राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सौ वर्ष पूरे होना केवल संगठन के इतिहास का नहीं, बल्कि आधुनिक भारत के बदलते परिदृश्य का भी महत्त्वपूर्ण पड़ाव है। 27 सितंबर 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर में जो बीज बोया था, वह आज एक विराट वटवृक्ष बन चुका है। लाखों स्वयंसेवक और सैकड़ों सह-संगठन इसके विस्तार का प्रमाण हैं।
संघ ने भारतीय समाज में अनुशासन, संगठन और सेवा की जो संस्कृति विकसित की है, वह निस्संदेह प्रशंसनीय है। शाखा पद्धति के माध्यम से चरित्र निर्माण, आपदा की घड़ी में निस्वार्थ सेवा, और गांव-गांव तक शिक्षा व संस्कार पहुंचाने के प्रयास संघ की पहचान हैं। राजनीति से इतर सामाजिक जीवन में उसकी पैठ गहरी है। आज यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि संघ ने भारतीय समाज को एक निश्चित दिशा देने का कार्य किया है। लेकिन इस यात्रा का दूसरा पहलू भी है। संघ को लेकर विवाद और आलोचनाएं बराबर बनी रही हैं। 1948 में लगे प्रतिबंध से लेकर आज तक, उसके आलोचक यह प्रश्न उठाते रहे हैं कि क्या संघ की विचारधारा समाज को जोड़ने से अधिक बांटने का काम करती है? उसके हिंदुत्व के आग्रह को कभी-कभी सांप्रदायिकता के चश्मे से भी देखा गया है। दलित-आदिवासी समाज में पैठ बनाने के उसके प्रयासों को भी कई बार “राजनीतिक विस्तार” के तौर पर समझा गया।
राजनीतिक प्रभाव की दृष्टि से संघ का सबसे बड़ा प्रयोग भारतीय जनता पार्टी है। आज जब देश का शीर्ष नेतृत्व स्वयंसेवक पृष्ठभूमि से आता है, तो यह सवाल भी उठता है कि क्या संघ और सत्ता के बीच की दूरी कम होती जा रही है? संघ हमेशा यह कहता आया है कि उसका सीधा राजनीति से संबंध नहीं है, किंतु व्यवहार में यह दूरी अक्सर धुंधली हो जाती है। शताब्दी वर्ष संघ के लिए आत्ममंथन का अवसर है। निस्संदेह उसने समाज को संगठित करने, सेवा और संस्कार के क्षेत्र में बड़ा योगदान दिया है। लेकिन भारत एक बहुलतावादी समाज है—जहाँ विविधता ही शक्ति है। आने वाले वर्षों में संघ के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वह इस विविधता को अपनी ताकत माने, न कि समस्या। यदि संघ इस दिशा में ईमानदार प्रयास करता है, तो वह केवल अपने अगले सौ वर्षों का नहीं, बल्कि भारत के भविष्य का भी निर्णायक निर्माता बन सकता है।
संघ परिवार का आकार
संघ परिवार में वर्तमान समय में लगभग 35 से 50 राष्ट्रीय स्तर के संगठन शामिल हैं। ये संगठन शिक्षा, सामाजिक सेवा, श्रमिक आंदोलन, महिला सशक्तिकरण, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और राजनीति जैसे विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रहे हैं। संघ के भीतर अलग-अलग विभागों और इकाइयों को मिलाकर लगभग 46 राष्ट्रीय स्तर की शाखाएँंया विंग्स मानी जाती हैं। इसके अलावा, स्थानीय स्तर पर शाखा, साप्ताहिक मिलन और मंडलियों की संख्या हजारों में है। आरएसएस का दावा है कि वह देशभर के 70 हज़ार से अधिक स्थानों पर प्रत्यक्ष सक्रिय है और आगामी वर्षों में इस संख्या को 1 लाख स्थानों तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है।
संघ परिवार के प्रमुख संगठन (नामवार सूची)
1. राजनीति व नीति निर्माण
