El Nino 2026 Update: अमेरिकी वैज्ञानिक एजेंसी 'नोआ' (National Oceanic and Atmospheric Administration) और भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने एक ऐसी साझा चेतावनी जारी की है, जिसने पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों को हैरान कर दिया है। भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर (Equatorial Pacific Ocean) में 'अल नीनो' (El Nino) आधिकारिक तौर पर लौट आया है और यह बहुत तेजी से मजबूत हो रहा है। मौसम वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह इस बार साल 1997 के रिकॉर्ड को तोड़कर इतिहास का सबसे विनाशकारी "सुपर अल नीनो" बन सकता है।
संयुक्त राष्ट्र (UN) के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने दुनिया को आगाह करते हुए वीडियो संदेश में कहा है, "अल नीनो के हालात पहले से ही तपे जा रहे ग्लोबल वार्मिंग के माहौल में आग में पेट्रोल डालने का काम करेंगे।" लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि सात समंदर पार महासागर में होने वाली यह हलचल भारत में महंगाई क्यों बढ़ा देती है? आइए विज्ञान की भारी शब्दावली को छोड़कर इसे एकदम सरल उदाहरणों से समझते हैं।
आसान भाषा में समझें आखिर अल नीनो क्या है?
तकनीकी भाषा में अल नीनो का मतलब समुद्र की सतह के तापमान का सामान्य से अधिक बढ़ जाना है। लेकिन इसे अपने घर के एक 'डेजर्ट कूलर' के उदाहरण से समझिए। मान लीजिए चिलचिलाती गर्मी में आपके कमरे में एक बड़ा कूलर चल रहा है। कूलर की तेज हवा कमरे के एक कोने से ठंडी हवा को धकेलकर दूसरे कोने में, जहां आप बैठे हैं वहां तक पहुंचाती है। जब तक हवा तेज है, आपको बढ़िया ठंडक मिलती रहती है।
हमारी पृथ्वी का 'कूलर' प्रशांत महासागर है। सामान्य दिनों में कुदरती हवाएं, जिन्हें ट्रेड विंड्स या व्यापारिक पवनें कहते हैं, वे पूर्व (अमेरिका) से पश्चिम (एशिया, इंडोनेशिया और भारत) की तरफ बहुत तेज चलती हैं। ये हवाएं समुद्र के पानी की ऊपरी गर्म परत को घसीटकर हमारे पाले (एशिया) में ले आती हैं। इस भारी गर्मी और नमी से हमारे यहां घने बादल बनते हैं और जोरदार मानसूनी बारिश होती है।
लेकिन अल नीनो आते ही पासा पलट जाता है। अल नीनो के दौरान यह कुदरती हवाएं अचानक कमजोर पड़ जाती हैं या उलटी दिशा में बहने लगती हैं। इसे ऐसे समझें कि किसी ने कूलर की हवा की स्पीड बहुत कम कर दी या उसका मुंह दूसरी तरफ घुमा दिया। नतीजा यह होता है कि महासागर का जो गर्म पानी भारत और एशिया की तरफ आना चाहिए था, वह वापस अमेरिका की तरफ लौट जाता है और वहां समुद्र की सतह का तापमान 2 से 2.5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाता है। हवा की इस अदला-बदली से पूरी दुनिया का मौसम चक्र हिल जाता है।
क्या अल नीनो का मतलब हमेशा 'सूखा' होता है?
अबतक आपने अल नीनो के बारे में कई जगह सुना-पढ़ा होगा और हर जगह इसे गर्मी और सूखे से जोड़कर ही देखा जाता है। तो यह सवाल मन में उठना लाजमी है कि क्या अल नीनो का मतलब सूखा ही होता है? इतिहास देखें तो साल 1950 से अब तक भारत ने 16 अल नीनो साल देखे हैं, जिनमें से 7 बार देश को भयंकर सूखे का सामना करना पड़ा। साल 1965, 1972, 2002 और 2009 के सबसे भीषण ऐतिहासिक सूखे इसी अल नीनो की वजह से आए थे। भारत में आखिरी बार यह स्थिति 2023 में देखी गई थी। लेकिन, अल नीनो का मतलब हमेशा शत-प्रतिशत सूखा नहीं होता। भारत के पास हिंद महासागर में एक गुप्त रक्षक है, जिसे वैज्ञानिक 'इंडियन ओशन डिपोल' (IOD) कहते हैं। इसे आप भारत का 'लोकल रक्षा कवच' मान सकते हैं।
इसे 1997 की कहानी से समझिए। साल 1997 में दुनिया ने इतिहास का सबसे खतरनाक अल नीनो देखा था। तब लग रहा था कि भारत में अकाल पड़ जाएगा। लेकिन हमारे इस 'लोकल रक्षा कवच' (Positive IOD) ने इतना दमदार काम किया कि अल नीनो के असर को पूरी तरह सोख लिया और भारत में मानसून बिल्कुल सामान्य रहा।
इस साल की सबसे बड़ी चिंता क्या है?
भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने साफ किया है कि इस साल यह रक्षा कवच (IOD) बिल्कुल 'न्यूट्रल' यानी निष्क्रिय रहने वाला है। इसका मतलब है कि इस बार हमारे मानसून को अल नीनो के थपेड़ों से बचाने वाला कोई नहीं है, और यही कारण है कि मौसम विभाग ने इस साल देश में कमजोर मानसून (Below-Average Monsoon) का अनुमान जताया है।
आपकी थाली, खेती और जेब पर कैसे पड़ेगा डाका?
भारत की लगभग आधी आबादी आज भी खेती-किसानी पर निर्भर है और हमारी खेती सीधे तौर पर मानसून के पानी से सींची जाती है। अगर अल नीनो के कारण मानसून रूठ गया, तो इसका सीधा असर आम आदमी की जिंदगी पर तीन तरीकों से पड़ेगा।
1. रसोई का बिगड़ेगा बजट (महंगाई का संकट): बारिश कम होने से खरीफ की मुख्य फसलों जैसे धान (चावल), मक्का, दालें और तिलहन का उत्पादन घट सकता है। जब मंडियों में अनाज कम आएगा, तो स्वाभाविक रूप से खाद्यान्न महंगाई (Food Inflation) आसमान छूने लगेगी।
2. किसान पर दोहरी मार: इस साल मौसम की बेरुखी के साथ-साथ एक और संकट मंडरा रहा है। पश्चिम एशिया (मिडल ईस्ट) के तनाव के कारण खादों (Fertilisers) की इंटरनेशनल सप्लाई चेन प्रभावित हुई है। कम बारिश और महंगी खाद की दोहरी मार ग्रामीण अर्थव्यवस्था को परेशान कर सकती है।
3. बिजली का संकट और भयंकर हीटवेव: अल नीनो सिर्फ बारिश नहीं रोकता, यह गर्मी को भी कई गुना बढ़ा देता है। स्टैनफोर्ड के अर्थशास्त्रियों के अनुसार, जब तापमान सामान्य से ऊपर जाता है तो देश की आर्थिक विकास दर धीमी हो जाती है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस अल नीनो के असर के चलते साल 2027 इतिहास का सबसे गर्म साल दर्ज हो सकता है। जब देश में भीषण लू (Heatwave) चलेगी, तो घरों और दफ्तरों में एसी-कूलर चलाने के लिए बिजली की मांग रिकॉर्ड तोड़ होगी।
वैश्विक स्तर पर मौसम का 'व्हिपलैश'
कोलंबिया और प्रिंसटन यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञों के अनुसार, यह अल नीनो सामान्य से एक-दो महीने पहले ही अपने चरम पर पहुंच रहा है और यह लंबे समय तक टिक सकता है। इसके कारण दुनिया भर में मौसम का एक अनोखा रूप देखने को मिलेगा जिसे वैज्ञानिक 'मौसम का व्हिपलैश' (अचानक सूखा और फिर अचानक विनाशकारी बाढ़) कहते हैं। जहां पेरू और दक्षिण अमेरिका के देशों में भारी बारिश और विनाशकारी बाढ़ आएगी, वहीं ऑस्ट्रेलिया सूखे और जंगलों की आग की चपेट में होगा।
घबराएं नहीं, तैयारी ही सबसे बड़ा हथियार है
काफी सालों पहले जब 1877-78 में एक ऐसा ही महा-अल नीनो आया था, तब तत्कालीन ब्रिटिश भारत में अकाल से 50 लाख से अधिक लोगों की जान चली गई थी। लेकिन आज का भारत तकनीकी और आर्थिक रूप से बेहद मजबूत है। जलवायु विशेषज्ञों का कहना है कि "हमें डरने की बजाय तैयार रहने की जरूरत है।" सरकारें और किसान मिलकर पानी के सही संचयन (Water Harvesting), कम पानी में उगने वाले मोटे अनाजों (जैसे बाजरा, रागी) की बुवाई और बेहतर मैनेजमेंट से इस खतरनाक मौसम के असर को काफी हद तक कम कर सकते हैं। कुदरत ने अपनी चेतावनी दे दी है, अब बारी हमारी तैयारियों की है।
