूसरा, सरकार को प्रस्तावित उद्यम और सेवा केंद्र विकास (DESH) विधेयक, 2022 के उपयोगी प्रावधानों पर दोबारा विचार करना चाहिए। इसमें आसान मंजूरी, घरेलू बाजार से बेहतर जुड़ाव और विवादों को सुलझाने की बेहतर व्यवस्था जैसे प्रस्ताव शामिल हैं। इन प्रावधानों को मौजूदा SEZ व्यवस्था में भी शामिल किया जा सकता है।
- तीसरा, निवेशकों को अगले पांच साल की नीतियों और कर से जुड़ी सुविधाओं को लेकर स्पष्ट जानकारी मिलनी चाहिए। बार-बार नियम बदलने से कंपनियों की लंबी अवधि की योजनाएं प्रभावित होती हैं। इसलिए बड़े बदलावों की जानकारी पहले से देना जरूरी है।
इसके साथ ही SEZ और छोटे तथा मझोले उद्योगों यानी MSME के बीच मजबूत संबंध बनाने चाहिए। बड़ी कंपनियों को स्थानीय छोटे उद्योगों से सामान खरीदने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है। छोटे उद्योगों को बेहतर गुणवत्ता, तकनीक और वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने से स्थानीय कारोबार को भी फायदा होगा।
सरकारी मंजूरियों के लिए डिजिटल व्यवस्था को मजबूत करना भी जरूरी है। SEZ प्रशासन को ICEGATE, GST, विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) और राज्य सरकारों के पोर्टल से जोड़ा जाना चाहिए। इससे कंपनियों को एक ही दस्तावेज बार-बार जमा नहीं करना पड़ेगा। हर आवेदन के लिए समय-सीमा तय होनी चाहिए और देरी होने पर उसका कारण भी बताया जाना चाहिए।
इसके अलावा, खाली पड़ी जमीन और बंद पड़ी औद्योगिक सुविधाओं का दोबारा इस्तेमाल किया जाना चाहिए। पिछड़े औद्योगिक क्षेत्रों में निवेश आकर्षित करने के लिए स्थानीय जरूरतों के हिसाब से उद्योग विकसित किए जा सकते हैं। सड़क, रेलवे, बंदरगाह, बिजली और पानी जैसी सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए पीएम गतिशक्ति और एकीकृत लॉजिस्टिक्स इंटरफेस प्लेटफॉर्म (ULIP) का इस्तेमाल किया जा सकता है।
सेमीकंडक्टर, चिकित्सा उपकरण, खाद्य प्रसंस्करण और इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों के लिए अलग-अलग जरूरतों के हिसाब से सुविधाएं विकसित करनी चाहिए। साझा प्रयोगशालाएं, परीक्षण केंद्र और नई तकनीक पर शोध करने वाली सुविधाएं उपलब्ध कराने से छोटे उद्योगों को भी फायदा मिलेगा। साथ ही, सौर ऊर्जा, पानी के दोबारा इस्तेमाल और प्रदूषण कम करने वाली तकनीकों को बढ़ावा देना चाहिए। कर्मचारियों के रहने और काम करने की बेहतर सुविधाएं भी विकसित करनी होंगी।
क्या SEZs बन सकते हैं भारत की आर्थिक तरक्की का बड़ा आधार?
भारत के विशेष आर्थिक क्षेत्रों ने पिछले दो दशकों में निर्यात, निवेश और रोजगार के मामले में अच्छी प्रगति की है। लेकिन गैर-परिचालित SEZs, जमीन का अधूरा इस्तेमाल, कुछ राज्यों में उद्योगों का ज्यादा संकेंद्रण और सरकारी प्रक्रियाओं की जटिलता जैसी समस्याएं अब भी मौजूद हैं। ऐसे में जरुरत केवल नए SEZ बनाने की नहीं, बल्कि पहले से मौजूद क्षेत्रों को अधिक उपयोगी और प्रतिस्पर्धी बनाने की है।
अगर सरकार स्थिर नीतियां, आसान मंजूरियां, बेहतर लॉजिस्टिक्स और घरेलू उद्योगों के साथ मजबूत संबंध विकसित करती है, तो SEZs की भूमिका और बढ़ सकती है। इन्हें केवल निर्यात के लिए बने विशेष क्षेत्रों के बजाय ऐसे औद्योगिक केंद्रों के रूप में विकसित करना होगा, जहां निवेश, रोजगार, नई तकनीक और स्थानीय उद्योगों को एक साथ आगे बढ़ने का अवसर मिले। यही बदलाव भारत के SEZs को वैश्विक बाजार में मजबूत पहचान दिलाने में मदद कर सकता है।