•भारतीय जनता पार्टी (BJP)
•भारतीय जनसंघ (ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, अब BJP में विलीन)
2. छात्र और युवा संगठन
•अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP)
•राष्ट्रीय सेवा भारती (NSB)
•भारतीय शिक्षा मंडल
3. श्रमिक और आर्थिक संगठन
•भारतीय मजदूर संघ (BMS)
•स्वदेशी जागरण मंच (SJM)
•भारतीय किसान संघ (BKS)
•लघु उद्योग भारती
4. सांस्कृतिक व धार्मिक संगठन
•विश्व हिंदू परिषद (VHP)
•बजरंग दल
•संस्कृत भारती
•हिंदू जागरण मंच
5. सामाजिक सेवा व जनजागरण संगठन
•सेवा भारती
•वनवासी कल्याण आश्रम
•अनुसूचित जाति/जनजाति संगठन
•राष्ट्रीय सेवा योजना (संघ प्रेरित मंचों के रूप में)
6. शिक्षा क्षेत्र
•विद्या भारती (सरस्वती शिशु मंदिर सहित हजारों विद्यालय)
•भारतीय शिक्षा परिषद
•शिक्षक संघ
7. महिला संगठन
•राष्ट्र सेविका समिति
•समर्पण महिला मंच
•महिला शक्ति केंद्र
8. विशेष व प्रादेशिक संगठन
•भारत विकास परिषद
•मित्र मंडल
•हिन्दू स्वयंसंवाद केंद्र
•गोरक्षा मंच
इनके अलावा क्षेत्रीय और प्रादेशिक स्तर पर अनेक संगठन सक्रिय हैं, जिनकी संख्या सैकड़ों में है।
योगदान और प्रभाव
•शिक्षा के क्षेत्र में विद्या भारती हजारों विद्यालय चला रही है।
•सामाजिक सेवा में सेवा भारती और वनवासी कल्याण आश्रम ग्रामीण व आदिवासी क्षेत्रों में सक्रिय हैं।
•बीजेपी के रूप में संघ की राजनीतिक शाखा राष्ट्रीय स्तर पर सत्तारूढ़ है।
•बीएमएस और बीकेएस देश के सबसे बड़े मजदूर व किसान संगठनों में गिने जाते हैं।
•विहिप और बजरंग दल सांस्कृतिक-धार्मिक मंचों के तौर पर सक्रिय हैं।
आरएसएस में अब तक 6 सरसंघचालक बने
डॉ केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा स्थापित संगठन आरएसएस में सर्वोच्च पद “सरसंघचालक” का होता है। यह पद संघ की कार्यप्रणाली में वैचारिक और संगठनात्मक नेतृत्व का प्रतीक माना जाता है। अब तक संघ के इतिहास में केवल छह सरसंघचालक हुए हैं।
1. डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार (1925–1940)
•संघ के संस्थापक और पहले सरसंघचालक।
•उनका जोर अनुशासन, संगठन और हिंदू समाज के आत्मगौरव पर रहा।
•1940 में उनके निधन के बाद नेतृत्व हस्तांतरित हुआ।
2. माधव सदाशिव गोलवलकर ‘गुरुजी’ (1940–1973)
•हेडगेवार के उत्तराधिकारी और संघ के सबसे लंबे कार्यकाल वाले सरसंघचालक।
•संघ का देशव्यापी विस्तार उनके समय में हुआ।
•1948 में गांधीजी की हत्या के बाद लगे प्रतिबंध और 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौर में भी संघ का मार्गदर्शन किया।
3. बालासाहेब देवरस (1973–1994)
•आपातकाल (1975) के समय संघ का नेतृत्व किया।
•जनता पार्टी आंदोलन में संघ की भागीदारी बढ़ाई।
•“सामाजिक समरसता” को संघ की मुख्य धारा में लाने का श्रेय इन्हें जाता है।
4. प्रो. राजेंद्र सिंह ‘राजजू भैया’ (1994–2000)
•पहले गैर-महाराष्ट्रीयन सरसंघचालक।
•शिक्षा जगत से जुड़े रहे और संघ की युवा पीढ़ी को आकर्षित करने का प्रयास किया।
•उनके समय में संघ ने सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया।
5.के सुदर्शन (2000–2009)
•तकनीकी पृष्ठभूमि से आने वाले सरसंघचालक।
•स्वदेशी और स्वावलंबन पर विशेष बल दिया।
