पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और ईरान संघर्ष से जुड़ी रुकावटों के बीच, भारत सरकार एक खास 1,000 करोड़ रुपये का फंड बनाने पर विचार कर रही है। इस फंड का मकसद उन बीमा कंपनियों को मदद देना है जो होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे ज़्यादा जोखिम वाले समुद्री रास्तों से गुज़रने वाले जहाज़ों को युद्ध-जोखिम कवरेज देती हैं।
यह प्रस्ताव अभी वित्त मंत्रालय के पास समीक्षा के लिए है, और इसका मकसद बीमा की उपलब्धता में बढ़ती कमी को दूर करना है। बढ़ते जोखिमों के कारण दुनिया भर की पुनर्बीमा कंपनियां इस क्षेत्र से पीछे हट रही हैं, जिससे माल ढुलाई न सिर्फ़ महंगी हो गई है, बल्कि उसका बीमा करवाना भी मुश्किल हो गया है।
'इस योजना को सरकार-समर्थित एक पुनर्बीमा तंत्र का सहारा मिलेगा'
अधिकारियों ने बताया कि इस योजना के तहत घरेलू बीमा कंपनियों को उन जहाजों को कवरेज देने में सक्षम बनाया जाएगा जो संघर्ष-प्रभावित रास्तों से गुज़रते हैं। इस योजना को सरकार-समर्थित एक पुनर्बीमा तंत्र का सहारा मिलेगा, जो संभावित नुकसान की भरपाई करेगा। एक सरकारी अधिकारी ने कहा, 'हम इस बात की जांच कर रहे हैं कि क्या कोई फंड बनाया जा सकता है, क्योंकि इस क्षेत्र में पुनर्बीमा उपलब्ध नहीं है।' उन्होंने आगे कहा कि इस तरह की सुविधा एक अहम सुरक्षा कवच का काम करेगी।
इसमें वर्तमान में 21 सदस्य शामिल हैं
यह ढांचा 2022 में रूस-यूक्रेन संघर्ष के बाद बनाए गए 'मरीन कार्गो एक्सक्लूडेड टेरिटरीज पूल' जैसा हो सकता है। GIC Re द्वारा प्रबंधित, यह पूल ज़्यादा जोखिम वाले या प्रतिबंधित क्षेत्रों से होने वाली शिपमेंट के लिए बीमा कवरेज प्रदान करता है, और इसमें वर्तमान में 21 सदस्य शामिल हैं।
'करीब 1,000 करोड़ रुपये का फंड रखा जाएगा'
प्रस्तावित ढांचे के तहत, GIC Re की अगुवाई में एक ऐसा ही पूल बनाया जा सकता है, जिसके लिए करीब 1,000 करोड़ रुपये का फंड रखा जाएगा। यह न सिर्फ़ आम कार्गो को, बल्कि होर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुज़रने वाले कच्चे तेल के जहाज़ों को भी बीमा सुरक्षा दे सकता है, जिससे भारत आने वाले व्यापार के लिए बीमा की निरंतरता बनी रहेगी।
निर्यातक और शिपिंग कंपनियां लंबे समय से ऐसी व्यवस्था की मांग कर रही
अधिकारियों ने बताया कि कई विकल्पों पर विचार किया जा रहा है, और अंतिम फ़ैसला इस बात पर निर्भर करेगा कि हालात कैसे बदलते हैं-खासकर तब, जब जलडमरूमध्य से सामान्य आवाजाही फिर से शुरू हो जाएगी। निर्यातक और शिपिंग कंपनियां लंबे समय से ऐसी व्यवस्था की मांग कर रही हैं, ताकि भू-राजनीतिक उथल-पुथल के दौरान व्यापार का प्रवाह सुरक्षित बना रहे।