•वैश्वीकरण और विदेशी पूंजी निवेश को लेकर इनके विचार चर्चा में रहे।
6. मोहन भागवत (2009–वर्तमान)
•वर्तमान सरसंघचालक।
•उनके नेतृत्व में संघ का विस्तार अभूतपूर्व स्तर पर हुआ।
•संवाद, आधुनिकता और सामाजिक परिवर्तन को लेकर सक्रिय रुख अपनाया।
•संघ के शताब्दी वर्ष (2025) तक संगठन को 1 लाख से अधिक स्थानों पर सक्रिय करने का लक्ष्य रखा है।
आरएसएस पर लगे प्रतिबंध: इतिहास की पड़ताल
1925 में जन्मे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के 100 वर्षों का सफर कई उतार चढ़ाव वाला रहा स्वतंत्रता आंदोलन और उसके बाद के राजनीतिक-सामाजिक घटनाक्रमों में संघ की भूमिका को लेकर समय-समय पर विवाद उठते रहे हैं। इन्हीं विवादों के चलते, संघ पर भारतीय इतिहास में तीन बार प्रतिबंध लगाया गया।
1. पहला प्रतिबंध - 1948-1949
•कारण: 30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या नाथूराम गोडसे ने की। गोडसे का अतीत संघ से जुड़ा हुआ था, हालांकि संघ ने उसकी सदस्यता से इनकार किया।
•हत्या के बाद देश में व्यापक आक्रोश फैला और तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 4 फरवरी 1948 को संघ पर प्रतिबंध लगा दिया।
•परिणाम: संघ के लाखों स्वयंसेवक गिरफ्तार हुए।
•बाद में, संघ ने अपने संविधान में लोकतंत्र और अहिंसा की प्रतिबद्धता लिखित रूप से जताई, जिसके बाद जुलाई 1949 में प्रतिबंध हटा लिया गया।
2. दूसरा प्रतिबंध - 1975-1977 – आपातकाल
•कारण: प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा 25 जून 1975 को लगाए गए आपातकाल में संघ को लोकतांत्रिक मूल्यों और नागरिक अधिकारों के लिए खतरा बताया गया।
•संघ पर आरोप: सरकार का तर्क था कि संघ भूमिगत रूप से आपातकाल विरोधी गतिविधियों को बढ़ावा दे रहा है।
•परिणाम: संघ सहित हजारों स्वयंसेवकों को जेल भेजा गया। संघ ने जनता पार्टी के आंदोलन में अहम भूमिका निभाई।
•मार्च 1977 में आपातकाल समाप्त होने के साथ ही प्रतिबंध भी हट गया।
3. तीसरा प्रतिबंध -1992-1993 – बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद
•कारण: 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद ढहाई गई। सरकार ने आरोप लगाया कि इस घटना के पीछे संघ और उससे जुड़े संगठनों की भूमिका थी।
•इसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव ने 10 दिसंबर 1992 को संघ पर प्रतिबंध लगा दिया।
•परिणाम: जांच और न्यायिक समीक्षा के बाद, 1993 में यह प्रतिबंध हटा लिया गया।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने 1925 में नागपुर से शुरुआत की और आज यह देशभर में शाखाओं और सामाजिक-सांस्कृतिक पहलों के माध्यम से एक मजबूत नेटवर्क बन चुका है। एक सदी में संघ ने संगठनात्मक दृढ़ता, अनुशासन और सेवा भाव के माध्यम से राष्ट्रीय एकता और सामाजिक चेतना को बढ़ावा दिया। हालांकि इसकी विचारधारा और कार्यप्रणाली विवादों का केंद्र रही, संघ ने लगातार अपने उद्देश्यों और विस्तार के मार्ग पर कदम बढ़ाया। शाखाओं से लेकर शिक्षा, समाज सेवा और समुदायिक कार्यों तक, संघ ने देशव्यापी प्रभाव स्थापित किया और 21वीं सदी में भी सक्रिय रूप से राष्ट्र सेवा में योगदान दे रहा है।
